शनिवार, मार्च 6

डर लगता है....


अक्सर मनुष्य के जीवन में कोई न कोई ऐसा वाक्या आता है जिसे वो कभी भूल नहीं पाता...हर किसी की जिन्दगी में कुछ न कुछ ऐसी घटना जुड़ी होती है...जिससे वो चाहकर भी नहीं उबर पाता....उसे उसकी यादें हमेशा सताती हैं....उसे उसका एहसास भी उस लम्हें या घटना की यादों को ताजा कर जाती है...औऱ वो चाहकर भी उन यादों से ख़ुद को नहीं निकाल पाता है...जब भी वो उस दौर से गुजरता हो....उसे महसूस होता है...मानो ये कल की बात हों....कुछ जानी-पहचानी..कुछ कही-अनकही या शायद कुछ ऐसी यादें जिसे आप याद न करना चाहें लेकिन वो अपका पीछा ही न छोड़े...आपकी जिन्दगी में बार-बार लौटकर आपको आपके किए का एसहास करा जाए...और आप चाह कर भी उन यादों से खुद को जुदा न कर पाए....किसी से मिलना किसी से बिछड़ना...या उसकी एक-एक अदा उसकी एक एक बातें आपके जेहन में रच बस जाए और आपके लिए वो बेहद यादगार पर बन जाए...जब भी आप उस दौर से गुजरें या उस जगह से गुजरें तो आपको अनायास ही पिछली घटना की याद सताने लगे....
मैं भी ऐसे कई दौर से गुजर चुकी हूं जिसके यादों को मैं चाहकर भी अपने जेहन से जुदा नहीं कर पाती....कई ऐसी बातें हैं...जिन्हें मैं चाहकर भी नहीं भुला पाती....और वो यादें मुझे झकझोरती हैं...मेरी गलतियों का एहसास करा जाती हैं...मैं चाह कर भी उसे नहीं भुला पाती....मैं जब भी खुद को उस जगह पाती हूं...वो सारी बाते कंम्प्यूटर के डाटा की तरह मेरे मानसिक पटल पर आ जाता है...और मैं बेहद परेशान हो जाती हूं....मुझे उसका कोई समाधान नजर नहीं आता...और उस वक्त मैं खुद को वेहद असहाय महसूस करती हूं...ये तो हो गई किसी से मिलने बिछड़ने की बातें लेकिन
मेरे लिए फरवरी से अप्रैल का महीना बड़ी ही मुश्किलों भरा होता है...दरअसल मुझे इस मौसम से डर सा लगता है....मैं खुद भी नहीं जानती ऐसा मेरे साथ क्यों होता है...मेरा शरीर कांपता है....मुझे ऐसा लगता है जैसे मेरे साथ कुछ बहुत बुरा होने वाला है...ये डर मेरे अंदर कब आया...कहां से आया....मैं भी नहीं जातनी...सुबह जब मेरी नींद खुलती है और रात जब तक मुझे नींद नहीं आती... मेरा पूरा वक्त डर-डर कर गुजरता है...क्या ये मेरे अंदर का वहम है....मुझे इस मौसम में चलने वाली हवाएं भी डराती हैं....पतझड़ का मौसम...सर्दी के बाद आनेवाली गर्मी का एहसास मुझे हर वक्त सताती है....उस समय का रूखा-रुखा सा मौसम...खिंच-खिंची सी त्वचा...मुझे गर्मी बिल्कुल पसंद नहीं....मैं अकेले में खुद से कई बार पूछती हूं...कि आखिर मुझे इस मौसम से इतना डर क्यों लगता है...लेकिन मुझे कोई जवाब नहीं मिलता....
कई बार मैंने अपनी ये परेशानी अपने दोस्तों को भी बताई...सबने अलग-अलग कारण बताया...लेकिन मैं किसी भी वजह से खुद को जोड़ने में असमर्थ रही...मैंने अपनी बातें ऑफिस में भी अपने साथियों को बताई...लेकिन मुझे मेरे इस सवाल का जवाब नहीं मिला...मुझे लग रहा था....कि ये सिर्फ मेरे अंदर का वहम नहीं हो सकता...कुछ और लोगों के साथ भी ऐसा होता है....ये बात मेरे सामने तब उजागर हुई जब मैंने अपनी ये परेशानी अपनी रूम मेट को बताई...मेरी रूम मेंट इस वक्त मेरे ही चैनल में न्यूज एंकर है...उसने केन्द्रीय विद्यालय से पढ़ाई की है....मैं भी केन्द्रीय विद्यालय की प्रोडक्ट हूं...उसका कहना है कि ‘मुझे भी इस मौसम में थोड़ा अजीब सा लगता है’...उसका ये कहना है कि इस मौसम में स्कूलों में FINAL EXAM होते थे तो शायद इसी वजह से डर लगता हो....एक दिन वो ऑफिस के कैंटीन में बैठी थी...दोपहर का समय था.... अचानक हमारे एक सर आए उनके मुंह से अनायास ही निकल गया कैसा मौसम हो रहा है EXAM EXAM जैसा...ऑफिस के कई लोग इसी तरह का REACTION दे रहे थे....मेरी रूममेट ने घर आकर मुझे ये बातें बताई...पता नहीं शायद और भी कुछ लोगों को इस मौसम से थोड़ा अटपटा लगता हो....
लेकिन मेरे अंदर ये कैसा डर आज भी समाया हुआ है....क्या मेरा ये डर EXAMO PHOBIA की वजह से है....लेकिन अब तो दूर-दूर तक मेरा EXAM से कोई वास्ता नहीं है...अब में एक अच्छी कंपनी में JOB कर रही हूं....औऱ अब मुझे कहीं दूसरी जगह जॉब सर्च भी करनी पड़ी...तो मुझे EXMA देने की जरूरत शायद न हो...मेरे EXPERIENCE की बदौलत मुझे दूसरी जगह भी अच्छी नौकरी मिल जाएगी....तो फिर अब मुझे किस चींज से डर लगता है....अगर मैं अब भी स्कूल में होती तो कहा जा सकता ता कि मुझे EXAM FEVER हो गया है...स्कूल में मुझे MATHS से बहुत डर लगता था और इसलिए मैंने कॉलेज में MATHS से अपना पीछा छुड़ा लिया...अब मुझे स्कूल से निकले काफी वक्त हो गया है....कॉलेज में थी तब भी मुझे डर लगता था...यूनिवर्सिटी में थी तब भी डर लगता था...अब ये डर MATHS से नहीं था....हालांकि मैं अपनी पढ़ाई अच्छी तरह करती थी और जिस दिन EXAM होता मैं पूरी रात नहीं सोती थी...रातभर पढ़ाई में निकल जाता था...पापा मेरी वजह से पूरी रात नहीं सो पाते थे.... वो बीच-बीच में देखने आते थे कि कहीं मैं सो तो नहीं गई...लेकिन मैं हमेशा उन्हें पढ़ाई करती नजर आती....रात को सोती भी थी तो एलार्म लगाकर सोती थी...वो भी सिर्फ 2 से 3 घंटे के लिए...और नींद में भी शायद में अपने कोर्स को ही दोहराती-बड़बड़ाती थी....सुबह मुझे दोबारा नींद ना आ जाए इसलिए 5 बजे में नहाने चली जाती थी ...कॉलेज में अक्सर डे टाइम में EXAM होता था...और पूरा टाइम मेरा पढ़ने में निकल जाता था....EXAM देने जाते वक्त रास्ते भर मैं अपना पढ़ा हुआ सोचती और दोहराती जाती....जब तक मैं EXAM HALL में नहीं बैठ जाती तब तक मजाल की कोई मुझसे कोई फालतू की गप्पे हांक ले...पापा ने मेरी इस हरकत की वजह से मेरा नाम कालीदास रख दिया था...मैं मार्क्स भी अच्चे ले आती थी....और पापा या मम्मी जब भी मेरे कॉलेज या डिपार्टमेंट जाते मेरे प्रोफेसर मेरी तारीफों के पुल बांधते नजर आते....मां और पापा को मुझपर गर्व होता....मुझे भी बेहद अच्छा लगता था...हां मैं एक साथ कई सारे कोर्स कर रही थी और सबमें अच्छा कर रही थी....लेकिन ये डर मेरा पीछा नहीं छोड़ती...
आज भी मेरे दिल में ये डर क्यों बैठा है मुझे समझ नहीं आता....आखिर इसके पीछे वजह क्या है...आज मैं EXAM के दौर से गुज़र चुकी हूं...आज मैं अच्छी जगह नौकरी भी कर रही हूं...उसमें भी मैं खुश और संतुष्ट हूं...लेकिन आज भी हर रोज में एक बार किसी न किसी के सामने जरूर बोलती जाती हूं कि मुझे इस मौसम से डर लग रहा है...मैं खुद को बेहद कमजोर महसूस करती हूं...मुझे लगता हैं मैं कुछ गलत कर रही हूं....ऐसे में मुझे मेरे अपनों की कमी बेहद खलती है...मैं खुद को बेहद अकेला महसूस करती हूं.....मुझे लगता है मेरा अपना कोई हमेशा मेरे पास हो...मेरा कोई अपना मतलब जिसे मैं अपनी सारी बातें बता सकूं...जो मेरे इस बुरे वक्त में मेरे करीब हो....मेरे पास हो....शायद में बेहद इमोशनल हूं....बहुत जल्दी किसी चीज को खुद से जोड़ लेती हूं....और उसे खुद से अलग नहीं कर पाती...मुझे मेरे करीबी समझाते हैं...अपने इमोशन पर काबू रखो...क्योंकि दुनिया में इमोशन की कोई कद्र नहीं....लोग बड़ी ही आसानी से इमोशनल अत्याचार कर...आपको टाटा बाय बाय बोलकर निकल लेते हैं....और मुझे हमेशा के लिए दुखी कर जाते हैं....ऐसे में कोई अपना होता है तो वो हैं मेरे परिवार वाले....हमारे अपने...जो हमें कभी तक्लीफ में नहीं देख सकते....अगर वो उस पल में हमारे साथ हो तो हम दुनिया की कोई भी जंग जीत सकते हैं...लेकिन अगर उस वक्त उनका साथ न मिले तो आप खुद को बेहद तन्हा और अकेला महसूस करते हैं....मुझे भी ऐसे में मेरे घर वालों की कमी महसूस होती है....मुझे लगता है मुझे कोई खुद में छुपा ले...मैं इस मौसम को अपनी आंखों से नहीं देखना चाहती....काश ये मौसम ही ना आए....मुझे सचमुच ये मौसम तन्हा कर जाता है....मैं इस मौसम में कहीं दूर चली जाना चाहती हूं...जहां मुझे पतझड़ देखने को न मिले.....क्या कोई मुझे बता सकता है कि मुझे ऐसा क्यों लगता है....? क्यों मैं इस वक्त खुद को इतनी तन्हाई में पाती हूं....क्या अब मैं अपने जीवन की परीक्षा से घबराती हूं...?














गुरुवार, फ़रवरी 4

सबसे लेट लतीफ कौन?



जी हां....बड़ा ही उलझा सा सवाल है...क्योंकि अक्सर हम किसी न किसी काम में लेट हो ही जाते हैं....लेटलतीफी हमारी नियती में शुमार हो चुका है...और हम जाने अनजाने ही सही ये हसीन गुस्ताख़ी कर ही बैठते हैं...अब जब लेटलतीफी की बात चल पड़ी है...
तो सबसे पहले बारी आती है उस प्राणी की जो लेटलतीफी में सबसे आगे है....उस प्राणी का नाम है प्रेमी और प्रेमिका...अरे आप चौकिए मत मैं कुछ गलत नहीं कह रही...चलिए मैं आपको बताती हूं कैसे...सबसे पहले तो बात प्रेमिका की...एक प्रेमिका जब तक अपने प्रेमी को इंतजार न कराए उसे मज़ा थोड़े ही आता है...अब बेचारी जान बूझकर ऐसी गुस्ताखी करे या जाने अंजाने लेकिन ये गलती उनसे हो ही जाती है...जरा गौर फरमाईये ये गलती अक्सर हर प्रेमिका के साथ ही क्यों होती है...कहने का मतलब है सभी प्रेमिका एक जैसी ही होती हैं...शायद...प्रेमियों को इंतज़ार कराना उनकी आदत जो हैं...भला प्रेमी के समक्ष अपनी एहमियत भी तो जतानी है...बात अगर प्रेमी की करें तो बेचारा हमेशा पीड़ित नज़र आता है...प्रेमिका को मिलने का समय दिया हो और समय पर ना पहुंचे...फिर देखिये बेचारे की क्या हालत होती है...5 या 10 मिनट लेट होने पर भी बेचारे को खूब खरी-खोटी सुननी पड़ जाती है...तो प्रेमियों जरा हो जाईये होशियार और मत करवाइये अपनी प्रेमिका को लंबा इंतज़ार...

खैऱ ये तो हो गई प्रेमी और प्रेमिका की बात अब ज़रा मेहमानों पर नजर फरमाइये...अतिथि देवो भवः की तर्ज पर वे आते हैं...जी हां वक्त जो भी मुकर्र किया गया हो...समय पर नहीं पहुंचना इनकी पहली शर्त होती है...एक या दो घंटे तो फिर भी चल जाता हैं... लेकिन और लंबा इंतज़ार वाकई कभी-कभी खल जाता है ...और अगर गलती से कभी अतिथि समय पर पहुंच गए तो घर में भागा दौड़ी मच जाती है लोग सामान जुटाने में लग जाते हैं....चलिए जनाब कोई गल नहीं.....एक बार हुआ यूं कि हमारे घर कुछ मेहमान आमंत्रित थे...आने का समय सुबह 11 बजे निर्धारित था लेकिन अपको पता है वो कितने बजे पधारे...शाम के तीन बजे....इंतज़ार इंतज़ार और इंतज़ार....हमें वो गाना याद आ रहा था...’’इंतहां हो गई इंतज़ार की’’...मैं छुट्टी में अपने घर गई थी मेरे पिताश्री ने कुछ लोगों को मुझसे मिलवाने के लिए बुलाया था...और सबसे बड़ी समस्या तो ये कि उसी दिन शाम 6 बजे मेरी वापसी की ट्रेन थी....3 से 4 बजे का समय मेहमानों को देना...मतलब मेरे लिए एक एक पल कीमती था...और मैं भी कम लेटलतीफ तोड़े ही हूं अपनी पैकिंग भी अंतिम समय में करना मेरी आदत है...खैर ले देकर किसी तरह मैनेज हो पाया..
ये तो हो गई अतिथि की बात...अब जरा रिश्तों की बात कर लें....दरअसल ये मेरे एक करीबी रिश्तेदार की प्रेमकहानी हैं....हुआ यूं की उस लड़की को एक लड़का बेहद पसंद करता था...और वो भी रिश्ते में उस लड़की की बड़ी बहन का देवर था....अब बड़ी बहन का देवर मतलब समझे आप यहां वो गाना फिट बैठता है ‘’दीदी तेरा देवर दिवाना’’ बेचारे को पहली ही नज़र में प्यार हो गया...लेकिन एक समस्या थी वो उसके घर वालों को नहीं बता सकता था..क्योंकि उसके पास उस वक्त अच्छी नौकरी नहीं थी....उसने खूब मेहनत की और एक साल के भीतर ही उसे अच्छी नौकरी भी मिल गई...उसने बड़े अरमानों से उस लड़की के लिए लाल रंग की एक साड़ी खरीदी...अब सिर्फ भाभी की बहन के लिए साड़ी भला ये कैसे हो सकता था...पहला हक तो उसकी भाभी का बनता था इसलिए बेचारे को अपनी भाभी के लिए भी साड़ी लेनी पड़ी...जब वो घर पहुंचा तो पता चला उस लड़की की शादी पक्की हो चुकी है...बेचारे के अरमान दिल में ही दबकर रह गए....संयोग देखिए उसके सामने उसकी प्रेमिका उसी की दी हुई साड़ी में हमेशा के लिए किसी और की हो गई और वो हाथ मलता रह गया...हाय...भगवान ऐसा दिन किसी को न दिखाए....खैर मेरे कहने का मतलब है कि अगर उसने समय पर उस लड़की को अपने दिल की बात कह दी होती तो शायद उसके साथ ऐसा ना होता...उसके मुहं से भी शायद यहीं निकला होगा ‘’अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत’’
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रिस्तों की बात तो हो गई अब रफ्तार की बात हो जाए...मेरा मतलब है यात्रा की...अब बात प्लेन की हो रेल की हो या फिर बस की...सबमें समय की मार झेलनी पड़ती है...प्लेन में तो फिर भी कुछ समय का फासला चलता है....लेकिन बस में कितना समय लग सकता है इसका कोई मां बाप ही नहीं हैं...और रेल यात्रा के तो कहने ही क्या...वो तो मांशा अल्लाह...इस मामले में हमारे प्यारे राज्य बिहार की तो कहने ही क्या....जी हां यहां तो ट्रेनें घंटों लेट रहती हैं...आप ट्रेन के स्टेशन से खुलने वाले समय पर भी अगर घर से निकलते हैं... तो भी आपकी ट्रेन नहीं छूटेगी इसकी तो गारंटी है...बिहार के ही गया और भागलपुर लाइन की बात बताऊं तो आपको यकीन नहीं होगा... लोग चेन पुलिग कर देते हैं और तब जाकर उनके नाते रिश्तेदार दूर से आते दिखाई देते हैं जब तक वो ट्रेन तक पहुंच ना जाए मजाल है ट्रेन चल पड़े...हालांकि दूसरे राज्यों में ऐसा नहीं होता....वहां निर्धारित समय पर ट्रेन खुल जाती हैं....और अगर नहीं खुलती तो उसके पीछे कोई ठोस वजह जरूर होती है....
एक बार हुआ यूं की मैं हैदराबाद से अपने पैतृक घर के लिए निकली...मेरे रूम से स्टेशन तक पहुंचने में 1 घंटे का वक्त लगता था...हालांकि मैं 1:30 घंटे पहले अपने घर से निकली थी... लेकिन रास्ते में ट्रैफिक जाम में फंस गई... और 6 मिनट लेट से स्टेशन पहुंची....4 बजे मेरी ट्रेन थी और मैं 4 बजकर 6 मिनट पर स्टेशन दाखिल हो चुकी थी लेकिन अफसोस 6 मिनट के लिए मेरी ट्रेन छूट चुकी थी....मेरा घर जाना जरूरी था इसलिए मैंने तुरंत टिकट कैंसिल कराया और दूसरे दिन का तत्काल का टिकट लिया...अब आप समझ सकते हैं 6 मिनट लेट होने की सज़ा मुझे मिल गई थी...हां लेकिन अगर मुझे बिहार में कहीं से ट्रेन पकड़ी होती तो आप समझ सकते हैं मैं आसानी से ट्रेन पकड़ सकती थी....वहां 6 मिनट लेट कोई बड़ी बात नहीं....क चीज जरूर ध्यान देने वाली है और वो ये कि...कुछ पल में दुनिया में क्या से क्या हो जाता हैं और हम वहीं के वहीं रह जाते हैं....
अब अंत में बात परीक्षा की भी हो जाए...तो इस मामले में भी बिहार के क्या कहने...मैं इस बात से इंकार नहीं करती कि बिहार में प्रतिभा की कमी नहीं है...यहां के प्रतिभाशाली छात्र देश ही नहीं दुनियाभर में नाम रौशन करते हैं...दरअसल यू कहा जाए तो यहां के छात्र बेहद मेहनती होते हैं....लेकिन परीक्षा में भी समय इनका पीछा नहीं छोड़ती....निर्धारित समय पर परीक्षा हो जाए ऐसा भला कैसे हो सकता है....इस मामले में यूनिवर्सिटी के तो कहने ही क्या...तीन साल का कोर्स वो चार साल में भी पूरा कर दे तो बड़ी बात है...दरअसल वो अपने परीक्षार्थियों को तैयारी का भरपूर समय मुहैया कराना चाहती है....उन्हें लगता है...ऐसा करने से छात्र अपना कोर्स ज्यादा अच्छी तरह पूरी कर पाएगे...हालांकि इसमें जरा सी भी सच्चाई नहीं है....वैसे इसमें गलती केवल यूनिवर्सिटी की ही नहीं है...पूरे शिक्षा तंत्र की है...जिसमें परीक्षार्थियों का भी सफल योगदान होता है...वो भी परीक्षा की तारीख आगे बढ़वाने में पीछे नहीं रहते...मगर ऐसा सभी छात्र करते हों ऐसी बात नहीं है...इनमें वैसे छात्रों का योगदान ज्यादा होता है जिन्हें केवल डिग्री लेने से मतलब है...ऐसे में पढ़ने वाले छात्रों को इनके किए की सज़ा भुगतनी पड़ती है...

अब जब बात निकल ही पड़ी है तो ज़रा मीडिया चैनल की भी बात हो जाए...दरअसल मीडिया में एक-एक पल महत्वपूर्ण होता है...समय पर न्यूज देना हमारी प्राथमिकता होती है...वैसे तो सभी चैनल अपना-अपना बुलेटिन समय पर शुरू करते हैं और अगर बुलेटिन एक मिनट भी लेट हुआ तो उसकी रिपोर्ट बन जाती है...और उसके बाद शुरू होता है बॉस की प्रताड़ना का सिलसिला...लेकिन मैं आपको अंदर की बात बताऊ...मैं एक मीडिया हाऊस में थी...वहां मैं मध्यप्रदेश के लिए काम कर रही थी हालांकि वहीं से 12 राज्यों का चैनल ON AIR होता था जिसमें बिहार का चैनल भी था, वैसे तो बांकी सभी राज्यों के चैनलों में एक मिनट भी बुलेटिन लेट हो जाए तो उसकी रिपोर्ट बन जाती थी...लेकिन बिहार के चैनल में बुलेटिन 5 से 7 मिनट लेट...फिर भी कोई बात नहीं....हुआ यूं...कि मेरे एक करीबी मित्र उस वक्त बिहार डेस्क में न्यूज ऐंकर थे...दरअसल मैं उन्हीं के शहर मुजफ्फरपुर से थी...और मैंने चैनल अभी अभी ज्वॉइन किया था...मैं उसी यूनिवर्सिटी से भी थी जहां से वो पासआऊट हुए थे....मेरे वहां ज्वॉइन करने से पहले ही...मेरे वहां आने की ख़बर उन्हें मिल गई थी...अब एक लड़की उनके शहर से चैनल ज्वॉइन कर रही हो तो लगाव तो हो ही जाता है...ऊपर से मेरे डिपार्टमेंट हेड ने भी उन्हे फोन पर मेरे आने की सूचना दे दी थी और कहा था इस लड़की को गाइड करना...दरअसल मैं अपनी यूनिवर्सिटी की उस बैच की पहली ऐसी कैंडिडेट थी जिसका सेलेक्शन वहां हुआ था...इससे पहले कुछ लड़कों ने वहां ज्वॉइन किया था...इसलिए मैं उन सबके लिए थोड़ी ख़ास थी....
एक बार मैं उनसे फोन पर बात कर रही थी...उनका रात 9 बजे का प्राइम टाइम बुलेटिन था...जो न्यूज चैनल के लिए बेहद अहम होता है लेकिन महाशय मुझसे बात किए जा रहे थे...मुझे लगा कहीं बातों-बातों में वो अपना बुलेटिन लेना न भूल गए हो...9 बजकर 5 मिनट हो चुका था और वो स्टूडियो नहीं पहुंचे थे...9 बजकर 7 मिनट में वो स्टूडियो पहुंचे और 9 बजकर 10 मिनट में बुलेटिन शुरू हुआ...मैंने फोन रखने के बाद घड़ी देखी तो हैरान रह गई...मुझे लगा कहीं मेरी वजह से इनकी क्लास ना लग जाए...एक घंटे का बुलेटिन था और मेरी सांस अटकी थी....जैसे ही दस बजकर 5 मिनट हुआ मैंने फोन घुमाया....फोन लगते ही मेरा पहला सवाल था बुलेटिन रिपोर्ट तो नहीं बना...एंकर ने पूछा किस बात पर...मैंने कहा आज तो बुलेटिन 10 मिनट लेट गया होगा...पर उन्होंने सहज अंदाज में कहा नहीं इतना लेट तो यहां चलता हैं...मैंने राहत की सांस ली....वाकई ऐसा केवल बिहार के चैनल में ही संभव था...

हम अपनी जिंदगी में भले ही कुछ समय के लिए लेट हो जाए लेकिन घड़ी की सुई अपना काम करती चली जाती है बीता हुआ पल कभी लौट कर नहीं आता...मतलब ये कि हर पल को हमें सहेजना चाहिए और उस पल को खुलकर जीना चाहिए....क्या पता ये ज़िंदगी दोबारा मिले ना मिले...क्यों हम इन खूबसूरत लम्हों को बेवजह जाया करें...

                                                                                   

गुरुवार, जनवरी 28

तेरा सुर मिले मेरे सुर से ना....

"मिले सुर मेरा तुम्हारा....तो सुर बने हमारा"


दूरदर्शन पर दिखाए जानेवाले इस गीत को आज भले ही हम भूल चुके हों और ये गीत आज हमारे अंदर कोई देशभक्ति की भावना न जगाती हो...लेकिन इस गीत को अब नए क्लेवर में 26 जनवरी से देश के सभी नामी-गिरामी चैनल परोस रहे हैं...पुराना गीत जहां दूरदर्शन तक ही सिमट कर रह गया था वहीं नए गीत ने सीमा लांघ ली है...सभी चैनल इसे प्राथमिकता के साथ चला रहे हैं....मिले सुर मेरा तुम्हारा गीत सुनकर तो आज की युवा पीढ़ी का बचपन गुजरा है...वहीं उस पीढ़ी के लोगों के लिए भी ये गीत काफी यादगार रहा है...उस समय चैनलों की इतनी होड़ नहीं हुआ करती थी...लोग दूरदर्शन पर ही आश्रित थे...
लेकिन आज तो चैनलों की आंधी सी आ गई है...विभिन्न चैनलों पर दिखाए जानेवाले इस नए गीत में देश के करीब सभी सुपरस्टार दिखाई दे रहे हैं जिनका सिक्का आज बॉलीवुड में चलता है...इसके साथ ही ऐसी दिग्गज हस्तियां भी नज़र आ रही है जो उद्योग जगत में देश ही नहीं दुनियाभर में अपनी साख रखते हो...मज़ेदार बात तो ये है कि इस विडियो में सरोद वादक, संतूरवादक और कई जानेमाने कलाकार अपनी अगली पीढ़ी के साथ दिख रहे हैं....जो वाकई कौतूहल पैदा करती हैं...अमान-अयान, अनुष्का शंकर और कई नए युवा वाद्य यंत्र वादक जो अपने पिता की तरह पहचान नहीं बना पाए...उन्हें इस गीत ने पहचान दिलाई है...इस गीत में अभिषेक बच्चन- ऐश्वर्या राय बच्चन, शाहरुख खान, जैकी श्राफ और जूही चावला को नए अंदाज़ में पेश किया गया है...सलमान खान का अंदाज़ लोगों को जरूर लुभाता है... मूक बधिर बच्चों के साथ जब वो सुर से सुर मिलाते हैं तो उन्हें देखकर दिल बाग-बाग हो जाता है...
नए गीत में कुछ पुराने चोहरों को भी तरज़ीह दी गई है...हालांकि इस पूरे गीत में भव्यता साफ-साफ झलकती है...चाहे मुकेश अंबानी और उनकी पत्नि का सेट हो या बिग बी अमिताभ बच्चन का...भव्यता और बिलासिता अपनी छाप छोड़ ही जाती है...पुराने गीत में जो सोंधी मिट्टी की खुशबू है...इस नए गीत में उसकी कमी खल जाती है...पुराने गीत के एक-एक शब्द और बोल से जैसे हमारा गहरा नाता हो...वो गीत लोगों की जुबान पर इस कदर चढ़ चुका है कि उतरना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा लगता है...ऐसे में नए गीत को लोग पचा नहीं पा रहे हैं...कहीं न कहीं कुछ तो कमी रह गई है...पुराने गीतों और फिल्मों को नए क्लेबर में परोसने की तो जैसे हमारे देश में परंपरा सी ही चल पड़ी है...या फिर यू कहें कि हॉलीवुड और दूसरी भाषाओं से बोल और धुन चुराने की आदत हो...इसे देखकर तो यही लगता है कि बॉलीवुड में नए आइडियाज का अकाल पड़ा हो...नए नए पॉकेट में बेचें तुमको चीज़ पुरानी वाली तर्ज को अपनाते हुए बॉलीवुड अलग-अलग प्रयोगों में जुटा है...लेकिन गौर करने वाली बात तो ये है कि जब भी रिमिक्स या पुरानी फिल्मों को नए अंदाज में पेश किया गया है...लोगों ने इनमें से ज्यादातर को ख़ारिज ही किया है...इक्के-दुक्के हिट हो गए तो पुराने जैसा करिशमा नहीं दिखा पाए हैं...यानी एक बार जो हिट हो गया दर्शक उसकी तुलना दर्शक तुरंत नए से करने लगते हैं...ऐसे में नए गीतों और फिल्मों से दर्शक ज्यादा ही उम्मीदें बांध बैठते हैं...तो फिर नए वर्जन में ख़ामी कहीं न कहीं मिल ही जाती है...और हम कहते हैं old is gold…




नए गीतों के साथ भी ऐसा ही हो रहा है..भले नए गीत में काफी प्रयोग किए गए हों...दो पल के लिए उसकी चकाचौध और आधुनिकता भले ही लुभा सकती हो लेकिन ये गीत ज्यादा देर के लिए हमारी पलकों पर नहीं ठहर सकता...गीत में आधुनिकता के सभी रंग भरे गए हों लेकिन पुराने गीत के सुरों की कमी खलती है इसके साथ ही जिस कदर पुराने गीत में देश के अलग-अलग क्षेत्रों की यादों और बोलियों को परोसा गया था उसकी कमी नए गीत में महसूस होती है...ऐसा लगता है जैसे पुराना गीत हमारे रोम-रोम में बसा हो भले ही आज हम उन्हें उतनी शिद्दत से ना सुनते हो...लेकिन उसकी एक-एक तान से लगता है हमारा गहरा नाता हो...हमारे ज़ेहन में आज भी वो गीत रचा बसा है ...मतलब ये कि
''नहीं मिला सुर मेरा...और...तुम्हारा''






मंगलवार, नवंबर 24

सनसनीख़ेज़ रिपोर्ट!




हंगामा खड़ा करना हमारा मक्सद नहीं…हमारी कोशिश है कि सूरत

बदलनी चाहिए...
मीडिया का मक्सद भी सनसनी फैलाना नहीं...मीडिया का मक्सद है...बस फिज़ा बदलनी चाहिए...लेकिन मीडिया अपने उद्देश्यों से कभी-कभी भटक जाती हैं...मीडिया को अपने दायरे में रहकर ही काम करना चाहिए ना कि अपने दायरों को भूलकर आज की आंधी दौड़ में शामिल हो जाना और सनसनी फैलाना अपना लक्ष्य बना लेने से काम चलेगा...माना की बाज़ार में खुद को स्थापित रखने के लिए मीडिया में हर रोज गलाकाट प्रतिस्पर्धा है लेकिन मीडिया को नहीं भूलना चाहिए की उसका काम ख़बरों से लोगों को अवगत करना है न की अपने हित को ध्यान में रखकर अपने स्वार्थों की पूर्ति करने मात्र से काम चल जाएगा...पिछले दिनों मीडिय का विभत्स चेहरा सामने आया...संसद के पटल पर लिब्रहान रिपोर्ट आने से पहले ही एक अंग्रेजी समाचार पत्र ने इसे प्रकाशित किया....जो कि बाकई एक गलत कदम है...किसी भी रिपोर्ट को सदन में पेश होने से पहले इसे प्रकाशित नहीं किया जा सकता...आखिर मीडिया को ये अधिकार दिया किसने हैं? क्या समाचार पत्र के प्रकाशक...प्रकाशन के सभी नियम और कायदों को भूल चुके हैं...क्या ये रिपोर्ट केवल अनुमान के तहत बनाई गई थी...किसी भी रिपोर्ट को प्रकाशित करने से पहले उनके पास पुख्ता सुबूत होने चाहिए क्या समाचार पत्र के पास इसके पुख्ता सुबूत मौजूद थे?...क्योंकि कल्पना के आधार पर संपादक किसी रिपोर्ट को अमली जामा नहीं पहना सकते... अब सलाव ये उठता है कि ये रिपोर्ट लीक हुई तो हुई कैसे? क्या गृहमंत्रालय ने इसे लीक किया? या फिर लिब्रहान रिपोर्ट को लीक होने में उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश एम एस लिब्रहान का योगदान रहा...ये काफी गंभीर मुद्दा है...खैर लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट लीक होने से संसद के दोनों सदनों में जैसे भूचाल सी आ गई...आखिर कैसे लीक हुई ये रिपोर्ट … ये एक गंभीर मुद्दा है...
बाबरी मस्जिद विध्वंस पर अपनी रिपोर्ट के ‘‘लीक’’ होने से क्षुब्ध एम एस लिब्रहान ने इसे लीक करने से साफ इनकार किया और कहा कि वह ऐसे ‘‘चरित्रहीन’’ व्यक्ति नहीं हैं जो मीडिया को रिपोर्ट लीक कर देंगे... उन्होंने मीडियाकर्मियों को ‘दफा हो जाने‘ को भी कहा.... लिब्रहान ने कहा, ‘‘रिपोर्ट पर मैं नहीं बोलूंगा....अगर मीडिया के पास रिपोर्ट है तो जाइए और पता लगाइए कि मीडिया को यह कहां से मिली और किसने रिपोर्ट दी.’’जब यह पूछा गया कि विपक्ष ने रिपोर्ट को ‘‘चुनिंदा तरीके से लीक’’ किये जाने का आरोप लगाया है तो लिब्रहान ने कहा, ‘‘विपक्ष को कुछ भी कहने दीजिए लेकिन इससे आपका तात्पर्य क्या है?’’ क्षुब्ध लिब्रहान ने भड़कते हुए कहा, ‘‘मेरे चरित्र को चुनौती मत दीजिए, दफा हो जाइये.’’ लिब्रहान ने कहा, ‘‘मैं ऐसा चरित्रहीन आदमी नहीं हूं कि संसद में पेश होने से पहले मीडिया को रिपोर्ट सौंप दूंगा.’’ हालांकि लिब्रहान की मीडिया के प्रति ये बेरुखी बिल्कुल वाजिब था... वहीं गृहमंत्री पी चिदंबरम ने भी दावा किया की रिपोर्ट की केवल एक कॉपी है जो बिल्कुल सुरक्षित है...विपक्षी दल भाजपा ने भी इस मुद्दे को सदन में खूब भुनाया... एक अखबार ने दावा किया था कि छह दिसंबर 1992 को हुए बाबरी विध्वंस की जांच करने वाले एक सदस्यीय लिब्रहान आयोग ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी और भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी को घटना में आरोपित किया है. लिब्रहान आयोग ने 17 साल का समय लिया और इस साल जून में अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौंपी. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी संघ परिवार के 68 नेताओं तथा नौकरशाहों की उस सूची में शामिल किया गया हैं, जिन्हें लिब्रहान आयोग ने अयोध्या मुद्दे पर देश को सांप्रदायिक वैमनस्य के मुहाने पर पहुंचाने का दोषी पाया। आयोग की भारी-भरकम रपट को संसद के दोनों सदनों में गृह मंत्री पी चिदंबरम ने पेश किया। न्यायमूर्ति मनमोहन सिंह लिब्रहान की अध्यक्षता वाले आयोग ने 17 जून को अपनी रपट सरकार को सौंप दी थी। अयोध्या में 17 साल पहले बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के मामले की जांच करने वाले लिब्रहान आयोग की लगभग 1000 पृष्ठ की रपट में भाजपा के अन्य वरिष्ठ नेताओं मुरली मनोहर जोशी और उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह तथा गिरिराज किशोर एवं अशोक सिंघल जैसे विश्व हिंदू परिषद के शीर्ष नेताओं को भी दोषी ठहराया गया। वाजपेयी, आडवाणी और जोशी को भाजपा का छद्म उदारवादी नेतृत्व करार देते हुए आयोग ने कहा कि वे अयोध्या में 16वीं सदी के ढांचे को ढहाए …आयोग ने तीनों को दोषी करार देते हुए कहा कि इन नेताओं को संदेह का लाभ नहीं दिया जा सकता और उन्हें निर्दोष नहीं करार दिया जा सकता। रपट में कहा गया कि इन नेताओं ने जनता के विश्वास का उल्लंघन किया... लोकतंत्र में इससे बड़ी धोखाधड़ी या अपराध नहीं हो सकता ...जहां तक बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के सिलसिले में हुए मामलों का सवाल है, एटीआर में रायबरेली की विशेष अदालत में आठ आरोपियों के खिलाफ दायर मामलों और 47 अन्य मामलों का उल्लेख है और अज्ञात कारसेवकों के खिलाफ भी एक मामला है। इन मामलों की सुनवाई तेज करने के लिए कदम उठाए जाएंगे।

आयोग की रिपोर्ट ने भाजपा में खलबली मचा दी...भाजपा को अलट बिहारी वाजपेई को रिपोर्ट में शामिल किए जाने पर ऐतराज है...वहीं उमा भारती ने इस मामले की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए कहा कि उनके पास पुख्ता सुबूत है जिससे वो साबित कर सकती हैं कि वो निर्दोश हैं...बहरहाल आयोग की रिपोर्ट से देश की एकता और अखंडता में कोई बदवाल नहीं आया है...जो काफी खुशी की बात है

रविवार, नवंबर 15

राज का गुंडाराज

महाराष्ट्र में चलता है ठाकरे परिवार का गुंडा राज...खासतौर से मुंबई में...ऐसा लगता है जैसे महाराष्ट्र उनके पूर्वजों की जागीर हो...भले ही राजा महाराजाओं के ठाट-बाट ख़त्म हो गए… लेकिन इस परिवार के ठाट-बाट आज भी बरकरार हैं...आज से नहीं बाल ठाकरे के समय से ही ये राज चलता आ रहा है...मुंबई तो जैसे उन्होंने खरीद ली हो...मराठी मानुषों की राजनीति करने वाला ये परिवार आए दिन विवादों में घिरा नजर आता है...
इस बार बाल ठाकरे का डंडा चला है क्रिकेट सम्राट सचिन तेंदुलकर पर क्रिकेट के महानायक सचिन तेंदुलकर ने अपने खेल के 20 साल पूरे करने पर खुद को पहले 'भारतीय' क्या कह दिया कि भारतीय राजनीति में अचानक ही एक नया भूचाल आ गया। मीडिया से मुखातिब सचिन ने कहा, 'मुंबई सबकी है। मैं भी मराठी हूं और मुझे इस पर गर्व है। लेकिन, सबसे पहले मैं एक भारतीय हूं।' शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने पार्टी के मुखपत्र सामना में सचिन की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि वह अपने अंतरराष्ट्रीय खेल का मैदान संभालें और खेल में उन्होंने जो कमाया है उसे राजनीति के मैदान में नहीं गवाएं। शिवसेना प्रमुख ने सचिन की आलोचना करते हुए कहा था कि उनके इस बयान से मराठी लोगों की नजरों में सचिन की इज्जत कम हो सकती है। उन्होंने कहा था कि मराठी मानुषों ने संघर्ष करते समय जिस समय मुंबई को हासिल किया था उस समय सचिन का जन्म भी नहीं हुआ था। जिस दिन पूरा देश सचिन की 20 वर्षीय उपलब्धियों पर उनकी शान में कसीदे काढ़ रहा था, उसी दिन शिवसेना प्रमुख बालासाहब ठाकरे उनके एक देशभक्तिपूर्ण बयान पर उन्हें एक धिक्कार भरा पत्र लिखने में व्यस्त थे। ठाकरे और सचिन, दोनों ही मराठी मानुष। पर एक के सीमित सोच के चलते मराठी मानुष महाराष्ट्र में भी सिमटते जा रहे हैं, तो दूसरे की खूबियों के चलते उनकी बढ़ी प्रतिष्ठा के लिए दुनिया की सीमाएं भी छोटी पड़ जाती हैं...
ठाकरे ने करीब 42 साल पहले शिवाजी पार्क में दशहरे के दिन विशाल रैली करने की परंपरा डाली। इन्हीं रैलियों में अपनी तेजतर्रार शैली में भाषण देकर मुंबई महानगरपालिका से लेकर मंत्रालय तक की सत्ता पर काबिज होने में सफल रहे। इसी शिवाजी पार्क में सचिन तेंदुलकर भी रमाकांत आचरेकर सर की छत्रछाया में क्रिकेट के गुर सीखते हुए आगे बढ़े।



ठाकरे के सीमित सोच का ही परिणाम है कि गत विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी वो माहिम विधानसभा क्षेत्र भी गंवा बैठी, जिसमें शिवसेना प्रमुख के रणनीति का केंद्र रहा सेना भवन खड़ा है। वास्तव में यह हार ठाकरे के हाथ से फिसलते मराठी वोट बैंक का प्रतीक मानी जा रही है, जिसे रिझाने-फुसलाने के लिए बाल ठाकरे अब उस मराठी मानुष पर भी प्रहार करने से नहीं चूक रहे हैं, जो देश के साथ-साथ मुंबई का नाम भी सारी दुनिया में रोशन करता आ रहा है।
सचिन को लिखे ठाकरे के धिक्कारपूर्ण पत्र से आम मराठी मानुष भी सन्न है। सचिन पर ठाकरे की इस बेतुकी टिप्पणी की हर तरफ आलोचना हो रही है...भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड [बीसीसीआई] ने तो इसके लिए ठाकरे के खिलाफ कड़ी कार्रवाई तक की मांग कर डाली।

वहीं करण जौहर की आनेवाली फिल्म "कुर्बान" के पोस्टर पर अश्लीलता फैलाने का आरोप लगाने वाली शिवसेना ने बॉलीवुड अभिनेत्री करीना कपूर को साडी भेजी हैं। शिवसेना के नेता जीतेंद्र जानवले ने करीना को 1200 रूपये की साडी भेजी। ताकि वह अपनी खुली पीठ ढक सकें। हालांकि करीना ने इस पर कोई कॉमेंट करने से इंकार किया हैं। हाल ही में शिवसेना कार्यकर्ताओं ने करीना की आनेवाली फिल्म "कुर्बान" के पोस्टर में उनकी पीठ दिखाए जाने को लेकर गुस्से का इजहार किया था। शिवसेना नेता जितेंद्र जानवले ने कहा था कि मुझे समझ नही आता कि अधिकारी इस तरह के पोस्टर्स को पास कैसे कर देते हैं। रास्ते से महिलाएं और बच्चों भी गुजरते हैं। इस तरह के पोस्टर्स का उन पर क्या असर पडता होगा। इस पर करीना ने फिल्म "कुर्बान" के प्रमोशन के दौरान कहा था कि मुझे अब तक कोई साडी नहीं मिली हैं लेकिन मुझे उम्मीद है कि यह अच्छी होगी। जनावाले के नेतृत्व में शिवसेना की महिला कार्यकर्ताओं ने करीना के उस पोस्टर के सामने साडी बांध दी थीं जिसमें उन्हें कम कपडों में दिखाया गया हैं। सैफ के साथ खुली पीठ दिखाने वाले पोस्टर को अभद्र बताए जाने पर करीना ने कहा, मुझे पोस्टर में कुछ भी गलत नहीं दिखा। मेरा मानना है कि यह बेहद सौंदर्यपरक हैं।

ठाकरे परिवार समय-समय पर फिल्म जगत से जुडे लोगों पर भी तानाशाही करने से नहीं चूकते...कभी किसी अभिनेता या अभिनेत्री की कोई हरकत बुरी लग जाती है तो कभी किसी दूसरे की...मतलब मुंबई में रहना है तो ठाकरे परिवार के समक्ष सिर झुका कर रहो...और ऊंची जुबान में बात की तो खैर नहीं

अब बात राज ठाकरे की....बालासाहब ठाकरे की तरह ही राज ठाकरे भी मुंबई में हिन्दीभाषियों को खदेड़ने में जुटे हैं...हाल ही में राज ठाकरे की पार्टी एमएनएस ने भारतीय स्टेट बैंक यानी एसबीआई क्लर्क की परीक्षा में शामिल होने वाले ‘बाहरी अभ्यर्थियों’ का विरोध करते हुए उनके खिलाफ प्रदर्शन करने की चेतावनी दी थी। इसे देखते हुए राज्य सरकार ने सभी परीक्षा केंद्रों पर सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए और परीक्षा शांतिपूर्वक संपन्न हुई। पिछले साल ही परीक्षा में सम्मिलित होने वाले एक छात्र की मौत ने पूरा देश को हिला कर रख दिया था ...करीब दो साल पहले राज ठाकरे ने उत्तर भारतीयों के विरुद्ध ये अभिया शुरू किए था कि दूसरे राज्यों से छात्र यहां परीक्षा में सम्मिलित होने नहीं आ सकते...

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के विधायकों ने सारे नियमों और लोकाचार को धत्ता बताते हुए समाजवादी पार्टी के नेता अबु आजमी पर सदन के अंदर उस वक्त हमला कर दिया, जब वे हिंदी में शपथ ले रहे थे।सदन की कार्रवाई शुरू होने के बाद जब अबु आजमी ने हिंदी में शपथ लेना शुरू किया तो मनसे कार्यकर्ता खड़े होकर नारेबाजी करने लगे और उन्होंने अबू आजमी का माइक छीन लिया और उनका शपथ पत्र छीन लिया। उसके बाद वे धक्का-मुक्की करने लगे और अबू आजमी पर एक विधायक राम कदम ने थप्पड़ भी चलाया, जो उनको लगा। घटना के बाद सदन को 20 मिनट के लिए स्थगित कर दिया गया।
इस मामले ने भी देशभर में ठाकरे की जमकर आलोचना हुई...आजमी की बहू आयशा टाकिया ने तो राज ठाकरे को सीधी चुनौती देते हुए कहा है कि राज और उनके जैसे अन्य नेताओं को लात मारकर राज्य से बाहर निकाल देना चाहिए।
यानी अब ठाकरे परिवार का मराठी मानुषों बाला दाव काम नहीं कर रहा अब उन्हें कोई और मुद्दा तलाशने की जरूरत है...अब ये मुद्दा उनकी तरफदारी कम आलोचना ज्यादा दिला रही है...ठाकरे परिवार को मराठी मानुषों के दिल में राज करने का दूसरा हथकंडा अपनाना होगा...अब तो बच्चे भी ठाकरे परिवार पर ऊंगली उठाने से नहीं चूकते...
ठाकरे परिवार के सामने ये चुनौती है कि वो अपने परिवार के सभी सदस्यों को महाराष्ट्र में ही समेट कर रखे...क्या वो नहीं चाहते कि उनके परिवार के सदस्य दूसरे देशों की यात्रा करे वहां काम करें या देश के दूसरे राज्यों की सैर करें....क्या वो अपने परिवार को भी इसी दायरे में रख सकते हैं...
हर दूसरे घर में एक बिगड़ा शहजादा जन्म लेता है...और घर के दो टुकड़े हो जाते हैं...दो भाईयों में आपस में नहीं बनती...बिगड़े शहजादों के लिए घर तो बंट जाता है...लेकिन क्या किसी बिगड़े शहजादे के लिए क्षेत्र को बांटा जाना चाहिए...ऐसा होता रहा तो देश के न जाने कितने टुक्डे करने पड़ें...
महाराष्ट्र की जनता भी इतनी बेवकूफ नहीं...उन्हें देश के दूसरे राज्यों में जाने का हक है...घूमने का हक है देश दुनिया देखने का हक है अगर वो महाराष्ट्र में किसी दूसरे राज्यों के लोगों का आने या वहां रहने पर रोक लगाते हैं फिर भला वहां के मानुष किस मुंह से दुसरी जगह जा सकेंगे...रोजगार की तलाश कर
सकेंगे
ठाकरे के इन व्यवहारों ने ये प्रश्न खड़ा कर दिया है कि यदि लता मंगेशकर, सुनील गावस्कर और सचिन तेंदुलकर जैसी हस्तियां सिर्फ अपनी मातृभाषा के दायरे में रह कर अपने क्षेत्र में काम करते तो क्या वे सारी दुनिया की वाहवाही लूट पाते?


सीमाओं में देश को बांधना कितना उचित है...भाषा के आधार पर देश की जनता को जोड़ने की जरूरत है तोड़ने की नहीं...वैसे ही देश में कम समस्याएं नहीं हैं...लोग रंग- रूप...कार्य...धर्म संप्रदाय के आधार पर बंटे हैं उन्हें एक सूत्र में पिरोने की जरूरत है...



मंदिर...मस्जिद....गिरजाघर ने

बांट दिया भगवान को

धरती बांटी....सागर बांटा

मत बांटो इंसान को...मत बांटो इंसान को

सोमवार, नवंबर 9

लैपी मय हुई दुनिया






गूगल में फैलते गणराज्य में कम्प्यूटर ने अपनी गहरी पैठ बना ली है…दुनिया धीरे-धीरे कम्प्यूटर के
शिकंजे में कैद होने लगी है...देशी ही नहीं विदेशी कंपनियां भी ग्राहकों को खूब लुभा रही हैं...आपको याद होगा रिलायंस ग्रुप के जनक धीरूभाई अंबानी का सपना था 'कर लो दुनिया मुट्ठी
में'...यानी धीरूभाई अंबानी हर हाथ में मोबाइल देखना चाहते थे...और आज देखिये उनका ये सपना
साकार होता नजर आ रहा है...आज मध्यमवर्ग से लेकर निचले वर्ग के लिए भी मोबाइल कोई बड़ी
चीज़ नहीं रह गई है...दूधवाला हो पेपरवाला हो यहां तक की रिक्शा चलाने वालों के पास भी
मोबाइल पहुंच चुके हैं...उन्हीं की तर्ज पर अब कम्प्यूटर कंपनी भी हर हाथ में कम्प्यूटर पहुंचाने की मुहिम में जुटा है...
कम्प्यूटर यानी अब लैपटॉप का जमाना आ रहा है...लैपी के आकार और रंग में बदलाव कर कंपनी
ग्राहकों को लुभा रहे हैं... easy to handle के फंडे को अपनाते हुए बिल्कुल बजट में ग्राहकों
को रंग-बिरंगे लैपटॉप मुहैया कराए जा रहे हैं...कई कंपनियों ने अल्ट्रा स्लिम और कलरफुल लैपी
बनाकर लोगों को अपना मुरीद बना दिया है जब से सोनी ने कंज्यूमर नोटबुक के रूप में बाजार में
अपना नया लैपटाप वायो एक्स रेंज पेश किया है...महिलाए भी लैपी के प्रति आकर्षित होने लगी
हैं...जब से कम्पनी ने वायो श्रृंखला के उत्पादों के प्रचार के लिए अभिनेत्री करीना कपूर को ब्रांड
अम्बेस्डर बनाया है...महिलाओं का लैपी के प्रति झुकाब बढ़ता जा रहा है...655 ग्राम वजनी वायो
एक्स दुनिया का सबसे हल्का लैपटॉप है। ग्राहकों की इच्छा को ध्यान में रखते हुए कम्पनी ने इसे
कई डिजाइन और रंगों में पेश किया है। HCL और बांकी कई कंपनियों ने भी स्लिम लैपी बाजार
में उतारी है...ये रंग बिरंगी लैपी महिलाओं को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं...कामकाजी महिलाओं
के अलावा भी अब आम महिलाएं भी लैपी की कमी महसूस करने लगीं हैं...पहले लोगों को लैपी
खरीदने के लिए लोन लेना पड़ता था...या फिर किस्तों में पैसे चुकाने पड़ते थे लेकिन अब लैपी की
घटी कीमतों ने लोगों को हाथों-हाथ खरीदारी की सुविधा दी है... मुझे लगता है एक समय ऐसा भी आएगा जब कामकाजी महिलाएं ही नहीं गृहणीयां भी अपनी ड्रेस
के अनुसार लैपी का प्रयोग करने लगेंगीं...यानी जिस कलर का ड्रेस उस कलर की लैपी...घर बैठे ही
सारा काम हो जाया करेगा...और हो भी क्यों न एक छोटी सी चीज़ आपकी दुनिया जो बदल देती
है...आपकी दुनिया में रंग भर देती है...
धीरे धीरे बच्चों को भी लैपी काफी प्रभावित करने लगे तो कोई नई बात नहीं होगी...माता-पिता
अपने बच्चों को किताब-कॉपी की बजाए हाथ में एक लैपी थमा देंगे और बच्चों की पूरी पढ़ाई लैपी
पर ही हो जाया करेंगी...माता पिता भी हर साल नई किताबें और कॉ़पियां और यहां तक की हर
महीने कलम या पेंसिल खरीदने से भी बच जाएंगे...बच्चों पर किताबों का बोझ कम हो जाएगा...बस
हर रोज अपना लैपी लेकर स्कूल चले जाओ हो गई पढ़ाई...कॉलेजों में भी बस लैपी पर ही सारी
पढ़ाई हो जाया करेंगी...हालांकि जब भी कोई नई शुरूआत होती है उससे पहले नया विवाद जन्म
लता हैं...हो सकता है इसका स्कूलों में विरोध हो लेकिन इसके फायदे इतने हैं कि लोग इसे ना
चाहते हुए भी अपना ही लेंगे...जैसा की स्कूली बच्चों ने मोबाइल अपना लिया है और साइकिल
छोड़कर बाइक अपना ली है...जैसे मोबाइल अब मध्यमवर्गीय परिवार के साथ-साथ निम्म वर्गीय परिवारों के लिए भी सामान्य सी
चीज बनकर रह गई है वैसा ही भविष्य में लैपटॉप का भी इस्तेमाल जल्द ही होने लगेगा...लेकिन ग्राहक सोचसमझ कर इसे खरीदना उचित समझते हैं...भले ही छोटा लैपी आपके लिए लाना ले जाना आसान हो लेकिन उसके फायदे और नुक्सान को ध्यान में रखकर ही खरीदना उचित होगा... एक बार मैं पिक्चर देखने मॉल पहुंची...पिक्चर शुरू होने में थोड़ा वक्त था मैंने सोचा चलो कुछ शॉपिंग हो जाए...खाली समय का सदुपयोग भी हो जाएगा और बाजार में क्या नई चीज लॉच हुई है इसकी भी जानकारी हो जाएगी...मैं एक-दो दुकानों में गई...फिर मेरी नज़र एक Electronic की दुकान पर पड़ी...मैं अंदर गई...सामने सोनी का छोटा लैपी रखा था...रंग बिरंगे कलर में रखे लैपी ने मुझे भी प्रभावित किया...मैंने सोचा चलो एक-दो और लैपी देख ली जाए...मैंने लैपी की तहकीकात करनी शुरू की...सबके बारे में जानकारी जुटाने लगी...और अंत में Puzzled हो गई...समझ नहीं आ रहा था कौन सा खरीदना उचित होगा...मैंने एक दो लॉगशीट मांगी सोचा घर जाकर पहले देख तो लूं किसमें क्या सही है कौन सा लेना उचित होगा...अंत में मैंने सोचा किसी कम्प्यूटर के जानकार से पूछने के पश्चात ही कोई फैसला लूंगी...मैंने अपने कुछ सहयोगियों से पूछा...किसी ने कुछ बताया किसी ने कुछ...किसी ने किसी एक लैपी की खूबी बताई तो किसी ने दूसरे की...खैर मैंने फैसला किया भले ही एक बार पैसे लगे...लेकिन मैं ऐसा लैपी लूं जिसमें सारी खूबियां हो ताकि भविष्य में मुझे कोई परेशानी न हो।

मंगलवार, अक्टूबर 27

नशे की गिरफ्त में दुनिया

कौन कहता है शराब पीना या सिगरेट पीना ही सिर्फ बुरी लत्त या यू कहें की नशा है...? लत्त अब कई तरह के हो गए हैं... जैसे इंटरनेट की लत्त....फोन पर बाते करने की लत्त...टीवी देखने का नशा... कुछ ख़रीदने यानी शॉपिंग का नशा...आधुनिक उपकरण बाज़ार में आए नहीं की उसे झट से ख़रीद लेने का नशा...ज्यादा बोलने की लत्त...कुछ लिखने या पढ़ने का नशा......घूमने की लत्त......खेलने का नशा...और भी कई तरह का नशा हैं
नेट का नशा
इनमें इंटरनेट का नशा आज सिर चढ़कर बोल रहा है...युवा ही नहीं बच्चे भी इंटरनेट से चिपके नज़र आते हैं...नेट पर घंटों बीत जाता हैं और पता ही नहीं चलता...सारे कामकाज छोड़कर लोग नेट पर बैठे रहते हैं...लोग हर रोज़ सुबह-शाम अपना मेल चैक करना नहीं भूलते...नेट ऐसा माध्यम बनता जा रहा है जिसके बिना लगता है सारा काम अधूरा है...नेट पर चैट करना हो या विडियो कॉन्फ्रेंसिंग...लोग इनमें खूब समय बर्बाद करते हैं....और रम जाते हैं...बच्चों के लिए तो गेम्स की भरमार नेट पर मौजूद है...पिक्चर्स देखनी हो गाने सुनने हो या फिर खेल की ताज़ा जनाकारी लेनी हो…पलक झपकते ही आपके सामने सबकुछ हाज़िर है...ऐसा लगता है अलादीन का चिराग हो नेट...समाचार जानना हो या किसी गहन मुद्दे की अपटुडेट जानकारी हासिल करनी हो सबकुछ आपको मिल जाएगा इसपर...आप नेट के माध्य से दुनियाभर से जुड़ सकते हैं...आज तो फोन पर भी नेट मुहैया करा दी गई है...लोग दिनरात नेट से जुड़े रहते हैं...वैसे बड़े काम की चीज़ है ये नेट...और इसका नशा ऐसा कि एक बार लग जाए तो जीवनभर आप इससे छुटकारा नहीं पा सकते...

फोन की लत्त
मोबाइल ही नहीं लैंडलाइन पर भी लोग घंटों बतियाते रहते हैं...ऐसा नहीं है कि लोग हर समय काम की ही बातें करते हैं...लोगों के पास ढेर सारा समय है फोन पर बर्बाद करने के लिए...दिनभार की जानकारी हासिल करनी हो या किसी की चुगली करनी हो लोग फोन का सही इस्तेमाल करना जानते हैं…प्रेमी प्रेमिका के लिए तो बड़े काम की चीज़ है ये फोन औऱ ऊपर से फोन पर कुछ चार्ज लेकर 24 घंटे फ्री सेवा ने तो इनका काम और भी आसान कर दिया है...एक दिन आपका फोन खराब हो जाए या आपका फोन गुम हो जाए ऐसा लगता है जैसे दुनिया से आप बिल्कुल कट से गए हों...

टीवी देखने या
न्यूज पेपर पढ़ने का नशा
ये भी अजीब बीमारी है इसके मरीज़ बिना टीवी देखे या बिना अखबार पढ़े एक दिन भी नहीं रह सकते...वैसे टीवी यानी बुद्धू बॉक्स ने सबके मनोरंजन का ठेका उठा रखा है...हर वर्ग को ध्यान में रखकर इसमें मनोरंजन के साधन उपलब्ध कराए जाते हैं...घर की गृहणियों के लिए सास बहू के सीरियल और फिल्मी जगत की चटर-पटर हैं तो वहीं युवाओं के लिए अनेक संगीत और खेल चैनल...बुजुर्गों के लिए समाचार और अर्थव्यवस्था से जुड़ी खबरें हैं योगा और हास्य मनोरंजन से भरपूर सीरियल हैं तो बच्चों के लिए कार्टून और ढेर साले रियलीटि शो हैं
वहीं अखबार एक दिन देर से ही सही लेकिन लोगों को लिखित जानकारी मुहैया कराता है...इतनी सारी चीज़ें आपको एक साथ मिल जाए तो आप भला इनके चंगुल से खुद को कैसे बचा सकते हैं?
शॉपिंग का नशा
कुछ लोगों को शापिंग का नशा इस कदर होता है कि बाज़ार में चीज़ आई नहीं की बस इसे ख़रीदना हैं...महिलाओं और लड़कियों को जहां कपड़े और गहने ख़रीदने का नशा होता है नए डिजाइन के कपड़े बाजार में आए और उनके पास वो परिधान होने चाहिए...उस डिजाइन के गहने पहनने हैं तो पहनने हैं...वहीं युवाओं को नई बाइक्स औऱ नया हैंडसेट (मोबइल) खरीदने का नशा छाया रहता है...कुछ लोगों को नई गाड़ी ख़रीदने का नशा होता है तो कुछ को नया घर खरीदने का...

बोलने की लत्त
कुछ लोग इतने बातूनी होते हैं कि उन्हें ख़ुद ही नहीं पता होता है कि वे क्या बोल रहे हैं...कब क्या बोलना है...इससे अनजान वे कभी भी कुछ भी बोल जाते हैं...कई बार अपनी इस हरकत के कारण तो वे लोगों का भरपूर मनोरंजन करते हैं लेकिन कई बार अपनी इस आदत के कारण बुरी तरह फंस भी जाते हैं...लेकिन उनके मुंह पर ताला नहीं लगाया जा सकता...वैसे बोलना भी एक कला है…जो सबके बस की चीज़ नहीं…कुछ लोग तो अपने बोलने की आदत से ही लोगों के बीच मशहूर हो जाते हैं...और लोगों को उनकी कमी खलती है

लिखने या पढ़ने का नशा
अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए कुछ लोग लेखन कार्य पर भरोसा करते हैं...वैसे भी अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है लेखन कला...इसके माध्य से आप अपने दिल की बात बेहद आसानी से दुनिया के सामने रखते हैं...कुछ लोगों को लेखन का बड़ा शौक होता है...बिना लिखे उनका वक्त ही नहीं गुज़रता...वैसे ये ऐसा माध्यम है जो आपको मर कर भी अमर बना सकता है...कई लेखक...शायर...कवि...पत्रकार अपनी लेखन कला से मरकर भी अमर हो गए...दुनिया आज भी उन्हें याद करती है...और लोग उसे पढ़ते हैं उनका सम्मान करते हैं...
देखा जाए तो कुछ लोगों की पढ़ने का ऐसा चस्का होता है कि वो अपनी किताबों में इस कदर खो जाते हैं कि उन्हें पता ही नहीं चलता की उनके आस-पास हो क्या रहा है...दीन-दुनिया से बेख़बर वो अपनी किताबों में आंखें गड़ाए रहते हैं...
एक बार मैं अपने पापा के साथ एक एक्जाम देने बनारस जा रही थी...ट्रेन में मैंने एक लड़की को देखा...देखने में तो वो टॉम ब्वॉय जैसी लगी...वो भी मेडिकल का एक्जाम देने दिल्ली जा रही थी...मोटी सी किताब उसके हाथ में....हालांकि मैं भी अपनी किताबों में खोई थी...लेकिन उस लड़की ने तो सुबह १० बजे से शाम ६ बजे तक लगातार आंखें गड़ाए रखा...मैंने तो बीच में थोड़ी देर के लिए आराम भी किया लेकिन उसने अपनी पलकें एक पल के लिए भी नहीं झपकी...मैं उसे देखकर दंग रह गई


घूमने का नशा
कुछ लोगों का देश दुनिया घूमने का नशा होता है...वैसे देखा जाए तो हर इंसान के दिल में दुनिया देखने की इच्छा होती है...कुछ लोग अपनी छुट्टियों का भरपूर फायदा घूमकर ही तो निकालते हैं...देश विदेश के पर्टयन स्थलों के साथ साथ लोगों को एडवेचर्स प्लेस जाने का भी नशा होता है...इसके लिए लोग नदी...तालाब..पहाड़ की कंदराओं गुफाओं में खोज पर निकलते हैं..बर्फीले पहाड़ों पर घूमते हैं...समुद्र की गहराइयों को नापते हैं...वैसे ये नशा है बड़ा ही शानदार...और दिलचस्प खेलने की लत्त
खेल के नशे की गिरफ्त में दुनियाभर के आधे से ज्यादा लोग घिरे हैं...क्रिकेट के प्रति लोगों की दीवानगी तो सबसे ज्यादा है...देखना ही नहीं लोग स्वयं खेलना भी बेहद पसंद करते हैं...लड़कों के लिए तो क्रिकेट सबसे रोचक खेल है...हर वर्ग के लोग इसको इंज्वॉय करते हैं...खासतौर पर जब इंडिया और पाकिस्तान के बीच मैच हो तो...मैच ऐतिहासिक बन जाता है...कई घरों में तो टीवी तक लोग फोड़ डालते हैं...भले ही हर महीने कोई न कोई मैच आयोजित हो रहे हैं...लेकिन लोगों की दीवानगी देखते ही बनती है...इसके अलावा भी कुछ लोग हॉकी, टेनिस और अन्य खेलों के प्रति रुझान दिखातें हैं...खासतौर पर जब मैराथन का आयोजन होता है तो प्रतिभागियों के साथ-साथ नेता और अभिनेता भी इसमें अपनी भागिदारी निभाते हैं

कुल मिलाकर देखा जाए तो आज पूरी दुनिया किसी न किसी नशे की गिरफ्त में हैं