मंगलवार, नवंबर 24

सनसनीख़ेज़ रिपोर्ट!




हंगामा खड़ा करना हमारा मक्सद नहीं…हमारी कोशिश है कि सूरत

बदलनी चाहिए...
मीडिया का मक्सद भी सनसनी फैलाना नहीं...मीडिया का मक्सद है...बस फिज़ा बदलनी चाहिए...लेकिन मीडिया अपने उद्देश्यों से कभी-कभी भटक जाती हैं...मीडिया को अपने दायरे में रहकर ही काम करना चाहिए ना कि अपने दायरों को भूलकर आज की आंधी दौड़ में शामिल हो जाना और सनसनी फैलाना अपना लक्ष्य बना लेने से काम चलेगा...माना की बाज़ार में खुद को स्थापित रखने के लिए मीडिया में हर रोज गलाकाट प्रतिस्पर्धा है लेकिन मीडिया को नहीं भूलना चाहिए की उसका काम ख़बरों से लोगों को अवगत करना है न की अपने हित को ध्यान में रखकर अपने स्वार्थों की पूर्ति करने मात्र से काम चल जाएगा...पिछले दिनों मीडिय का विभत्स चेहरा सामने आया...संसद के पटल पर लिब्रहान रिपोर्ट आने से पहले ही एक अंग्रेजी समाचार पत्र ने इसे प्रकाशित किया....जो कि बाकई एक गलत कदम है...किसी भी रिपोर्ट को सदन में पेश होने से पहले इसे प्रकाशित नहीं किया जा सकता...आखिर मीडिया को ये अधिकार दिया किसने हैं? क्या समाचार पत्र के प्रकाशक...प्रकाशन के सभी नियम और कायदों को भूल चुके हैं...क्या ये रिपोर्ट केवल अनुमान के तहत बनाई गई थी...किसी भी रिपोर्ट को प्रकाशित करने से पहले उनके पास पुख्ता सुबूत होने चाहिए क्या समाचार पत्र के पास इसके पुख्ता सुबूत मौजूद थे?...क्योंकि कल्पना के आधार पर संपादक किसी रिपोर्ट को अमली जामा नहीं पहना सकते... अब सलाव ये उठता है कि ये रिपोर्ट लीक हुई तो हुई कैसे? क्या गृहमंत्रालय ने इसे लीक किया? या फिर लिब्रहान रिपोर्ट को लीक होने में उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश एम एस लिब्रहान का योगदान रहा...ये काफी गंभीर मुद्दा है...खैर लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट लीक होने से संसद के दोनों सदनों में जैसे भूचाल सी आ गई...आखिर कैसे लीक हुई ये रिपोर्ट … ये एक गंभीर मुद्दा है...
बाबरी मस्जिद विध्वंस पर अपनी रिपोर्ट के ‘‘लीक’’ होने से क्षुब्ध एम एस लिब्रहान ने इसे लीक करने से साफ इनकार किया और कहा कि वह ऐसे ‘‘चरित्रहीन’’ व्यक्ति नहीं हैं जो मीडिया को रिपोर्ट लीक कर देंगे... उन्होंने मीडियाकर्मियों को ‘दफा हो जाने‘ को भी कहा.... लिब्रहान ने कहा, ‘‘रिपोर्ट पर मैं नहीं बोलूंगा....अगर मीडिया के पास रिपोर्ट है तो जाइए और पता लगाइए कि मीडिया को यह कहां से मिली और किसने रिपोर्ट दी.’’जब यह पूछा गया कि विपक्ष ने रिपोर्ट को ‘‘चुनिंदा तरीके से लीक’’ किये जाने का आरोप लगाया है तो लिब्रहान ने कहा, ‘‘विपक्ष को कुछ भी कहने दीजिए लेकिन इससे आपका तात्पर्य क्या है?’’ क्षुब्ध लिब्रहान ने भड़कते हुए कहा, ‘‘मेरे चरित्र को चुनौती मत दीजिए, दफा हो जाइये.’’ लिब्रहान ने कहा, ‘‘मैं ऐसा चरित्रहीन आदमी नहीं हूं कि संसद में पेश होने से पहले मीडिया को रिपोर्ट सौंप दूंगा.’’ हालांकि लिब्रहान की मीडिया के प्रति ये बेरुखी बिल्कुल वाजिब था... वहीं गृहमंत्री पी चिदंबरम ने भी दावा किया की रिपोर्ट की केवल एक कॉपी है जो बिल्कुल सुरक्षित है...विपक्षी दल भाजपा ने भी इस मुद्दे को सदन में खूब भुनाया... एक अखबार ने दावा किया था कि छह दिसंबर 1992 को हुए बाबरी विध्वंस की जांच करने वाले एक सदस्यीय लिब्रहान आयोग ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी और भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी को घटना में आरोपित किया है. लिब्रहान आयोग ने 17 साल का समय लिया और इस साल जून में अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौंपी. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी संघ परिवार के 68 नेताओं तथा नौकरशाहों की उस सूची में शामिल किया गया हैं, जिन्हें लिब्रहान आयोग ने अयोध्या मुद्दे पर देश को सांप्रदायिक वैमनस्य के मुहाने पर पहुंचाने का दोषी पाया। आयोग की भारी-भरकम रपट को संसद के दोनों सदनों में गृह मंत्री पी चिदंबरम ने पेश किया। न्यायमूर्ति मनमोहन सिंह लिब्रहान की अध्यक्षता वाले आयोग ने 17 जून को अपनी रपट सरकार को सौंप दी थी। अयोध्या में 17 साल पहले बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के मामले की जांच करने वाले लिब्रहान आयोग की लगभग 1000 पृष्ठ की रपट में भाजपा के अन्य वरिष्ठ नेताओं मुरली मनोहर जोशी और उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह तथा गिरिराज किशोर एवं अशोक सिंघल जैसे विश्व हिंदू परिषद के शीर्ष नेताओं को भी दोषी ठहराया गया। वाजपेयी, आडवाणी और जोशी को भाजपा का छद्म उदारवादी नेतृत्व करार देते हुए आयोग ने कहा कि वे अयोध्या में 16वीं सदी के ढांचे को ढहाए …आयोग ने तीनों को दोषी करार देते हुए कहा कि इन नेताओं को संदेह का लाभ नहीं दिया जा सकता और उन्हें निर्दोष नहीं करार दिया जा सकता। रपट में कहा गया कि इन नेताओं ने जनता के विश्वास का उल्लंघन किया... लोकतंत्र में इससे बड़ी धोखाधड़ी या अपराध नहीं हो सकता ...जहां तक बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के सिलसिले में हुए मामलों का सवाल है, एटीआर में रायबरेली की विशेष अदालत में आठ आरोपियों के खिलाफ दायर मामलों और 47 अन्य मामलों का उल्लेख है और अज्ञात कारसेवकों के खिलाफ भी एक मामला है। इन मामलों की सुनवाई तेज करने के लिए कदम उठाए जाएंगे।

आयोग की रिपोर्ट ने भाजपा में खलबली मचा दी...भाजपा को अलट बिहारी वाजपेई को रिपोर्ट में शामिल किए जाने पर ऐतराज है...वहीं उमा भारती ने इस मामले की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए कहा कि उनके पास पुख्ता सुबूत है जिससे वो साबित कर सकती हैं कि वो निर्दोश हैं...बहरहाल आयोग की रिपोर्ट से देश की एकता और अखंडता में कोई बदवाल नहीं आया है...जो काफी खुशी की बात है

रविवार, नवंबर 15

राज का गुंडाराज

महाराष्ट्र में चलता है ठाकरे परिवार का गुंडा राज...खासतौर से मुंबई में...ऐसा लगता है जैसे महाराष्ट्र उनके पूर्वजों की जागीर हो...भले ही राजा महाराजाओं के ठाट-बाट ख़त्म हो गए… लेकिन इस परिवार के ठाट-बाट आज भी बरकरार हैं...आज से नहीं बाल ठाकरे के समय से ही ये राज चलता आ रहा है...मुंबई तो जैसे उन्होंने खरीद ली हो...मराठी मानुषों की राजनीति करने वाला ये परिवार आए दिन विवादों में घिरा नजर आता है...
इस बार बाल ठाकरे का डंडा चला है क्रिकेट सम्राट सचिन तेंदुलकर पर क्रिकेट के महानायक सचिन तेंदुलकर ने अपने खेल के 20 साल पूरे करने पर खुद को पहले 'भारतीय' क्या कह दिया कि भारतीय राजनीति में अचानक ही एक नया भूचाल आ गया। मीडिया से मुखातिब सचिन ने कहा, 'मुंबई सबकी है। मैं भी मराठी हूं और मुझे इस पर गर्व है। लेकिन, सबसे पहले मैं एक भारतीय हूं।' शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने पार्टी के मुखपत्र सामना में सचिन की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि वह अपने अंतरराष्ट्रीय खेल का मैदान संभालें और खेल में उन्होंने जो कमाया है उसे राजनीति के मैदान में नहीं गवाएं। शिवसेना प्रमुख ने सचिन की आलोचना करते हुए कहा था कि उनके इस बयान से मराठी लोगों की नजरों में सचिन की इज्जत कम हो सकती है। उन्होंने कहा था कि मराठी मानुषों ने संघर्ष करते समय जिस समय मुंबई को हासिल किया था उस समय सचिन का जन्म भी नहीं हुआ था। जिस दिन पूरा देश सचिन की 20 वर्षीय उपलब्धियों पर उनकी शान में कसीदे काढ़ रहा था, उसी दिन शिवसेना प्रमुख बालासाहब ठाकरे उनके एक देशभक्तिपूर्ण बयान पर उन्हें एक धिक्कार भरा पत्र लिखने में व्यस्त थे। ठाकरे और सचिन, दोनों ही मराठी मानुष। पर एक के सीमित सोच के चलते मराठी मानुष महाराष्ट्र में भी सिमटते जा रहे हैं, तो दूसरे की खूबियों के चलते उनकी बढ़ी प्रतिष्ठा के लिए दुनिया की सीमाएं भी छोटी पड़ जाती हैं...
ठाकरे ने करीब 42 साल पहले शिवाजी पार्क में दशहरे के दिन विशाल रैली करने की परंपरा डाली। इन्हीं रैलियों में अपनी तेजतर्रार शैली में भाषण देकर मुंबई महानगरपालिका से लेकर मंत्रालय तक की सत्ता पर काबिज होने में सफल रहे। इसी शिवाजी पार्क में सचिन तेंदुलकर भी रमाकांत आचरेकर सर की छत्रछाया में क्रिकेट के गुर सीखते हुए आगे बढ़े।



ठाकरे के सीमित सोच का ही परिणाम है कि गत विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी वो माहिम विधानसभा क्षेत्र भी गंवा बैठी, जिसमें शिवसेना प्रमुख के रणनीति का केंद्र रहा सेना भवन खड़ा है। वास्तव में यह हार ठाकरे के हाथ से फिसलते मराठी वोट बैंक का प्रतीक मानी जा रही है, जिसे रिझाने-फुसलाने के लिए बाल ठाकरे अब उस मराठी मानुष पर भी प्रहार करने से नहीं चूक रहे हैं, जो देश के साथ-साथ मुंबई का नाम भी सारी दुनिया में रोशन करता आ रहा है।
सचिन को लिखे ठाकरे के धिक्कारपूर्ण पत्र से आम मराठी मानुष भी सन्न है। सचिन पर ठाकरे की इस बेतुकी टिप्पणी की हर तरफ आलोचना हो रही है...भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड [बीसीसीआई] ने तो इसके लिए ठाकरे के खिलाफ कड़ी कार्रवाई तक की मांग कर डाली।

वहीं करण जौहर की आनेवाली फिल्म "कुर्बान" के पोस्टर पर अश्लीलता फैलाने का आरोप लगाने वाली शिवसेना ने बॉलीवुड अभिनेत्री करीना कपूर को साडी भेजी हैं। शिवसेना के नेता जीतेंद्र जानवले ने करीना को 1200 रूपये की साडी भेजी। ताकि वह अपनी खुली पीठ ढक सकें। हालांकि करीना ने इस पर कोई कॉमेंट करने से इंकार किया हैं। हाल ही में शिवसेना कार्यकर्ताओं ने करीना की आनेवाली फिल्म "कुर्बान" के पोस्टर में उनकी पीठ दिखाए जाने को लेकर गुस्से का इजहार किया था। शिवसेना नेता जितेंद्र जानवले ने कहा था कि मुझे समझ नही आता कि अधिकारी इस तरह के पोस्टर्स को पास कैसे कर देते हैं। रास्ते से महिलाएं और बच्चों भी गुजरते हैं। इस तरह के पोस्टर्स का उन पर क्या असर पडता होगा। इस पर करीना ने फिल्म "कुर्बान" के प्रमोशन के दौरान कहा था कि मुझे अब तक कोई साडी नहीं मिली हैं लेकिन मुझे उम्मीद है कि यह अच्छी होगी। जनावाले के नेतृत्व में शिवसेना की महिला कार्यकर्ताओं ने करीना के उस पोस्टर के सामने साडी बांध दी थीं जिसमें उन्हें कम कपडों में दिखाया गया हैं। सैफ के साथ खुली पीठ दिखाने वाले पोस्टर को अभद्र बताए जाने पर करीना ने कहा, मुझे पोस्टर में कुछ भी गलत नहीं दिखा। मेरा मानना है कि यह बेहद सौंदर्यपरक हैं।

ठाकरे परिवार समय-समय पर फिल्म जगत से जुडे लोगों पर भी तानाशाही करने से नहीं चूकते...कभी किसी अभिनेता या अभिनेत्री की कोई हरकत बुरी लग जाती है तो कभी किसी दूसरे की...मतलब मुंबई में रहना है तो ठाकरे परिवार के समक्ष सिर झुका कर रहो...और ऊंची जुबान में बात की तो खैर नहीं

अब बात राज ठाकरे की....बालासाहब ठाकरे की तरह ही राज ठाकरे भी मुंबई में हिन्दीभाषियों को खदेड़ने में जुटे हैं...हाल ही में राज ठाकरे की पार्टी एमएनएस ने भारतीय स्टेट बैंक यानी एसबीआई क्लर्क की परीक्षा में शामिल होने वाले ‘बाहरी अभ्यर्थियों’ का विरोध करते हुए उनके खिलाफ प्रदर्शन करने की चेतावनी दी थी। इसे देखते हुए राज्य सरकार ने सभी परीक्षा केंद्रों पर सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए और परीक्षा शांतिपूर्वक संपन्न हुई। पिछले साल ही परीक्षा में सम्मिलित होने वाले एक छात्र की मौत ने पूरा देश को हिला कर रख दिया था ...करीब दो साल पहले राज ठाकरे ने उत्तर भारतीयों के विरुद्ध ये अभिया शुरू किए था कि दूसरे राज्यों से छात्र यहां परीक्षा में सम्मिलित होने नहीं आ सकते...

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के विधायकों ने सारे नियमों और लोकाचार को धत्ता बताते हुए समाजवादी पार्टी के नेता अबु आजमी पर सदन के अंदर उस वक्त हमला कर दिया, जब वे हिंदी में शपथ ले रहे थे।सदन की कार्रवाई शुरू होने के बाद जब अबु आजमी ने हिंदी में शपथ लेना शुरू किया तो मनसे कार्यकर्ता खड़े होकर नारेबाजी करने लगे और उन्होंने अबू आजमी का माइक छीन लिया और उनका शपथ पत्र छीन लिया। उसके बाद वे धक्का-मुक्की करने लगे और अबू आजमी पर एक विधायक राम कदम ने थप्पड़ भी चलाया, जो उनको लगा। घटना के बाद सदन को 20 मिनट के लिए स्थगित कर दिया गया।
इस मामले ने भी देशभर में ठाकरे की जमकर आलोचना हुई...आजमी की बहू आयशा टाकिया ने तो राज ठाकरे को सीधी चुनौती देते हुए कहा है कि राज और उनके जैसे अन्य नेताओं को लात मारकर राज्य से बाहर निकाल देना चाहिए।
यानी अब ठाकरे परिवार का मराठी मानुषों बाला दाव काम नहीं कर रहा अब उन्हें कोई और मुद्दा तलाशने की जरूरत है...अब ये मुद्दा उनकी तरफदारी कम आलोचना ज्यादा दिला रही है...ठाकरे परिवार को मराठी मानुषों के दिल में राज करने का दूसरा हथकंडा अपनाना होगा...अब तो बच्चे भी ठाकरे परिवार पर ऊंगली उठाने से नहीं चूकते...
ठाकरे परिवार के सामने ये चुनौती है कि वो अपने परिवार के सभी सदस्यों को महाराष्ट्र में ही समेट कर रखे...क्या वो नहीं चाहते कि उनके परिवार के सदस्य दूसरे देशों की यात्रा करे वहां काम करें या देश के दूसरे राज्यों की सैर करें....क्या वो अपने परिवार को भी इसी दायरे में रख सकते हैं...
हर दूसरे घर में एक बिगड़ा शहजादा जन्म लेता है...और घर के दो टुकड़े हो जाते हैं...दो भाईयों में आपस में नहीं बनती...बिगड़े शहजादों के लिए घर तो बंट जाता है...लेकिन क्या किसी बिगड़े शहजादे के लिए क्षेत्र को बांटा जाना चाहिए...ऐसा होता रहा तो देश के न जाने कितने टुक्डे करने पड़ें...
महाराष्ट्र की जनता भी इतनी बेवकूफ नहीं...उन्हें देश के दूसरे राज्यों में जाने का हक है...घूमने का हक है देश दुनिया देखने का हक है अगर वो महाराष्ट्र में किसी दूसरे राज्यों के लोगों का आने या वहां रहने पर रोक लगाते हैं फिर भला वहां के मानुष किस मुंह से दुसरी जगह जा सकेंगे...रोजगार की तलाश कर
सकेंगे
ठाकरे के इन व्यवहारों ने ये प्रश्न खड़ा कर दिया है कि यदि लता मंगेशकर, सुनील गावस्कर और सचिन तेंदुलकर जैसी हस्तियां सिर्फ अपनी मातृभाषा के दायरे में रह कर अपने क्षेत्र में काम करते तो क्या वे सारी दुनिया की वाहवाही लूट पाते?


सीमाओं में देश को बांधना कितना उचित है...भाषा के आधार पर देश की जनता को जोड़ने की जरूरत है तोड़ने की नहीं...वैसे ही देश में कम समस्याएं नहीं हैं...लोग रंग- रूप...कार्य...धर्म संप्रदाय के आधार पर बंटे हैं उन्हें एक सूत्र में पिरोने की जरूरत है...



मंदिर...मस्जिद....गिरजाघर ने

बांट दिया भगवान को

धरती बांटी....सागर बांटा

मत बांटो इंसान को...मत बांटो इंसान को

सोमवार, नवंबर 9

लैपी मय हुई दुनिया






गूगल में फैलते गणराज्य में कम्प्यूटर ने अपनी गहरी पैठ बना ली है…दुनिया धीरे-धीरे कम्प्यूटर के
शिकंजे में कैद होने लगी है...देशी ही नहीं विदेशी कंपनियां भी ग्राहकों को खूब लुभा रही हैं...आपको याद होगा रिलायंस ग्रुप के जनक धीरूभाई अंबानी का सपना था 'कर लो दुनिया मुट्ठी
में'...यानी धीरूभाई अंबानी हर हाथ में मोबाइल देखना चाहते थे...और आज देखिये उनका ये सपना
साकार होता नजर आ रहा है...आज मध्यमवर्ग से लेकर निचले वर्ग के लिए भी मोबाइल कोई बड़ी
चीज़ नहीं रह गई है...दूधवाला हो पेपरवाला हो यहां तक की रिक्शा चलाने वालों के पास भी
मोबाइल पहुंच चुके हैं...उन्हीं की तर्ज पर अब कम्प्यूटर कंपनी भी हर हाथ में कम्प्यूटर पहुंचाने की मुहिम में जुटा है...
कम्प्यूटर यानी अब लैपटॉप का जमाना आ रहा है...लैपी के आकार और रंग में बदलाव कर कंपनी
ग्राहकों को लुभा रहे हैं... easy to handle के फंडे को अपनाते हुए बिल्कुल बजट में ग्राहकों
को रंग-बिरंगे लैपटॉप मुहैया कराए जा रहे हैं...कई कंपनियों ने अल्ट्रा स्लिम और कलरफुल लैपी
बनाकर लोगों को अपना मुरीद बना दिया है जब से सोनी ने कंज्यूमर नोटबुक के रूप में बाजार में
अपना नया लैपटाप वायो एक्स रेंज पेश किया है...महिलाए भी लैपी के प्रति आकर्षित होने लगी
हैं...जब से कम्पनी ने वायो श्रृंखला के उत्पादों के प्रचार के लिए अभिनेत्री करीना कपूर को ब्रांड
अम्बेस्डर बनाया है...महिलाओं का लैपी के प्रति झुकाब बढ़ता जा रहा है...655 ग्राम वजनी वायो
एक्स दुनिया का सबसे हल्का लैपटॉप है। ग्राहकों की इच्छा को ध्यान में रखते हुए कम्पनी ने इसे
कई डिजाइन और रंगों में पेश किया है। HCL और बांकी कई कंपनियों ने भी स्लिम लैपी बाजार
में उतारी है...ये रंग बिरंगी लैपी महिलाओं को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं...कामकाजी महिलाओं
के अलावा भी अब आम महिलाएं भी लैपी की कमी महसूस करने लगीं हैं...पहले लोगों को लैपी
खरीदने के लिए लोन लेना पड़ता था...या फिर किस्तों में पैसे चुकाने पड़ते थे लेकिन अब लैपी की
घटी कीमतों ने लोगों को हाथों-हाथ खरीदारी की सुविधा दी है... मुझे लगता है एक समय ऐसा भी आएगा जब कामकाजी महिलाएं ही नहीं गृहणीयां भी अपनी ड्रेस
के अनुसार लैपी का प्रयोग करने लगेंगीं...यानी जिस कलर का ड्रेस उस कलर की लैपी...घर बैठे ही
सारा काम हो जाया करेगा...और हो भी क्यों न एक छोटी सी चीज़ आपकी दुनिया जो बदल देती
है...आपकी दुनिया में रंग भर देती है...
धीरे धीरे बच्चों को भी लैपी काफी प्रभावित करने लगे तो कोई नई बात नहीं होगी...माता-पिता
अपने बच्चों को किताब-कॉपी की बजाए हाथ में एक लैपी थमा देंगे और बच्चों की पूरी पढ़ाई लैपी
पर ही हो जाया करेंगी...माता पिता भी हर साल नई किताबें और कॉ़पियां और यहां तक की हर
महीने कलम या पेंसिल खरीदने से भी बच जाएंगे...बच्चों पर किताबों का बोझ कम हो जाएगा...बस
हर रोज अपना लैपी लेकर स्कूल चले जाओ हो गई पढ़ाई...कॉलेजों में भी बस लैपी पर ही सारी
पढ़ाई हो जाया करेंगी...हालांकि जब भी कोई नई शुरूआत होती है उससे पहले नया विवाद जन्म
लता हैं...हो सकता है इसका स्कूलों में विरोध हो लेकिन इसके फायदे इतने हैं कि लोग इसे ना
चाहते हुए भी अपना ही लेंगे...जैसा की स्कूली बच्चों ने मोबाइल अपना लिया है और साइकिल
छोड़कर बाइक अपना ली है...जैसे मोबाइल अब मध्यमवर्गीय परिवार के साथ-साथ निम्म वर्गीय परिवारों के लिए भी सामान्य सी
चीज बनकर रह गई है वैसा ही भविष्य में लैपटॉप का भी इस्तेमाल जल्द ही होने लगेगा...लेकिन ग्राहक सोचसमझ कर इसे खरीदना उचित समझते हैं...भले ही छोटा लैपी आपके लिए लाना ले जाना आसान हो लेकिन उसके फायदे और नुक्सान को ध्यान में रखकर ही खरीदना उचित होगा... एक बार मैं पिक्चर देखने मॉल पहुंची...पिक्चर शुरू होने में थोड़ा वक्त था मैंने सोचा चलो कुछ शॉपिंग हो जाए...खाली समय का सदुपयोग भी हो जाएगा और बाजार में क्या नई चीज लॉच हुई है इसकी भी जानकारी हो जाएगी...मैं एक-दो दुकानों में गई...फिर मेरी नज़र एक Electronic की दुकान पर पड़ी...मैं अंदर गई...सामने सोनी का छोटा लैपी रखा था...रंग बिरंगे कलर में रखे लैपी ने मुझे भी प्रभावित किया...मैंने सोचा चलो एक-दो और लैपी देख ली जाए...मैंने लैपी की तहकीकात करनी शुरू की...सबके बारे में जानकारी जुटाने लगी...और अंत में Puzzled हो गई...समझ नहीं आ रहा था कौन सा खरीदना उचित होगा...मैंने एक दो लॉगशीट मांगी सोचा घर जाकर पहले देख तो लूं किसमें क्या सही है कौन सा लेना उचित होगा...अंत में मैंने सोचा किसी कम्प्यूटर के जानकार से पूछने के पश्चात ही कोई फैसला लूंगी...मैंने अपने कुछ सहयोगियों से पूछा...किसी ने कुछ बताया किसी ने कुछ...किसी ने किसी एक लैपी की खूबी बताई तो किसी ने दूसरे की...खैर मैंने फैसला किया भले ही एक बार पैसे लगे...लेकिन मैं ऐसा लैपी लूं जिसमें सारी खूबियां हो ताकि भविष्य में मुझे कोई परेशानी न हो।

मंगलवार, अक्तूबर 27

नशे की गिरफ्त में दुनिया

कौन कहता है शराब पीना या सिगरेट पीना ही सिर्फ बुरी लत्त या यू कहें की नशा है...? लत्त अब कई तरह के हो गए हैं... जैसे इंटरनेट की लत्त....फोन पर बाते करने की लत्त...टीवी देखने का नशा... कुछ ख़रीदने यानी शॉपिंग का नशा...आधुनिक उपकरण बाज़ार में आए नहीं की उसे झट से ख़रीद लेने का नशा...ज्यादा बोलने की लत्त...कुछ लिखने या पढ़ने का नशा......घूमने की लत्त......खेलने का नशा...और भी कई तरह का नशा हैं
नेट का नशा
इनमें इंटरनेट का नशा आज सिर चढ़कर बोल रहा है...युवा ही नहीं बच्चे भी इंटरनेट से चिपके नज़र आते हैं...नेट पर घंटों बीत जाता हैं और पता ही नहीं चलता...सारे कामकाज छोड़कर लोग नेट पर बैठे रहते हैं...लोग हर रोज़ सुबह-शाम अपना मेल चैक करना नहीं भूलते...नेट ऐसा माध्यम बनता जा रहा है जिसके बिना लगता है सारा काम अधूरा है...नेट पर चैट करना हो या विडियो कॉन्फ्रेंसिंग...लोग इनमें खूब समय बर्बाद करते हैं....और रम जाते हैं...बच्चों के लिए तो गेम्स की भरमार नेट पर मौजूद है...पिक्चर्स देखनी हो गाने सुनने हो या फिर खेल की ताज़ा जनाकारी लेनी हो…पलक झपकते ही आपके सामने सबकुछ हाज़िर है...ऐसा लगता है अलादीन का चिराग हो नेट...समाचार जानना हो या किसी गहन मुद्दे की अपटुडेट जानकारी हासिल करनी हो सबकुछ आपको मिल जाएगा इसपर...आप नेट के माध्य से दुनियाभर से जुड़ सकते हैं...आज तो फोन पर भी नेट मुहैया करा दी गई है...लोग दिनरात नेट से जुड़े रहते हैं...वैसे बड़े काम की चीज़ है ये नेट...और इसका नशा ऐसा कि एक बार लग जाए तो जीवनभर आप इससे छुटकारा नहीं पा सकते...

फोन की लत्त
मोबाइल ही नहीं लैंडलाइन पर भी लोग घंटों बतियाते रहते हैं...ऐसा नहीं है कि लोग हर समय काम की ही बातें करते हैं...लोगों के पास ढेर सारा समय है फोन पर बर्बाद करने के लिए...दिनभार की जानकारी हासिल करनी हो या किसी की चुगली करनी हो लोग फोन का सही इस्तेमाल करना जानते हैं…प्रेमी प्रेमिका के लिए तो बड़े काम की चीज़ है ये फोन औऱ ऊपर से फोन पर कुछ चार्ज लेकर 24 घंटे फ्री सेवा ने तो इनका काम और भी आसान कर दिया है...एक दिन आपका फोन खराब हो जाए या आपका फोन गुम हो जाए ऐसा लगता है जैसे दुनिया से आप बिल्कुल कट से गए हों...

टीवी देखने या
न्यूज पेपर पढ़ने का नशा
ये भी अजीब बीमारी है इसके मरीज़ बिना टीवी देखे या बिना अखबार पढ़े एक दिन भी नहीं रह सकते...वैसे टीवी यानी बुद्धू बॉक्स ने सबके मनोरंजन का ठेका उठा रखा है...हर वर्ग को ध्यान में रखकर इसमें मनोरंजन के साधन उपलब्ध कराए जाते हैं...घर की गृहणियों के लिए सास बहू के सीरियल और फिल्मी जगत की चटर-पटर हैं तो वहीं युवाओं के लिए अनेक संगीत और खेल चैनल...बुजुर्गों के लिए समाचार और अर्थव्यवस्था से जुड़ी खबरें हैं योगा और हास्य मनोरंजन से भरपूर सीरियल हैं तो बच्चों के लिए कार्टून और ढेर साले रियलीटि शो हैं
वहीं अखबार एक दिन देर से ही सही लेकिन लोगों को लिखित जानकारी मुहैया कराता है...इतनी सारी चीज़ें आपको एक साथ मिल जाए तो आप भला इनके चंगुल से खुद को कैसे बचा सकते हैं?
शॉपिंग का नशा
कुछ लोगों को शापिंग का नशा इस कदर होता है कि बाज़ार में चीज़ आई नहीं की बस इसे ख़रीदना हैं...महिलाओं और लड़कियों को जहां कपड़े और गहने ख़रीदने का नशा होता है नए डिजाइन के कपड़े बाजार में आए और उनके पास वो परिधान होने चाहिए...उस डिजाइन के गहने पहनने हैं तो पहनने हैं...वहीं युवाओं को नई बाइक्स औऱ नया हैंडसेट (मोबइल) खरीदने का नशा छाया रहता है...कुछ लोगों को नई गाड़ी ख़रीदने का नशा होता है तो कुछ को नया घर खरीदने का...

बोलने की लत्त
कुछ लोग इतने बातूनी होते हैं कि उन्हें ख़ुद ही नहीं पता होता है कि वे क्या बोल रहे हैं...कब क्या बोलना है...इससे अनजान वे कभी भी कुछ भी बोल जाते हैं...कई बार अपनी इस हरकत के कारण तो वे लोगों का भरपूर मनोरंजन करते हैं लेकिन कई बार अपनी इस आदत के कारण बुरी तरह फंस भी जाते हैं...लेकिन उनके मुंह पर ताला नहीं लगाया जा सकता...वैसे बोलना भी एक कला है…जो सबके बस की चीज़ नहीं…कुछ लोग तो अपने बोलने की आदत से ही लोगों के बीच मशहूर हो जाते हैं...और लोगों को उनकी कमी खलती है

लिखने या पढ़ने का नशा
अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए कुछ लोग लेखन कार्य पर भरोसा करते हैं...वैसे भी अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है लेखन कला...इसके माध्य से आप अपने दिल की बात बेहद आसानी से दुनिया के सामने रखते हैं...कुछ लोगों को लेखन का बड़ा शौक होता है...बिना लिखे उनका वक्त ही नहीं गुज़रता...वैसे ये ऐसा माध्यम है जो आपको मर कर भी अमर बना सकता है...कई लेखक...शायर...कवि...पत्रकार अपनी लेखन कला से मरकर भी अमर हो गए...दुनिया आज भी उन्हें याद करती है...और लोग उसे पढ़ते हैं उनका सम्मान करते हैं...
देखा जाए तो कुछ लोगों की पढ़ने का ऐसा चस्का होता है कि वो अपनी किताबों में इस कदर खो जाते हैं कि उन्हें पता ही नहीं चलता की उनके आस-पास हो क्या रहा है...दीन-दुनिया से बेख़बर वो अपनी किताबों में आंखें गड़ाए रहते हैं...
एक बार मैं अपने पापा के साथ एक एक्जाम देने बनारस जा रही थी...ट्रेन में मैंने एक लड़की को देखा...देखने में तो वो टॉम ब्वॉय जैसी लगी...वो भी मेडिकल का एक्जाम देने दिल्ली जा रही थी...मोटी सी किताब उसके हाथ में....हालांकि मैं भी अपनी किताबों में खोई थी...लेकिन उस लड़की ने तो सुबह १० बजे से शाम ६ बजे तक लगातार आंखें गड़ाए रखा...मैंने तो बीच में थोड़ी देर के लिए आराम भी किया लेकिन उसने अपनी पलकें एक पल के लिए भी नहीं झपकी...मैं उसे देखकर दंग रह गई


घूमने का नशा
कुछ लोगों का देश दुनिया घूमने का नशा होता है...वैसे देखा जाए तो हर इंसान के दिल में दुनिया देखने की इच्छा होती है...कुछ लोग अपनी छुट्टियों का भरपूर फायदा घूमकर ही तो निकालते हैं...देश विदेश के पर्टयन स्थलों के साथ साथ लोगों को एडवेचर्स प्लेस जाने का भी नशा होता है...इसके लिए लोग नदी...तालाब..पहाड़ की कंदराओं गुफाओं में खोज पर निकलते हैं..बर्फीले पहाड़ों पर घूमते हैं...समुद्र की गहराइयों को नापते हैं...वैसे ये नशा है बड़ा ही शानदार...और दिलचस्प खेलने की लत्त
खेल के नशे की गिरफ्त में दुनियाभर के आधे से ज्यादा लोग घिरे हैं...क्रिकेट के प्रति लोगों की दीवानगी तो सबसे ज्यादा है...देखना ही नहीं लोग स्वयं खेलना भी बेहद पसंद करते हैं...लड़कों के लिए तो क्रिकेट सबसे रोचक खेल है...हर वर्ग के लोग इसको इंज्वॉय करते हैं...खासतौर पर जब इंडिया और पाकिस्तान के बीच मैच हो तो...मैच ऐतिहासिक बन जाता है...कई घरों में तो टीवी तक लोग फोड़ डालते हैं...भले ही हर महीने कोई न कोई मैच आयोजित हो रहे हैं...लेकिन लोगों की दीवानगी देखते ही बनती है...इसके अलावा भी कुछ लोग हॉकी, टेनिस और अन्य खेलों के प्रति रुझान दिखातें हैं...खासतौर पर जब मैराथन का आयोजन होता है तो प्रतिभागियों के साथ-साथ नेता और अभिनेता भी इसमें अपनी भागिदारी निभाते हैं

कुल मिलाकर देखा जाए तो आज पूरी दुनिया किसी न किसी नशे की गिरफ्त में हैं

सोमवार, अक्तूबर 26

क्योंकि हम गरीब हैं....!


हम गरीब हैं....
हमारे पास सब कुछ है, लेकिन फिर भी हम गरीब हैं...
हमारे पास प्रतिभा है, लेकिन हम गरीब हैं...
क्योंकि देश में प्रतिभा की पहचान नहीं...
प्रतिभाशाली छात्र देश छोड़ विदेशों का रुख कर रहे हैं...
क्योंकि हम गरीब हैं...
हमारे पास सभी संसाधन हैं
लेकिन उसका सही इस्तेमाल हम नहीं करते
हमारे पास आधुनिक यंत्र बनाने की क्षमता है
लेकिन हम गरीब हैं...उसे बनाने के लिए हमारे पास पूंजी नहीं
क्योंकि हम गरीब हैं...
हम एसी ऑफिस में काम करते हैं
हम एसी गाड़ियों में घूमते हैं...
जरुरत पड़ने पर हम हवाई यात्रा भी करते हैं
लेकिन फिर भी हम कहते हैं हम तो गरीब हैं
हम अपनी कमाई का सारा धन बैंकों में जमा करते हैं
और कहते हैं हम मध्यमवर्गी हैं
क्योंकि हम गरीब हैं...
हमारे घर में सभी आधुनिक उपकरण मौजूद हैं
लेकिन हमारे पास दिखावे के लिए कुछ भी नहीं...
क्योंकि हम गरीब हैं...
देश का सारा काला धन विदेशों में जमा होता है
क्योंकि हम आधुनिक गरीब हैं...

रविवार, अक्तूबर 25

देश की धड़कन...

सोनिया गांधी...एक ऐसा नाम जिस पर आज पूरा देश भरोसा करता है...चुनावी अभियान हो या किसी गंभीर मुद्दे पर चर्चा...देश के आला नेता भी सोनिया से सलाह लेना नहीं भूलते...कांग्रेस की जान सोनिया गांधी में बसती है तभी तो तीन राज्यों में चुनाव परिणाम में देश की जनता ने कांग्रेस पर अपनी मुहर लगाई महाराष्ट्र, हरियाणा और अरूणाचल प्रदेश में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने सत्ता पर कब्जा जमाया...महाराष्ट्र और अरूणाचल प्रदेश में कांग्रेस गठबंधन को पूर्ण बहुमत मिला है, वहीं हरियाणा में उसे सरकार बनाने के लिए सात निर्दलीय विधायकों की मदद की दरकार रही... हालांकि कांग्रेस के कमजोर प्रदर्शन के लिए भूपेंद्र सिंह हुड्डा को कठघरे में खड़ा किया गया। लेकिन पार्टी ने अंतत: उन्हीं पर भरोसा किया। चुनाव में कांग्रेस की 'हार' के बावजूद कुर्सी की लड़ाई हुड्डा इसलिए भी जीत गए, क्योंकि कोई और दिग्गज पर्याप्त ताकत के साथ विधानसभा पहुंचा ही नहीं। कुछ पहुंचे भी तो उनके गढ़ में कांग्रेस साफ हो गई। इसलिए किसी प्रकार की जोखिम लेने से बचते हुए कांग्रेस आलाकमान सोनिया गांधी ने हुड्डा को दोबारा मुख्यमंत्री बना दिया। वहीं महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में लगातार तीसरी और सबसे ब़डी हार के बाद बाल ठाकरे जैसे अपना आपा खो बैठे। 44 साल तक मराठी मानुष की राजनीति करने वाले ठाकरे ने मराठी मानुष को गद्दार और धोखेबाज करार दिया... अरूणाचल प्रदेश में भी कांग्रेस दो तिहाई बहुमत के साथ विजयी रही।आज हर राज्य में कांग्रेस का दबदबा देखने को मिल रहा है...लोगों का भरोसा कांग्रेस की और बढ़ता जा रहा है...राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री भी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के बेहद तबज्जों देते हैं...उनसे सभी मुद्दों पर सलाह लेते हैं...देखा जाए तो सीधे तौर पर न सही लेकिन देश की सही बागडोर कांग्रेस आलाकमान सोनिया गांधी के हाथों ही है...
इटली में जन्मी सोनिया से जब राजीव गांधी ने शादी की थी तब किसे पता था कि एक दिन सोनिया देश की जनता के दिलों पर राज करेगी...एक विदेशी बहू ने देश की संस्कृति और सभ्यता को बेहद अनोखे अंदाज में अपनाया है...पाश्चात्य परिधान छोड़ भारतीय परिधान को पूरी तरह तवज्जो दी है...देश की जनता के दिलों में राज करने के लिए हिन्दी को अपनाया... सोनिया दिखावे की भावना से परे हैं...हालांकि पति राजीव गांधी की हत्या के बाद कोंग्रेस के वरिष्ट नेताओं ने सोनिया से पूछे बिना उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष बनाये जाने की घोषणा कर दी लेकिन सोनिया ने इसे स्वीकार नहीं किया और राजनीति और राजनीतिज्ञों के प्रति अपनी घृणा और अविश्वास को इन शब्दों में व्यक्त किया कि “मैं अपने बच्चों को भीख मांगते देख लूँगी, परंतु मैं राजनीति में कदम नहीं रखूँगी।“ काफ़ी समय तक राजनीति में कदम न रख कर उन्होंने अपने बेटे और बेटी का पालन पोषण करने पर अपना ध्यान केंद्रित किया। लेकिन पी वी नरसिंहाराव के कमज़ोर प्रधानमंत्रित्व काल के कारण 1996 का आम चुनाव हार गई और उसके बाद सीताराम केसरी के कांग्रेस के कमज़ोर अध्यक्ष होने से कांग्रेस का समर्थन कम होता चला गया...जिससे कांग्रेस के नेताओं ने फिर से नेहरु-गांधी परिवार के किसी सदस्य की आवश्यकता अनुभव की। उनके दबाव में सोनिया गांधी ने 1997 में कोलकाता के प्लेनरी सेशन में कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता ग्रहण की और उसके 62 दिनों के अंदर 1998 में कांग्रेस की अध्यक्ष चुनी गयीं। उन्होने सरकार बनाने की असफल कोशिश भी की। राजनीति में कदम रखने के बाद उनका विदेश में जन्म हुए होने का मुद्दा उठाया गया । उनकी कमज़ोर हिन्दी को भी मुद्दा बनाया गया। उन पर परिवारवाद का भी आरोप लगा लेकिन कोंग्रेसियों ने उनका साथ नहीं छोडा और इन मुद्दों को नकारते रहे। एन डी ए के नेताओं ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल पर आक्षेप लगाए ... सुषमा स्वाराज और उमा भारती जैसी नेताओं ने घोषणा कर दी कि यदि सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बनीं तो वो अपना सिर मुँडवा लेंगीं और जमीन पर ही सोयेंगीं। राष्ट्रीय सुझाव समिति का अध्यक्ष होने के कारण सोनिया गांधी पर लाभ के पद पर होने के साथ लोकसभा का सदस्य होने का आक्षेप लगा जिसके फलस्वरूप 23 मार्च 2006 को उन्होंने राष्ट्रीय सुझाव समिति के अध्यक्ष के पद और लोकसभा की सदस्यता दोनों से त्यागपत्र दे दिया। मई 2006 में वे रायबरेली, उत्तरप्रदेश से पुन: सांसद चुनी गई और उन्होंने अपने समीपस्थ प्रतिद्वंदी को चार लाख से अधिक वोटों से हराया। 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने फिर यूपीए के लिए देश की जनता से वोट मांगा। एकबार फिर यूपीए ने जीत हासिल की और सोनिया यूपीए की अध्यक्ष चुनी गई.

आज सोनिया के हाथों सफल नेतृत्व का जिम्मा है...ऐसा लगता है मानो देश की जनता ने बहू सोनिया को अब पूरी तरह से कुबूल लिया हो...सोनिया चाहती तो पति राजीव की मौत के बाद वो अपने दोनों बच्चों के साथ अपने देश वापस लौट सकती थीं...लेकिन सोनिया ने हिम्मत से काम लिया...भारत को ही अपना देश माना और यहां रहकर राहुल और प्रियंका का परवरिश की...परिवार के कई सदस्यों को राजनीति में खोने के बाद भी सोनिया ने हिम्मत नहीं हारी...हालांकि सोनिया को नेताओं ने भी खूब डराया...सोनिया से डराया गया की अगर उनकी आनेवाली पीढ़ी सत्ता में आई तो उनका भी वही हश्र होगा जो राजीव और इंदिरा गांधी का हुआ था...सोनिया ने अपरोक्ष रूप में सत्ता संभाली है...सोनिया ने देश की जनता के दिलों पर राज करना सीख लिया है...

सोमवार, अक्तूबर 12

प्यार की परिभाषा

प्यार एक अनोखी अनुभूति...

अजब सा एहसास






जिसे सच्चा प्यार मिल गया समझो उसका जीना सफल हो गया...





फिल्म कुछ कुछ होता है' में शाहरुख खान का एक डायलॉग है - इंसान एक बार जीता है, एक बार मरता है और एक बार ही प्यार करता है...


जिंदगी में इंसान को कई बार प्यार हो सकता है। यह बात दूसरी है कि पहला प्यार कोई भुला नहीं पाता। लेकिन सच्चा प्यार बड़ी ही मुश्किल से किसी को नसीब होता है...आज की हाईटेक लाइफस्टाइल में प्यार की परिभाषा बदल गई है...प्यार भी हाईटेक हो गया है...लोग प्यार कई चीजें देखकर करने लगे हैं...मसलन जेब...सैलरी...लाइफस्टाइल...और इन सबसे बढ़कर ये मायने रखता है कि आप सामनेवाले से ज्यादा हाईप्रोफाइल हैं या नहीं...साथ ही उनके जैसी समतुल्यता (equilibrium) रखते हैं या नहीं...आज प्यार ने अपनी परिपक्वता (puberty) को हासिल कर लिया है...

आज तक किसी ने प्यार की सटीक परिभाषा नहीं दी है...प्यार को किसी एक परिभाषा में बांध कर भी नहीं रखा जा सकता...प्यार की परिभाषा में समय-समय पर बदलाव आते रहे हैं...प्यार में कभी राधा कृष्ण का उदाहरण दिया जाता है...कभी हीर रांझे का...तो कभी लैला मजनू का...लेकिन आज के ज़माने में कहां हीर रांझे का प्यार...कहां जीने मरने की कसमें खानेवाले...प्यार में काभी बदलाव आ गया है...प्यार करने के तरीके में बदलाव आ गया है...पहले प्यार करने वाले एक दूसरे को मिलने को...उसकी एक झलक पाने को बेताब रहते थे...एक दूसरे की शक्ल देखने को तरस जाया करते थे...जिससे प्यार होता था उसके घर के चक्कर लगाया करते थे...लेकिन आज किसके पास इतना वक्त है...आज सभी अपने अपने काम में व्यस्त हैं...और 'तू नहीं तो कोई और सही' की तर्ज पर कोई तीसरे की तुरंत तलाश कर लेते हैं...अब फोन पर नेट कनेक्शन उपलब्ध हैं...वहीं नेट के विडियो कॉन्फ्रेंसिग ने दूरियां भी मिटा दी है...फोन ने लोगों को काफी राहत दी है...और दूरसंचार कंपनियों ने लोगों को घंटो बात करने की सुविधा उपलब्ध करा दी है...जिससे लोग हर समय फोन से चिपके नज़र आते हैं...आज के समय में जिसके पास फोन नहीं आता वो खुद को व्यस्त करने के नए नए हथकंडे अपना लेते हैं...देखा जाए तो आजकल की लड़कियां बिना एक भी ब्यॉफ्रेंड के नहीं रह सकतीं...खासकर कॉलेज गोइंग गर्ल्स में तो ब्यॉफ्रेंड बनाने का क्रेज काफी फेमस है...वैसे सही भी है...लड़कियां ब्यॉफ्रेंड बनाकर ख़ुद को सुरक्षित महसूस करतीं हैं...एक लड़का हर वक्त उसकी ख़ैरियत पूछता है...उसका ख़्याल रखता है...इसमें बुरा भी क्या है...आजकल लड़के-लड़कियां बिना एक ख़ास फ्रेंड के जिना बेकार का जीना समझते हैं...

जब पहला-पहला प्यार होता है तो लड़कियां अपनी खूबसूरती को लेकर काफी सतर्क हो जाती हैं...वो ब्यूटी पार्लरों के चक्कर लगाने लगती हैं...तो वहीं लड़के अपने आप को जिम में व्यस्त कर लेते हैं...उनको अपनी पर्सनेलिटी की फिक्र होने लगती है...उसके बाद बारी आती है बाइक्स के क्रेज़ की...वैसे भी लड़कियों को इम्प्रैस करने में गाड़ियां काफी महत्वपूर्ण स्थान रखतीं है...धीरे-धीरे प्यार गहराने लगता है...लेकिन ये प्यार परवान कम ही चढ़ पाता है...

आज के समय में प्यार की परिभाषा बदल गई है...लोग प्यार को ज्यादा तरज़ीह नहीं देते...आज आपका जॉब ज्यादा मायने रखता है...ऐसा नहीं है कि प्यार करने वाले ख़त्म हो गए हैं...बल्कि प्यार में बचकानी हरकतों को छोड़ लोग अब गहन चिंतन के बाद ही कदम बढ़ाते हैं...हर तरह से नाप-तौल कर पूरी तरह खरा उतरने के बाद ही प्यार करते हैं...लड़कियां भले ही इनमें जल्दबाजी कर बैठे...लेकिन लड़के काफी सोच समझकर कोई फैसला लेते हैं...लड़कियां आज भी प्यार करने में दिल का इस्तेमाल करती हैं जबकि लड़के दिल का नहीं दिमाग का इस्तेमाल करते हैं...लड़कियां बहुत जल्दी जज्बाती हो जाती हैं...लेकिन लड़कों का दिल इस मामले में थोड़ा मज़बूत होता है...हम ये भी नहीं कह सकते कि लड़के सच्चा प्यार नहीं करते...लड़कों को भी कभी-कभी ही सही लेकिन किसी न किसी से सच्चा प्यार ज़रूर होता है...कहते हैं वो जवानी ही क्या जिसकी कोई कहानी न हो...सच ही तो है...एक लड़का अगर किसी से सच्चा प्यार कर बैठे तो उसे भी अपने प्यार को ख़ोने का उतना ही ग़म सताता है जितना एक लड़की अपने प्यार को खोने पर मातम मनाती है...लेकिन ऐसी परिस्थिति लड़कों के साथ कम ही आती है...



हां एक बात और प्यार उसी से करे जो आपसे प्यार करे...प्यार उससे कभी नहीं करनी चाहिए जो आपको पसंद ही नहीं करता हो...उसके पीछे भागने से कोई फायदा नहीं...उसे भूल जाना ही बेहतर होता है लेकिन अगर आप किसी से सच्चा प्यार करते हैं तो अपने प्यार को पाने की खातिर थोड़ा झुकना बेहत होगा...आपको इससे पीछे नहीं हटना चाहिए...किसी के सामने झुकने में कोई बुराई नहीं है...लेकिन उतना ही झुके जितना कि आप झुक सकते हैं...कहीं ये झुकाव इतना न हो जाए की आप टूट जाए...

रविवार, अक्तूबर 11

गलतियों से सीख


ग़लतियां किसी से भी हो सकती हैं...कभी भी हो सकती हैं...इंसान अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश करता है कि उससे कोई ग़लती न हो...लेकिन जाने-अंजाने वो ग़लतियां कर बैठता है...ऐसा नहीं है कि आपके पास जानकारियों का अभाव होता है तभी आपसे गलतियां होती हैं...जानकारी होने के बाद भी कई बार जल्दबाज़ी में आप गलती कर बैठते हैं...लेकिन ग़लतियों पर मातम मनाने की ज़रूरत नहीं...जरूरत है तो उससे सीख लेने की ताकि भविष्य में वो गलती हम न दोहराए...
मैंने भी अब तक की अपनी पत्रकारिता की जिंदगी में कुछ गलतियां की हैं...जिन्हें मैं स्वीकार भी करती हूं...और मैंने इन गलतियों से सबक भी ली....मीडिया में छोटी-छोटी गलतियां भी काफी मायने रखती हैं...और आप एक शब्द की गलती से भी मुसीबत में फंस सकते हैं...इसलिए बेहद सतर्कता से काम करना पड़ता है...मेरी कुछ गलतियों ने मुझे काफी कुछ सिखा दिया....
मेरी पहली ग़लती...
एक बार मैं एक ख़बर बना रही थी...इसी बीच कोई दूसरी बड़ी ख़बर आ गई और अपनी पहली ख़बर को अधूरी छोड़ में दूसरी ख़बर लिखने में जुट गई...पहली खबर को मैंने पूरा नहीं किया था...मैंने क्लिप अटैच कर दिया था...तब तक उस खबर को बिना री-चैक किए उसे On Air कर दिया गया...उसमें एक गलती रह गई थी...खबर थी की उड़ीसा में हमला हुआ था और कुछ लोगों की मौत हो गई थी...इसपर उड़ीसा के मुख्यमंत्री ने प्रभावित क्षेत्र का दौरा किया था और प्रधानमंत्री ने पीड़ित परिवारों को राहत पैकेज की घोषणा की थी...Reuters में खबर आई थी और उसे ट्रांसलेट कर हिन्दी में ख़बर बनानी थी...मैंने खबर अधूरी लिखी...और मुख्यमंत्री की जगह मैंने प्रधानमंत्री लिख दिया...मैं ख़बर को रीचैक नहीं कर पाई थी और तब तक बुलेटिन प्रोड्यूसर ने अपने बुलेटिन में ख़बर को मुझसे बिना पूछे On Air कर दिया...तुरंत PCR से फोन आ गया की ख़बर ग़लत बनी हैं...मैं परेशान क्योंकि मुझे इस बात की बिल्कुल जानकारी नहीं थी कि अधूरी ख़बर को On Air कर दिया गया है...अब बारी थी हमारी क्लास लगने की...बॉस ने मुझे और BP को बुलाया मुझसे पूछा गया तो मैंने साफ बता दिया कि मैंने खबर अधूरी लिखी थी...उसे मेरी जानकारी के बगैर On Air किया गया...अब बारी थी BP और कॉपी चैक करने वाले की...मैं तो उस दिन बाल-बाल बच गई...इस गलती के बाद मैंने सीखा की कोई भी खबर अधूरी नहीं छोड़नी चाहिए औऱ अपना लिखा हमेशा चैक होने के बाद ही On Air होने देना चाहिए...
मेरी दूसरी ग़लती...
महाशिवरात्री के अवसर पर मुझे कुछ ब्रेकिंग ख़बर चलानी थी...मैंने ख़बर लिखी...On Air किया...मेरी शिफ्ट पूरी हो चुकी थी....मैंने ब्रेकिंग खबर आउट नहीं किया और मैं घर चली गई...मुझे लगा कि जो अगली शिफ्ट में आएगा वो इसे हटा ही देगा...पर ऐसा हुआ नहीं...उस ब्रेकिंग ख़बर पर किसी ने भी ध्यान नहीं दिया...मैं रात के 12 बजे उस ख़बर को लगा कर गई थी और वो ख़बर पूरी रात ब्रेकिंग के तौर पर चलती रही...अगले दिन सुबह 10 बजे तक ख़बर ज्यों की त्यों चली...सुबह बॉस आए...वो ब्रेकिंग को बड़े ध्यान से देखते थे...सुबह जब उस ख़बर में कोई अपडेट नहीं पाया तो उन्होंने शिफ्ट के सभी कर्मचारियों को बुलाकर सबकी क्लास लगा दी...रात में रहे सभी लोग बुरी तरह फंस गए थे...किसी ने भी इस ओऱ ध्यान नहीं दिया था...जब दूसरे दिन मैं ऑफिस आई तो मुझसे भी पूछा गया कि आपने ख़बर लगाकर क्यों छोड़ दिया...मैंने अपनी गलती स्वीकार कर ली...और मैंने ये भी कहा की अगली शिफ्ट वालों को इस ओर ध्यान देना चाहिए On screen क्या जा रहा है उनकी पूरी जिम्मेदारी उनकी बनती है...मेरी शिफ्ट में ये बडी़ ख़बर थी इसलिए मैंने इसे लगाए रखा...ख़ै़र मुझे अपनी ग़लती भी स्वीकारनी पड़ी...
मेरी तीसरी ग़लती...
बुलेटिन में स्टोरी स्लग बड़े अक्षरों में लिखा जाता है....जिस मीडिया हाउस में उस वक्त काम कर रही थी उसमें ऐसा सिस्टम था कि पहले उसे दूसरी जगह लिखकर उसे कॉपी करना पड़ता था उसके बाद स्टोरी स्लग की जगह उसे पेस्ट करना पड़ता था...वैसे भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में काम काफी तेज़ी से करना पड़ता है...क्योंकि जब तक आप सोचेंगे समझेंगे और लिखेंगे तब तक समय खत्म हो चुका होगा...आपको...सोचना...समझना और लिखना एक साथ पड़ता है...इसलिए आपके पास समय की कमी पड़ जाती है...और आपकी नज़र जब तक अपनी गलती की ओर जाती है तब तक काफी देर हो चुकी होती है...
इस बार मैंने जो गलती की थी उसे अपनी पूरी जिंदगी नहीं भुला सकती....वाक्या ही कुछ ऐसा था...Business की ख़बर थी...एक स्टोरी स्लग आया था सेंसेक्स में भारी गिरावट...मैंने उसे लिखा...कॉपी किया...और स्टोरी स्लग की जगह पेस्ट कर दिया...मैंने उसे On Air किया और मैं दूसरा स्टोरी स्लग लिखने लगी...मेरा ध्यान उस ओर नहीं गया...
बुलेटिन ख़त्म हो गया और मुझे मेरी गलती का पता ही नहीं चला...इस बीच मैं अपने माता-पिता से मिलने 15 दिनों के लिए अपने घर मुज़फ्फरपुर चली आई...कुछ दिनों बाद मेरे एक सहकर्मी का फोन आया...उसका कहना था कि एक बुलेटिन में मैंने एक स्टोरी स्लग गलत लगाया था...मुझे याद नहीं था किस दिन मैंने गलती की...दरअसल उस पर तो किसी की नज़र नहीं गई लेकिन...जब भी कोई बुलेटिन On Air होता है तो उसकी गलतियों के लिए एक सेल बना होता है जो बुलेटिन की गलतियों को नोट करता है...बुलेटिन रिपोर्ट में वो गलतियां आ जाती हैं...मैंने सेंसेक्स को तो कॉपी किया था लेकिन इस शब्द में से पहला अक्षर मुझसे कॉपी नहीं हुआ था...अब तो अर्थ का अनर्थ बन गया था...मैं घर से लौटी...मैंने उस डेट का बुलेटिन रिपोर्ट चैक किया...मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ..मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई...मैं अबाक रह गई...ऐसा लग रहा था काटो तो खून नहीं...दिनभर मैं बेहद परेशान रही...बड़ी मुश्किल से मेरा वो दिन गुज़रा...मैं घर से लौटी थी सभी मुझसे मेरे घर के बारे में पूछ रहे थे...लेकिन मेरे दिमाग में मेरी गलती घूम रही थी...ऐसा लगा जैसे मुझे दिन में ही तारे नज़र आ रहे हों...हे भगवान ये मैंने क्या किया...
हालांकि ये बड़ा मुद्दा नहीं बना और इसपर मुझसे किसी ने कुछ पूछा भी नहीं...कम ही लोगों ने बुलेटिन रिपोर्ट चैक किया था...और उस वक्त बॉस भी छुट्टी पर थे...मामला रफ्फा दफ्फा हो गया...लेकिन मेरी इस गलती ने मुझे झकझोर कर रख दिया था...

शनिवार, अक्तूबर 10

बेज़ुबान बुढ़ापा



अपने

हुए

पराए






एक बार रिपोर्टिंग के सिलसिले में मैं एक वृद्धाश्रम पहुंची...जनवरी की पहली तारीख़...साल का पहला दिन और इस अवसर पर मैं उनके बीच मौजूद थी...मैं जानना चाहती थी कि ये बुजुर्ग साल का स्वागत किस तरह करते हैं...अपने घर परिवार से निष्कासित इन बुजुर्गों की जिंदगी में मैं थोड़ी सी रौशनी भरना चाहती थी...मुझे वहां जाकर बेहद अजीब लग रहा था...मैं अपनी भावुकता को दबाने की कोशिश में जुटी थी...मैं शाम के 5 बजे वहां पहुंची...ठंड का मौसम था...हालांकि उस दिन मौसम ख़ुशनुमा था...मैंने आश्रम के अधिकारियों से वृद्धों के बीच कुछ पल गुज़ारने की इजाज़त मांगी...वो तैयार हो गए...मैं वृद्धों के कमरे में पहुंची…कुछ लोग आराम कर रहे और कुछ अपने दिनभर का काम निपटा रहे थे...अधिकारियों ने उन्हें बाहर आने के लिए कहा...उन्होंने वृद्धों को बताया की हम उनके साथ पहली तारीख़ सेलिब्रेट करना चाहते हैं...सभी एक-एक कर बाहर आने लगे...बाहर एक छोटा सा मंदिर बना था...जहां वे लोग रोज सुबह शाम पूजा अर्चना किया करते थे...वैसे भी संध्या की बेली नज़दीक थी...मैंने सबको बैठने का इंतज़ाम करवाया....वृद्धजनों से मैंने निवेदन किया की आज वो मेरे साथ अपनी खुशियां बांटेंगे...गाएगे बजाएंगे...अधिकारियों ने ढोल का इंतज़ाम कराया...पूजा अर्चना शुरू हुई...औऱ धीरे-धीरे समां बंधने लगा...मैं संगीत की इस अनोखी शाम को खूब इंज्वॉय किया...बुजुर्गों ने भगवान के भजनों की तो झड़ी लगा दी...आसपास कुछ बच्चे रहते थे वे भी तैयार होकर वहां आ गए और झूम-झूमझूमकर नाचने लगे...मुझे बेहद खुशी हो रही थी कि मैंने इन बुजुर्गों के चेहरे पर थोड़ी मुस्कान बिखेरी है...

अब बारी थी उनकी बाइट लेने की मैंने एक बुजुर्ग महिला से आज के दिन हमारे साथ बिताए पलों के बारे में जानना चाहा...उस महिला ने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा बेटा ‘तुम आए तो हमने इसे आज हंसी खुशी मनाया नहीं तो बस रोज की तरह ही हम अपना काम निपटा कर सो जाते....हमारे लिए क्या होली क्या दीवाली सब दिन एक समान ही तो है’…मैं थोड़ी भावुक हुई जा रही थी...लेकिन मेरे साथ गए कैमरा मैन ने मुझसे कहा मैडम आप इनके यहां आने का कारण पूछिए...ये वृद्धाश्रम क्यों आए हैं? इनमें से कुछ बुजुर्ग तो काफी अच्छे परिवार से लग रहे हैं...मुझे एक अच्छा प्वाइंट मिल गया था पूछने के लिए...मैंने एक दो बुजुर्गों से पूछा कि आप इस आश्रम में क्यों आए...इसपर ज्यादातर लोगों ने चुप्पी साध ली थी...किसी ने बताया मेरे घर में बहुओं से नहीं पटती तो किसी ने कहा नाती ने कुछ कह दिया इसलिए आन-बान और शान कि ख़तिर में मैं यहां आ गई...एक दो लोगों से मैंने उनके यहां आने की पूरी कहानी जाननी चाहती थी...लेकिन कोई वो बताने के लिए तैयार ही नहीं हो रहे थे.....मैंने धीरे-धीरे अपनी बातों में उन्हें उलझाने की कोशिश की और उनके अंदर का दर्द जानने का प्रयास किया.. काफी मशक्कत के बाद कुछ लोगों ने मुझे अपनी इंसाइड स्टोरी बयां की...दो-तीन लोगों की बाइट लेकर मैं वापस अपने ऑफिस आने के लिए रवाना हो गई...मैं जब गाड़ी में बैठी तो मुझसे कैमरामैन कहने लगा...अरे मैडम आपको पता नहीं है...इनमें से कई बुजुर्गों को तो उनके परिवारवाले बड़ी ही बेरहमी से निकाल देते हैं...और पलट कर कभी इन्हें देखने नहीं आते...

मुझे याद है जब एक बार एक रिपोर्ट ने मध्यप्रदेश के किसी वृद्धाश्रम पर स्टोरी दिखाई थी...एक बुज़ुर्ग का दर्द बयां किया था...लेकिन कुछ दिन बाद ही उस बुजुर्ग के परिजनों का बयान आया...दरअसल उस बुजुर्ग का बेटा विदेश में रहता था...उसके परिवार के कुछ सदस्यों ने बुजुर्ग के बेटे को फोन किया को कहा कि आपके पिता की स्टोरी टीवी पर दिखाई जा रही है...और वो रो रो कर अपनी कहानी बता रहे हैं...उसके बाद तो बुजुर्ग के बेटे ने रिपोर्टर को फोन लगाना शुरू किया और सलाह दी कि ‘आपको मेरे पिता से इतनी हमदर्दी है तो आप ही मेरे पिता को अपने घर में क्यों नहीं रख लेते’...दरअसल ये बुजुर्ग आर्मी से रिटायर्डे थे और अपने घर में भी आर्मी जैसे ही माहौल चाहते थे...एक मिनट की भी देरी इन्हें बेहद खलती थी...उनके कड़े रूख के कारण बेटे और बहू उन्हें अपने साथ नहीं रखना चाहते थे...

मैंने वृद्धाश्रम में बुजुर्गों के साथ बिताए पलों पर स्टोरी लिखी...पैकेज बनाया और वो पैकेज बुलेटिन में कई बार चला...अपनी शिफ्ट पूरी कर मैं घर वापस आ गई...रात को सोते वक्त मेरी नज़रों के सामने वही तस्वीरें घूम रही थीं...मैं बैचैन थी...आख़िर बुढ़ापे में लोग अपने माता पिता को कैसे इस कदर छोड़ देते हैं...क्या इन बुजुर्गों का मन नहीं होता होगा अपने परिवार की खुशियों में शरीक होने का...उनके साथ त्योहार मनाने का...अपने खून के रिश्तों से मिलने का...मैं गहन चिंतन में डूब गई...
हमारी हमदर्दी बुजुर्गों के प्रति तो होती ही है लेकिन क्या इन बुजुर्गों को भी थोड़ा सामंजस्य स्थापित कर नहीं चलना चाहिए...ताकि सामने वाले को भी कोई परेशानी न हो और आप भी खुशी खुशी रह सकें...देखा जाए तो आज की पीढ़ी हरफनमौला की तरह जिंदगी जीती है...उनकी जिन्दगी में रोक-टोक लगाने वालों के लिए कोई जगह नहीं...खासकर युवा पीढ़ी किसी रोक-टोक को बर्दास्त नहीं करती...बुढ़ापे में लोगों को अगली पीढ़ी के साथ सामन्वय कर चलना होगा ताकि उन्हें ये दिन न देखना पड़े...

गुरुवार, अक्तूबर 8

बिग बी का जादू


‘अमिताभ बच्चन’ एक ऐसा नाम जिसमें अनोखा तेज़ झलकता है...इस तेज के समक्ष सभी पात्र फीके नज़र आते हैं...आज भी उनकी आवाज़ में वो दमखम है जिसके सामने सबकी आवाज़ दब सी जाती है...कैमरे के समक्ष संवाद प्ररस्तुत करने की कला में तो अमित जी माहिर हैं...हालांकि जितने भी संवाद वो बोलते हैं उनमें से ज्यादातर संवाद पहले से लिखे होते हैं...लेकिन कैमरे के सामने वो इस कदर उस संवाद को प्रस्तुत करते हैं मानो वो किसी जीवित व्यक्ति से सीधे मुंह बात कर रहे हों...उनकी इसी कला के तो दर्शक कायल हैं...उनकी हंसी पर जनता हंसती है और उनकी उदासी पर उदाह हो जाती है...जब अमित जी रोते हैं तो दर्शक का दिल भी बोझिल हुए बिना नहीं रह सकता...बात बड़े पर्दे की हो या छोटे पर्दे की...वो जिस ओर रुख करते हैं जनता उसी ओर खिंची चली आती है...आज बॉलीवुड का हर किरदार उनके सामने बौना पड़ जाता है...उनकी प्रतिभा के सामने कोई टिक ही नहीं पाता...उम्र के इस पड़ाव पर भी अमिताभ एक हिट नाम है...फिल्मों में तो कई पात्र अहम होते हैं लेकिन जिस चरित्र को बीग बी जीते हैं उसको भली भांती जीवंत बना देते हैं...फिल्म का हिट या फ्लॉप होना कई पहलुओं पर निर्भर करता है...मसलन फिल्म की...कहानी उसकी स्क्रीप्ट...संवाद...गाने...अभिनेता..अभिनेत्रियों की सहभागिता...लेकिन अगर अमित जी किसी विज्ञापन में हो या किसी टीवी शो में तो इस विज्ञापन और शो के हिट होने की 100 प्रतिशत गारंटी तो हो ही जाती है...




संघर्ष के दिनों में कई निर्माता- निर्देशकों ने अमिताभ बच्चन को उनकी खामियां गिनाकर फिल्मों में लेने से मना कर दिया था। इतना ही नहीं जब वह आकाशवाणी में गए तो वहां उनकी आवाज को खारिज कर दिया गया, लेकिन उन्होंने अपनी इन सभी खामियों को गुणों में बदलकर यह साबित कर दिया कि उन्हें नकारने वाले ही गलत थे। फिल्म समीक्षकों की नजर में ही नहीं दर्शकों ने भी बिग बी की सफलता से उन्हें मिलेनियम स्टार से भी काफी आगे पहुंचा दिया है।






अमित जी की एक बात मेरे दिल को छू जाती है और वो है उनके ब्लॉग लिखने की कला...अपनी व्यस्त दिनचर्या में से वे इतना वक्त निकाल लेते हैं...और समय-समय पर अपने ब्लॉग को अपडेट कर लेते हैं...वाकई काबिले तारीफ़ है...मैं उनकी इस अदा की कायल हूं...

खूबसूरती का ताज








खूबसूरती का ताज जिसके सिर सजता है वहीं सुंदरी खूबसूरत लगने लगती है...खूबसूरती की प्रतियोगिता में एक से बढ़कर एक सुंदरियां अपने-अपने देशों से चयनित हो कर आती हैं...कई बाधाओं को पार कर वो उस मुकाम तक पहुंचती हैं...और वहां भी प्रतिभागियों के बीच मुकाबला काफी कड़ा होता है...उस स्टेज पर ब्यूटी विद ब्रेन का चयन किया जाता है...सभी देशों की एक से बढ़कर एक बालाएं अपनी खूबसूरती का परिचय देने आती हैं...इतनी सुंदरियों के बीच जिसका चयन किया जाता है वो भी ताज पहनने से पहले तक तो उन सबके बीच सामान्य सी दिखती हैं...लेकिन जैसे ही खूबसूरती का वो ताज...किसी एक सुंदरी के सिर सजता है...उस सुंदरी की खूबसूरती और बढ़ जाती है...क्या उस ताज में कोई खूबी है कि एक सामान्य सी दिखने वाली बाला को भी वो और सुंदर और न केवल फैशन जगत की...बल्कि दुनिया की राजकुमारी बना देता है...कम उम्र की बालाएं अपने देश का प्रतिनिधित्व करते हुए सुंदरता के साथ-साथ अपनी बु्द्धि और विवेक का भी परिचय देतीं हैं

साल 1994 भारत के लिए बेहद खास रहा...क्योंकि खूबसूरती की दुनिया में देश ने इतिहास रच दिया था...एक साथ ऐश्वर्या राय और सुष्मिता सेन ने पूरी दुनिया के फैशन जगत में भारत के नाम का परचम लहराया था...देश आज भी उस पल को नहीं भूल पाया है...उसके बाद घर-घर में लोग फैशन के बदलते ट्रेंड को अपनाने लगे थे...ऐसा नहीं है कि पहले लोग फैशन के प्रति जागरुक नहीं थे...फिल्मों के ज़रिये लोग अपने फैशन में समय-समय पर बदलाव करते रहे हैं...लेकिन ऐश और सुष ने फैशन को नया आयाम दिया...इसके बाद साल 1997 में डायना हेडेन ने ताज जीत कर देश को गौरवान्वित किया...फिर बारी आई युक्ता मुखी की साल 1999 में युक्ता ने परचम लहराया...वहीं साल 2000 में भारत के नाम तीन ताज आया...खूबसूरती की प्रतियोगिता में लारा दत्ता, प्रियंका चोपड़ा और दीया मिर्जा ने इतिहास रच दिया...भारत अब फिर से इस इतिहास को दोहराने की बाट जोह रहा है...सुंदरियां प्रतियोगिता में चयनित होकर जातीं हैं तो पूरे देश की नज़रें इस प्रतियोगिता पर टिक जाती हैं...लेकिन जैसे ही परिणाम घोषित होता है...और निराशा हाथ लगती है...पूरा देश शोक में डूब जाता है...ऐसा प्रतीत होता है मानो देश का प्रतिनिधित्व करने वाली प्रतिभागी की नहीं पूरे देश की हार हुई हो...
कितनी अजीब कहानी है इस फैशन जगत की भी...प्रतिभागी जीत कर लौटती हैं...तो पूरा देश उन्हें सिर आंखों पर बिठा लेता है...और अगर हार कर लौटतीं...तो उनकी खोज ख़बर लेने वाला तक कोई नहीं होता...
जीत कर लौटने वाली प्रतिभागी को थोड़ी सहूलियत जरूर होती है...उन्हें फटाफट विज्ञापनों और फिल्मों के ऑफर मिलने लगते हैं...लेकिन उनके समक्ष चुनौतियां कम नहीं होतीं...सोच विचार कर उन्हें फिल्मों और विज्ञापनों का चयन करना पड़ता हैं...क्योंकि ये उनके करियर के लिए काफी अहम मोड़ होता है...पहली ही फिल्म फ्लॉप हुई तो समझो उन्हें खुद को बॉलीवुड में स्थापित करने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी...अब अभिनेत्री सुष्मिता सेन को ही ले लीजिए...उनकी पहली फिल्म कोई खास करामात नहीं दिखा पाई...हालांकि ऐश की फिल्मों ने भी शुरूआत में कुछ खास कमाल नहीं दिखाया लेकिन धीरे-धीरे ऐश ने इंडस्ट्री में खुद को स्थापित किया...और आज भी ऐश के पास सुष से ज्यादा बड़े बजट की फिल्में हैं...जबकि ऐश ने मिस वर्ल्ड का ताज जीता था...और सुष ने मिस यूनिवर्स का...हम सुंदरियों को जितनी जल्दी सिर आंखों पर चढ़ाते हैं उतनी ही जल्दी उन्हें नीचे भी झटक देते हैं...आज युक्ता मुखी को ही ले लीजिए..एक आध फिल्मों के बाद वो गुमनाम हो गई...वहीं लाला दत्ता और दीया मिर्जा आज भी खुद को स्थापित करने की जद्दोजहद में लगीं है...हां प्रियंका चोपड़ा ने ऐश की तर्ज पर फिल्म इंडस्ट्री में जरूर एक अच्छा मुकाम पाया है...बांकी सुंदरियां कब आई और कब चली गई पता ही नहीं चला...केवल दो चार विज्ञापनों में और फैशन शो उन्हे मिल पाते हैं..या फिर किसी जगह फीता काटने के लिए बुला लिया जाता है...
देश को अब एक बार फिर खूबसूरती के ताज का इंतज़ार है...और खुबसूरती की प्रतियोगिता में जानेवाली उस प्रतिभागी को देश उसी उम्मीद से प्रतियोगिता में भेजता है...अब देखना ये हैं कि दोबारा कब ये मौका मिलता है..जब देश की झोली में ये तीनों ताज एक साथ गिरते हैं...

बुधवार, सितंबर 16

इकोनॉमी बनाम कैटल क्लास




विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर ने इकोनॉमी क्लास को कैटल क्लास का दर्जा दिया हैं...मंत्री जी ने ये कहकर इकोनॉमी क्लास में सफर करनेवालों को जानवरों की श्रेणी में ला खड़ा किया है...

शशि जी जब आप इकोनॉमी क्लास को कैटल क्लास का दर्जा दे रहे हैं...
तो फिर भारी-भीड़ वाली ट्रेनों औऱ बसों को किस कैटेगरी में रखेंगे...?
जिसमें देश की करोड़ों जनता सफर करने को मजबूर है...


पिछले दिनों प्रणव मुखर्जी ने सांसदों, मंत्रियों व सरकारी अधिकारियों को खर्च में कटौती की सलाह दी थी उनकी सलाह के बाद विदेश मंत्री एसएम कृष्णा व उनके जूनियर शशि थरूर ने पांच सितारा होटल छोड़ दिया था...कांग्रेस सुप्रीमो श्रीमती सोनिया गांधी और वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने विमान कें इकोनॉमी क्लास में यात्रा करने के बाद देश भर के मंत्री, सांसद, विधायक और नौकरशाहों को फिजूलखर्ची रोकने का संदेश दिया...अपनी मां सोनिया गांधी के मितव्ययिता के नक्शेकदम पर बढ़ते हुए कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने लुधियाना जाने के लिए शताब्दी एक्सप्रेस में सफर किया...राहुल ने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर शताब्दी एक्सप्रेस के चेयर कार में सवार होकर लुधियाना तक की दूरी तय की...हालांकि उनकी यात्रा विवादों में घिर गई...राहुल गांधी की पहली ही ट्रेन यात्रा में पत्थरबाजी की घटना के बाद उनकी सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई...फिजूलखर्ची रोकने के नाम पर सोनिया व राहुल की सुरक्षा दांव पर लगाने को लेकर सवाल उठने लगे... कांग्रेस ने कहा कि बेशक मितव्ययिता उसकी प्रतिबद्धता है, मगर सोनिया व राहुल की सुरक्षा से पार्टी कोई समझौता नहीं करेगी...वहीं राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद ने चुटकी लेते हुए कहा है कि अच्छा होता कि देश के बड़े नेता राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के रास्ते पर चलकर ट्रेन के सबसे निचले दर्जे में यात्रा करते...उन्होंने दावा किया है कि वे अगले चुनाव में हेलीकाप्टर से प्रचार नहीं करेंगे...तो देखना ये है कि इकोनॉमी क्लास का ये नया चैप्टर क्या-क्या गुल खिलाती है...और कौन-कौन से नेता इसकी नीति को...कब तक अपनाते हैं...

मंगलवार, सितंबर 8

बोर्ड परीक्षा से मुक्ति...!


केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) के स्कूलों में 10वीं बोर्ड परीक्षा 2011 से खत्म कर दी जाएगी...और ग्रेडिंग सिस्टम 2010 में लागू हो जाएगा...केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने इसकी औपचारिक घोषणा भी कर दी है... हालांकि, जो छात्र खुद ही बोर्ड की परीक्षा देना चाहेंगे उन्हें ऑनलाइन या कागज कलम के जरिए इसका अवसर मुहैया कराया जाएगा। बोर्ड के इस फैसले से जहां कुछ छात्रों में खुशी है तो ज्यादातर छात्रों में नाराजगी भी देखी जा रही है...हालांकि इस फैसले से 10 वीं बोर्ड का EXAM FEVER बच्चों में ख़त्म हो जाएगा...पढ़ने वाले बच्चे तो बैसे भी पढ़ाई कर ही लेंगे...लेकिन जो बच्चे पढ़ाई में कमजोर होंगे उन्हें अपने आप को सुधारने का मौका भी नहीं मिलेगा...और उन्हें अचानक प्रतियोगी परीक्षाओं का सामना करना पड़ेगा...बच्चों में परीक्षाओं को लेकर तनाव को दूर करने के मकसद से सीबीएसई के स्कूलों में बोर्ड परीक्षा खत्म करने का ये फैसला लिया गया है...12वीं तक चलने वाले स्कूलों में 10वीं के छात्रों को बोर्ड परीक्षा नहीं देनी होगी...इसी तरह 10वीं तक चलने वाले स्कूलों के छात्र भी अपनी मांग पर बोर्ड की परीक्षा दे सकेंगे...जो छात्र प्रतियोगिताओं में बैठने के लिए या किसी अन्य मकसद से अंक हासिल करना चाहेंगे उन्हें यह मुहैया कराया जाएगा...लेकिन जो छात्र अन्य स्कूलों में स्थान्तरण के लिए परीक्षा देना चाहेंगे उनके लिए सीबीएसई की ऑन डिमान्ड परीक्षा आयोजित की जायेगी...प्राप्तांकों को नौ प्वाइंट स्केल के आघार पर ग्रेड दिए जाएंगे...ये 9 ग्रेड A1 से लेकर E1 तक होंगे. शिक्षा मंत्रालय ने यह कदम छात्रों के ऊपर से बोझ कम करने और पढाई को सरल बनाने के लिए उठाया है...ग्रेडिंग सिस्टम आने से पढ़ाई के सिस्टम में कोई बदलाव आएगा इसके बारे में अधिकांश स्टूडेंट्स असहमत ही नजर आते हैं...और अभिभावकों में भी नाराजगी देखी जा रही है...छात्रों का मानना है कि उन्हें अंक देखकर ही खुशी मिलती है...और परफॉर्मेस देखने के लिए ग्रेडिंग नहीं मार्क्‍स की जरूरत है...माना जा रहा है कि इस फैसले के बाद बोर्ड का हौवा खत्म हो जाएगा...लेकिन छात्रों को बोर्ड एग्जाम से प्रतियोगी परीक्षाओं की समझ मिलती है और अनुभव भी मिलता है...ज्यादातर बच्चे 9 वीं कक्षा तक तो सामान्य तौर पर पढ़ाई करते हैं और 10 वीं में काफी serious होकर पढ़ते हैं...माता पिता भी 9 वीं कक्षा तक बच्चों पर दबाव नहीं डालते...10 वीं की परीक्षा के लिए बच्चे काफी मेहनत करते हैं...इस फैसले के लागू हो जाने से बच्चों में प्रतिशत के मायने बदल जाएंगे...ग्रेडिंग से बच्चों को कितने अंक हासिल हुए इसका तो पता ही नहीं चलेगा...बच्चों में बोर्ड के प्रति उत्साह में कमी आएगी...देश में कई बार बोर्ड परीक्षा में खराब अंक मिलने से कई बच्चों के आत्महत्या तक की घटना सामने आई है...बोर्ड के इस फैसले के बाद आत्महत्या जैसी घटना में तो कमी आएगी लेकिन बच्चों को अचानक प्रतियोगी परीक्षाओं का सामना करना पड़ जाएगा...जिससे उनके सामने कई काफी कठिनाइया सामने आएंगी...कुल मिलाकर देखा जाए तो ग्रेडिंग सिस्टम से भले ही औसत बच्चों को फायदा मिले लेकिन जो परीक्षार्थी पढ़ने में काफी अच्चे हैं वे बेचारे मात खा जाएंगे...उन्हें उनके सही मुल्यांकन का पता ही नहीं चलेगा...

सोमवार, सितंबर 7

कविता की व्यथा...




मैं हूं कविता...कवियों की अनमोल कल्पना...लेकिन अब मुझे भला कौन पूछता है...आज के तड़कीले-भड़कीले संगीत के सामने मैं बेबस-लाचार हूं...रिमिक्स...इंडीपॉप...वेस्टर्न...गज़ल...फिल्मी संगीत...एल्बम...इन सबके आगे लोग मुझे भूल गए हैं...केजी, नर्सरी के बच्चों की ज़ुबान पर तो कभी-कभी मैं चढ़ भी जाती हूं...लेकिन उतनी ही जल्दी मैं भुला भी दी जाती हूं...कालिदास ,जयशंकर प्रसाद, हरिवंश राय बच्चन, महादेवी वर्मा जैसे कवियों ने मुझे जीवंत किया...लेकिन अब लगता है मुझे आगे बढ़ाने वाला शायद कोई नहीं...आज-कल के कवि अपनी कविता में केवल तुक बांध देते हैं...और बन जाती है कविता..लेकिन उसमें न तो रस का अता-पता होता है...और न ही अलंकारों का...अलंकार तो पूरी कविता में आप खोजते रह जाएंगे...मेरे रस बेमतलब साबित होते जा रहे हैं...औऱ अलंकारों की तो पूछिए ही मत...लोग संगीत सुनना ज्यादा पसंद करते हैं...भला करें भी क्यों ना...आजकल के संगीत में मधुर-धुन...वाद्य यंत्रों के आधुनिक उपकरणों का प्रयोग...लटके-झटकों वाले दृश्य...विदेशी परिवेश की छटा...महंगे सेट के नजारे...आपको भरे-पड़े मिलेंगे...यही आज की पसंद भी है...मेरा सहारा तो बस शब्दों का सटीक चयन हैं...आज की हाईटेक जिंदगी में लोगों के पास इतना वक्त कहां कि वो मुझे पढ़ने में वक्त जाया करें...मैं तो बस अपने शब्दों के मायाजाल में लोगों को कल्पनालोक की सैर करवाती हूं...पहले तो कहा भी जाता था 'जहां न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि'लेकिन अब तो कोई कल्पनालोक में डूबकर मोतियों जैसे शब्दों में मुझे पिरोता भी नहीं...शब्दों की कल्पना से कुछ कवि कभी-कदार मुझे उकेरने का प्रयास भी करें...तो पाठक और श्रोता मुझे बिना भाव के एक लय में पढ़ जाते हैं...फिर तो मेरे अंदर समेटे भाव उभरकर निकल ही नहीं पाते...मैं अपनी कविता में भले ही कितने भी मार्मिक शब्दों का जाल बुन दूं...लेकिन मेरे अंदर के भाव को कम ही लोग समझ पाते हैं...

रविवार, सितंबर 6

हादसों का सफ़र...


आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी की हेलिकॉप्टर दुर्घटना में हुई मौत को भले ही किसी राजनीतिक स्टंट से जोड़कर न देखा जा रहा हो लेकिन उनकी मौत ने अपने पीछे कई सवाल छोड़ दिए हैं...हैदराबाद के पुराने हवाई अड्डे बेगमपेट से उनका हेलिकॉप्टर बेल 403 रवाना हुआ...नया एयरपोर्ट बन जाने के बाद करीब डेढ़ साल पहले ही बेगमपेट हवाई अड्डा बंद हो चुका था...ये हेलिकॉप्टर 2 सितंबर को सुबह 8:38 बजे सीएम सहित पांच लोगों को लेकर चित्तूर के लिए रवाना हुआ...और सुबह 9:35 बजे हेलिकॉप्टर से संपर्क टूट गया...लेकिन इसकी जानकारी दोपहर 1 बजे के बाद मीडिया की सुर्खियां बनीं...और पूरे देश में हड़कमप मच गया...राज्य में ही नहीं केन्द्र में भी लोगों को राजशेखर की चिंता सताने लगी...अब सवाल ये उठता है कि 9:35 से ही जब रेड्डी से संपर्क टूट गया तो क्या हेलिकॉप्टर के दुर्घटनाग्रस्त होने तक इंतज़ार किया गया...और हेलिकॉप्टर को जलने के लिए छोड़ दिया गया...जिस दिन राजशेखर ने उड़ान भरी उस दिन मौसम बेहद खराब था फिर किसके कहने पर हेलिकॉप्टर को उडा़न भरने की इजाज़त दी गई...उड़ान भरने से पहले पायलट को आसपास के 4 राज्यों के मौसम की औऱ साथ ही जिस रूट से उसे जाना है उसकी जानकारी दी जाती है...तो क्या पायलट को इसकी जानकारी नहीं दी गई...आखिर किसके दबाव में ये यात्रा की गई...क्या राजनेता ने खुद यात्रा का दबाव बनाया? जिस हेलिकॉप्टर में राजशेखर सवार थे वो काफी पुराना हेलिकॉप्टर था और उसके तकनीकि यंत्रों की सही तरीके से चैकिंग नहीं की गई थी...दो साल से हेलिकॉप्टर की मरम्मत भी नहीं हुई थी...10:45 बजे तक राजशेखर को चित्तूर पहुंच जाना था...लेकिन 10:45 से 1 बजे तक जनता, वहां के आयोजक औऱ नेता चुपचाप इंतज़ार करते रहे? इतना लंबा इंतज़ार भाई मानना पड़ेगा उनके सब्र के...इस बीच हेलिकॉप्टर पर सवार लोग दुर्घटना की आशंका के मद्देनज़र कागजों पर निशान बनाकर नीचे फेंकते रहे ताकि खोजी दल आसानी से उनका पता लगा सकें...इसका मतलब दुर्घटना अचानक नहीं हुई...दुर्घटना से पहले उन्हें पता चल गया था कि उनकी जान को ख़तरा है...एसे में अगर उस हेलिकॉप्टर में पैराशूट की सुविधा होती तो शायद उन सबकी जान बच जाती थी...दोपहर 1 बजे के बाद सर्च ऑपरेशन शुरू हुआ...एक तो नक्सल प्रभावित इलाका और ऊपर से बरसात के बाद जंगल में फैली हरियाली से भी उनकी तलाश काफी मुश्किल थी...केन्द्रीय गृह औऱ रक्षा मंत्रालय ने खोज की कमान संभाली...सुखोई सेना के हेलिकॉप्टर और मानव रहित विमान उनकी तलाश में जुट गए इसके लिए इसरो से मदद ली गई..इसरो ने 41 तस्वीरें भेजीं लेकिन खराब मौसम की वजह से तस्वीरें साफ नहीं आ पाई...अमेरिका से भी उसके उपग्रहों की मदद मांगी गई...शाम 4:30 बजे से 200 वर्ग किलोमीटर के नल-मल्लई के खौफनाक जंगल में सेना के विशेष कमांडो दस्ते समेत सीआरपीएफ के 500 जवानों ने भी सर्च अभियान शुरू किया...रातभर सर्च अभियान चलता रहा...मोबाइल टावरों के तरंगों की मदद से लोकेशन पता करने की कोशिशें की गई...नक्सल प्रभावित घने जंगलों में आदिवासियों के 14 दल भी खोज अभियान में जुट गए...सुबह 8:39 के बाद खबरें आई कि रेड्डी के हेलिकॉप्टर का पता चल गया...फिर क्या था सेना सहित मीडियाकर्मी भी कवरेज के लिए दुर्घटना स्थल पहुंच गए...रेड्डी के मौत की पुष्टि हुई और पूरा देश सदमें में आ गया...दूसरे दिन उन्हें श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लग गया...और अपने प्यारे राजनेता की मौत से दुखी 60 लोगों ने आत्महत्या कर ली...वहीं आठ लोग सदमें से चल बसे...राजशेखर रेड्डी की मौत के बाद पार्टी में जोड़तोड़ की राजनीति शुरू हो गई...राजशेखर के पुत्र जगन को अगले मुख्यमंत्री के तौर पर देखा जाने लगा...लेकिन इसी बीच आनन-फानन में रोसैया को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी गई...अब आलाकमान ने सख्त निर्देश दिए हैं कि रोसैया ही मुख्यमंत्री बने रहेंगे...
राजनेताओं की हवाई दुर्घटना में मौत का ये पहला मामला नहीं...इससे पहले भी भारतीय राजनीति के इतिहास पर नज़र डालें तो दुर्घटना का शिकार होनेवाले नेताओं की लंबी फेहरिस्त है...इस लिस्ट में सबसे महत्वपूर्ण नाम है पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी के पुत्र और कांग्रेस के प्रतिभाशाली नेता संजय गांधी का...जिनकी दिल्ली के सफदरजंग हवाई अड्डे पर ग्लाइडर दुर्घटना में मौत हो गई थी...इसी कड़ी में कांग्रेस के प्रतिभाशाली नेता राजेश पायलट की 11 जून 2000 को जयपुर के पास सड़क हादसे में मौत हो गई थी...एक और महत्वपूर्ण नाम है माधवराव सिंधिया का 30 सितंबर 2001 को विमान दुर्घटना में उनकी मौत हो गई...उसके बाद उद्योगपति और राजनेता ओ.पी.जिंदल भी 31 मार्च 2001 को विमान दुर्घटना का शिकार हो गए...बीजेपी के प्रतिभाशाली नेता साहिब सिंह वर्मा की 30 जून 2007 को अलवर-दिल्ली राजमार्ग पर सड़क हादसे में मौत हो गई...कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल,केन्द्रीय मंत्री पृथ्वीराज चव्हान और शैलजा उस समय बाल-बाल बच गए जब 2004 में गुजरात ले जा रहे हेलिकॉप्टर का पिछला हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया था...14 जुलाई 2007 को भोपाल से रायपुर के लिए उड़ा मैना हेलिकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया और उसमें सवार लोगों की मौत हो गई, हालांकि उसमें कोई राजनेता सवार नहीं थे...इस तरह हादसे-दर-हादसों के बाद भी अगर हम सतर्क नहीं होंगे...तो इनकी फेहरिस्त और लंबी हो सकती है...जरूरत है इन हादसों से सबक लेने की ताकि भविष्य में ऐसे हादसे दोहराए न जाए...
चुनाव आते ही राजनेताओं के साथ-साथ अभिनेता और अभिनेत्रियां भी हेलिकॉप्टर दौरा खूब करते है...इस दुर्घटना के बाद तो हेलिकॉप्टर दौरा करनेवालों के ज़ेहन में कहीं-न-कहीं डर समा ही गया है...ऐसे में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम की जांच पड़ताल के बाद ही वे उड़ान भरें तो वेहतर पहल होगी...

सोमवार, अगस्त 31

दिल का रिश्ता...







ये रिश्ते भी कितने अजीब होते हैं...



कुछ दूर...तो कुछ...
दूर रहकर भी करीब होते हैं...
कुछ को मांगते हैं हम अपनी दुआओं में
तो कुछ हमें किस्मत से नसीब होते हैं...




कितने अजीब है ये रिश्ते...
हम जानते हैं कि रिश्ता जो भी हो
हमें मिल ही जाएगा...
फिर भी...क्यों हम
दुआओं के लिए...झोली फैलाते हैं
दिल क्यों किसी से मिलकर खुश
और बिछड़कर जख्मी हो जाता है...
हम जानते हैं कि हमारे नसीब में जो भी हो...
हमें ख़ुद-ब-ख़ुद मिल ही जाएगा...
दिल को समझाना मुश्किल क्यों होता है...
ये दिल भी न जाने क्यों..
धोख़ा खाकर भी नहीं सुनता...
कमज़ोर दिलवालों..ज़रा ग़ौर से सुनें
दिल अगर धड़कता है किसी को देखकर
तो कृप्या अपने दिल का लैमिनेशन करा लें
भगवान ने सबको एक ही दिल तो दिया है
ख़ुदा-ना-खास्ता...गर टूट गया
तो कभी जुड़ता नहीं...बेहतर है..
पहले ही सतर्क हो जाएं...
इसलिए दिल को ज़रा संभाल कर रखें...
यहां-वहां भटकने न दें...
जब यहां-वहां फिरता है ये दिल..
तो आवारा कहलाता है...
और जब टूट जाए...ये दिल..
तो बेचारा बन जाता है...
लेकिन जब इससे कोई थोड़ी सी
हमदर्दी भरी बातें कर ले...
तो बस...उसी का हो जाता है...ये दिल
प्यार से ज़रा इसे कोई पुचकार ले
तो फफक-फफक कर...
अपनी व्यथा सुनाता है...ये दिल
ये दिल भी ना...
जाने कौन सा स्वाभिमान दिखाता है...
कि उससे एक शब्द नहीं बताता
जिसने इसे इतना छल्ली किया हो...
ये रिश्ता जब टूटता है..
कोई आवाज़ नहीं होती...
लेकिन इसका दर्द
पीढ़ियों तक दर्द छोड़ जाता है
ये ज़िंदगी भी हमें कितने रंग दिखाती है...
किसी से मिलाती है..
तो किसी से हमेशा के लिए जुदा कर जाती है
जब किसी से जुड़ता है ये दिल
तो उसी में अपनी सारी खुशियां तलाश लेता है
ये दिल...
दुनिया उतनी बड़ी भी नहीं..
जितना हम समझते हैं...
न जाने हमे किस मोड़ पे
फिर मिलाता है ये दिल...

गुरुवार, अगस्त 27

घर में घमासान


इन दिनों भाजपा में आपसी घामासान खुलकर सामने आ रहा है...नेता...नित नए-नए खुलासे कर रहे हैं...पार्टी की अंदरूनी कलह से हर रोज़ एक नया मामला उभरकर सामने आ रहा हैं...जिससे न केवल देश की जनता बल्कि भाजपा के आलाकमान भी सक्ते में हैं...जिन्ना के जिन के बाद जसवंत सिंह को आनन-फानन में पार्टी से निकालना भाजपा नेतृत्व को भारी पड़ रहा है...पार्टी के भीतर बगावत की जो लहर उठी, उससे न सिर्फ पार्टी दो गुटों में बंटी दिख रही है...बल्कि इस फेरबदल से बड़े नेता भी चपेट में आ गए। जसवंत ने जिन्ना प्रकरण व कंधार कांड पर आडवाणी पर सवाल उठाए ही थे, कि अरुण शौरी संघ का झंडा उठाए समूचे भाजपा नेतृत्व को ही बदलने का नारा लगाने लगे। और तो और, राजग सरकार में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे व पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नजदीकी रहे ब्रजेश मिश्र भी मैदान में उतर आए। उन्होंने भी कंधार कांड को लेकर आडवाणी पर निशाना साधा। कुछ समय से शांत बैठ यशवंत सिन्हा ने भी मौका देख ब्रजेश की बात का समर्थन कर पार्टी की मुसीबत और बढ़ा दी।
उत्ताराखंड में मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के बाद नाराज चल रहे भुवन चंद्र खंडूड़ी ने दिल्ली पहुंच कर मोर्चा खोला...उन्होंने आडवाणी से मुलाकात कर अपने मामले में पुनर्विचार की मांग कर नया विवाद खड़ा कर दिया...राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की ओर से भी पार्टी की सिरदर्दी बढ़ा दी...
ऐसे में लगता है...भाजपा के नए घमासान की तोड़ फिलहाल संघ के पास भी नहीं है...हालांकि दिल्ली में डटे संघ प्रमुख मोहन भागवत से भाजपा के वरिष्ठ नेता डा.मुरली मनोहर जोशी मुलाकात कर पार्टी को एसे समय में टूटने से बचाने की मुहिम में जुटे हैं...जोशी ने अनुशासन के मामले में कड़ी कार्रवाई करने की बात तो कही है...भाजपा के तमाम नेताओं की नजर मोहन भागवत पर टिकी है...पार्टी को संकट से निकालने के लिए शायद कोई नायाब तरकीब हाथ लगे...इस घमासान के बीच पार्टी की कश्ती डूबती नजर आ रही है...अब देखना है कि इस मुसीबत से भाजपा खुद को कैसे निकाल पाती है...और कौन-कौन से नेता भाजपा के शासनकाल के नए-नए खुलासे लेकर आते हैं...इस बार भी भाजपा के चुनावी पराजय के बाद पार्टी के नेता पार्टी का साथ छोड़ कर भागने लगे हैं...और जाते –जाते पार्टी की कटु आलोचना और दोषारोपण भी करके जा रहे हैं...भाजपा भला कैसे और किन किन नेताओं पर कार्रवाई करे...पार्टी का डूबता जहाज छोड़ नेता चूहों की तरह पार्टी का साथ छोड़- छोड़ कर भागने लगे हैं, और पार्टी के खिलाफ किताबें लिखने लगे हैं...वैसे भी जहाज का अस्तित्व चूहों से नहीं होता, चूहों का अस्तित्व जहाज से होता है...मलाई का मोह बड़ा भारी होती है, आज नहीं तो कल फिर ये नेता “भाजपा शरणं गच्छामि” कहते लौट आए तो कोई बड़ी बात नहीं...

शुक्रवार, अगस्त 21

मीडिया का काला चिट्ठा




सिक्के दे दो पहलू होते हैं...वैसे ही हर चीज के दो रूप है...एक अच्छा...तो दूसरा बुरा...मीडिया का भी दो रूप देखने को मिलेगा...एक अच्छा तो दूसरा बेहद ख़राब...मैं आपको मीडिया के दूसरे रूप से अवगत कराना चाहती हूं...जब भी कहीं कोई घटना या कहें दुर्घटना घटती है तो एक मीडिया पर्सन कभी उस दुर्घटना में घायल की मदद करने आगे नहीं आता...बल्कि उसे तो उस दुर्घटना में अपने चैनल को जल्द से जल्द और अधिक से अधिक जानकारी देने से मतलब है...सबसे पहले ख़बर ब्रेक करना LIVE ख़ीचना और घायलों और मृतकों की संख्या जानना उसकी प्राथमिकता होती है...मीडिया हाउस उससे समय-समय पर अपडेट्स लेती है...OUTDOOR VAN के जरिए ताज़ा हालात पर पल पल की नज़र रखी जाती है...लेकिन क्या अगर उस दुर्घटना में एक मीडिया पर्सन के रिश्तेदार शामिल हो तो वो मीडिया पर्सन ख़बरों को ऐसा ही कवरेज दे पाएगा...नहीं कभी नहीं...कितनी अजीब बात है...दूसरों के लिए हमारी संवेदना कितनी मर चुकी होती है...
किसी भी खबर की जिंदगी काफी कम देर की होती है...समय के साथ ही खबरें बासी हो जातीं हैं...वैसे ही जैसे सड़ी हुई मछली...या एक दिन पुराने अख़बार की तरह बासी..ख़बरों का अपडेट होना बेहद ज़रूरी है...एक पत्रकार को हमेशा ख़बरों के मायाजाल में उलझे रहने की आदत हो जाती है...पत्रकारों में ख़बरे जल्दी दिखाने की और दूसरे चैनलों से पहले दिखाने भी अजीब सी होड़ होती है...

एक बार मैं एक मीडिया हाउस में इवनिंग शिफ्ट में थी...अचानक खबर आई कि एक प्रसिद्ध नेता को गोली लग गई है...पूरे हाउस में हलचल मच गई...कुछ लोगों की शिफ्ट ओवर हो चुकी थी...लेकिन वे ख़बर के पुख्ता होने तक रुक गए...उन्हें इस चीज़ से मतलब नहीं था कि नेता की स्थिति कैसी है...बल्कि वो ये जानने के लिए बेताब थे की नेता अभी ज़िंदा है...या फिर उसकी मौत हो चुकी है...और अगर मौत हो गई है तो सबसे पहले हमारे चैनल में ख़बर ब्रेक होनी चाहिए...कुछ लोग उस नेता की प्रोफाइल बनाने में जुट गए तो कुछ उनकी फाइल फुटेज निकालने में...सबकी नज़रे ख़बर के अपडेट पर टिकीं थीं...हम जब किसी की प्रोफाइल बनाते हैं तो बड़े ही मार्मिक तरीके से शब्दों को पिरोते हैं...श्रद्धांजलि के तौर पर खूब सारे हृदय बिदारक शब्दों का इस्तेमाल करते हैं...लेकिन हमारी नज़रे उसके अपोज़िट टिकी होतीं है...हम उस खबर को फोकस करते हैं औऱ सबसे पहले चलाने की होड़ में लगे रहते हैं...और ये अक्सर होता है...अगर आप मीडिया हाउस में हैं तो ये आपके लिए कोई बड़ी बात नहीं...ऐसी ही एक घटना में मैंने भी एक हस्ती की प्रोफाइल बनाई...हालांकि उस हस्ती की मौत मेरे प्रोफाइल बनाने के 4 दिन बाद हुई और जिस दिन उनके मौत की खबर आई मेरी उस दिन छुट्टि थी...ऑफिस के लोगों ने मुझे फोन लगाना शुरू किया...कि मैंने उस प्रोफाइल को किस नाम से लिखा और किस नाम से पब्लिश कराया है...कितनी अजीब बात है...हम कितने संवेदनहीन होते जा रहे हैं...
मीडिया को यू ही नारद मुनि नहीं कहा जाता...वाकई मीडिया नारद मुनि का काम बखूबी निभा रहा है...फिल्मी गॉसिप्स को ही देख लीजिए...कितनी ही ख़बरे फिजूल की उड़ाई जाती हैं..और बाद में इसका खंडन किया जाता है...मीडिया को ऐसे गॉसिप्स से बस टीआरपी बटोरनी होती है...कई अंधविश्वास की खबरों के प्रसारण पर तो एक तरफ मीडिया कहता है 'इन ख़बरों को दिखाने का हमारा मक्सद अंधविश्वास फैलाना नहीं'और दूसरी और उन्हीं ख़बरों को प्राथमिकता से चलाता है...विजुअल्स में खूब सारे इफैक्ट का प्रयोग किया जाता है और लोगों की उससे संबंधित बाइटे प्ले की जाती हैं...तो फिर इसे दिखाने का मतलब क्या बनता है...हां जिस पार्टी की सत्ता हो उससे जुड़ी खबरे तो खूब दिखाई जाती हैं...लेकिन उसके घोटालों का खुलासा मीडिया उसके सत्ता छिन जाने के बाद ही क्यों करता है...
सब TRP का खेल है बिडू...समझे क्या..

बुधवार, अगस्त 19

ये कैसी झील...

मुज़फ़्फरपुर में एक जगह है...मोतीझील...नाम तो बड़ा ही प्यारा है...लेकिन इस नाम को सुनकर आप ये मत सोचिएगा कि वहां पुराने जमाने की कोई झील होगी...जिसमें मोतियां मिलती होंगी...जनाब ये गलती हमने भी कभी की थी...इस नाम को सुनकर राजा महाराजाओं की कहानी याद आती है...हमने भी कल्पना की थी...खूबसूरत से महल और उसके बीच में एक प्यारे से झील की...मगर नहीं दरअसल झील तो ये हैं लेकिन यहां से मोतियां नदारद है...आम दिनों में तो यहां बड़ी रौनक रहती है...लेकिन अगर आपको इसकी असलियत जाननी है तो बरसात के दिनों आप यहां का चक्कर लगा आईए...आप इसके नामकरण की हकीक़त से वाकिफ़ हो जाएंगे...दरअसल मुज़फ़्फरपुर के सबसे बड़े बाज़ार का नाम है मोतीझील...अब आप सोच रहे होंगे इसका नाम मोतीझील क्यों पड़ा...चलिए हम आपकी समस्या का हल किए देते हैं...बरसात के दिनों में ये पूरा इलाका तब्दील हो जाता है झील में...यानी यहां की गलियां और सड़कों पर घुटनों तक पानी भर जाता है...और वहां बने नाले की गंदगी सड़कों पर आकर बहने लगती हैं...यहां से पानी निकासी का कोई रास्ता नहीं...लोगों को इस झील से गुज़रकर खरीदारी करनी पड़ती है...
मेरा ऑफिस वहीं मोतीझील के पास हुआ करता था...उन दिनों मैं हिंदुस्तान में रिपोर्टिंग करती थी...बरसात में मैंने इन झीलों से गुज़रने का अनुभव कई बार झेला है...ये बाज़ार काफी पुराना है और इसके झील में तब्दील होने की कहानी भी नई नहीं है...लेकिन न तो प्रशासन की नज़र इस ओर गई हैं औऱ न ही यहां की जनता अपनी तक्लीफों से प्रशासन को अब तक अवगत करा पाई हैं...हर साल बरसात में आलम कुछ ऐसा ही होता है...अब तक तो यहां तीन साल से बन रहे ओवरब्रीज ने कई लोगों की जानें भी ले ली है...

MTT बोले तो मधु TOP TEN


पहले तो मैं आपको ये बता दूं की Top Ten का मतलब आप ये मत समझियेगा की मैं खूबसूरती में अपने ऑफिस में Top Ten की रैंक में आती हूं...Top Ten का मतलब है...इन दिनों मैं खबर Top Ten बनाती हूं...जिसमें मैं हेडलाइन की Top 10 खबरें शामिल करती हूं...जिसे Short में HTT कहते हैं...उसके बाद बारी आती है राजधानी Top Ten की जिसे Short में RTTकहते हैं इस तरह से स्पोर्ट्स TOP TEN, BUSINESS TOP TEN ,INTERNATIONAL TOP TEN,CITY TOP TEN,ENTERTANMENT TOP TEN मुझे बनाना पड़ता है...आप सोच रहे होंगे मैं इतना विस्तार से क्यों बता रही हूं...असल में मैं हर रोज़ इन सबसे जुड़ी 60 TOP की खबरें बनाती हूं...जिसके लिए मुझे हर रोज़ लगभग 150 खबरों से दो चार होना पड़ता है...शाम के तीन बजते ही मेरा काम शुरू हो जाता है और मेरा BULLETIN 10:30 बजे ON AIR होता है...जिसकी पूरी जिम्मेदारी मुझपर होती है...इस बीच मैं इतनी बिज़ी होती हूं कि किसी से बात करने का भी मेरे पास वक्त नहीं होता...बुलेटिन के लास्ट मोमेंट में तो कोई मेरे पास से कुछ कहकर गुज़र जाए और मेरा ध्यान भी उस ओर नहीं जाता...ऑफिस के मेरे साथियों ने इस वजह से मेरा नाम MTT रख दिया है...अब MTT का मतलब तो आप समझ ही गए होंगे यानी MADHU TOP TEN...
मुझे भी ये नाम अच्छा लगने लगा है...लोग मुझे बेहद कॉपरेट भी करते हैं...

गुरुवार, अगस्त 13

स्वाइन फ्लू का खतरा...


कुछ साल पहले प्लेग ने लोगों को डराया...उसके बाद बारी आई एड्स की...और अब स्वाइन फ्लू ने लोगों को दहशत में डाल दिया है...देश में हर रोज़ मरनेवालों की संख्या में इज़ाफा दर्ज किया जा रहा है...बचाव ही उपाय है की तर्ज पर...आम इंसान भी मास्क लगा कर घूमने को मजबूर है...किसी की मौत हुई नहीं की सेंप्ल टेस्ट के लिए भेजे दिया जाता है...जिससे लोग और भी डरे सहमे हैं...प्राकृतिक आपदा...दुर्घटना...इंसान किस किस से खुद को बचाए...और इन सबसे बच गया तो कहते हैं ना 'दुनिया में कितने गम हैं...मेरा गम कितना कम है' उस गम से भी निकल गया तो समझो उसने अपनी पूरी जिंदगी जी ली...
अब तो बस लोगों को इंतजार हैं कब ये स्वाइन की बला टले और लोग पहले कि तरह खुल कर जी सकें...स्वाइन ने हर शहर हर गांव और हर इलाके में आतंक फैलाना शुरू कर दिया है...जरूरत है तो बस सतर्क रहकर सुरक्षा अपनाने की...और डटकर मुक़ाबला करने की...जैसे प्लेग और एड्स का खतरा देश में धीरे धीरे टला है...एक दिन ये संकट भी दूर हो जाएगा...लेकिन हां इसके पीछे जनता में ग़लत संदेश न जाए...और लोग हिफाज़त का रास्ता अपनाए....तो निसंदेह ये बला भी टल जाएगी

बुधवार, अगस्त 12

मेरा पहला प्यार...

कहते हैं इंसान अपना पहला प्यार नहीं भूलता...मैं तो कहती हूं इंसान अपनी पहली नौकरी की खट्टी मीठी यादें भी नहीं भूल सकता...एक इंसान अपनी नौकरी को इंज्वॉय करते हुए काम करता है और दूसरा रो रो कर अपनी ड्यूटी निभाता है...बे-शक इन दोनों में से पहला इंसान खुशकिस्मत है...क्योंकि वो अपनी नौकरी को अपना सहीं समय दे पाता है...इंसान को अपनी नौकरी से प्यार करना चाहिए...न कि उसे भार के रूप में लेना चाहिए...मैंने भी अपनी नौकरी से प्यार किया है...और वो भी अपनी पहली नौकरी से...सचमुच मुझे सच्च वाला प्यार हो गया था...मेरी पहली Eटीवी की नौकरी...हैदराबाद से..हुसैन सागर झील...चारमीनार...लुंबिनि पार्क...कोटी...आईटी सैक्टर(हाइटेक सिटी)...बिरला टेंपल...सलारजंग म्यूज़ियम...सांघी टेंपल...वहां के लोगों से...वहां की हर चीज़ से...वहां का ऑफिस...ऑफिस के लोग...मैं कभी नहीं भूल सकती...कोई मेरे समाने हैदराबाद की बुराई नहीं गिना...सकता मुझे आज भी इतना लगाव है हैदराबाद से...आज भले ही हम सब अलग-अलग जगह पर अलग-अलग चैनलों में सैटल हो गए हों...लेकिन एक दूसरे के बारे में हमेशा जानने के इच्छुक होते हैं...आज कई लोग स्टार प्लास में हैं...कोई इंडिया टीवी में...कोई सहारा समय में काम कर रहा हैं...तो कोई NDTVमें कई लोगों ने ZEEन्यूज ज्वॉइन कर लिया...आज देश का कोई ऐसा मीडिया हाइस नहीं जहां ETVके लोग न हों...देश के बड़े-बड़े चैनल भी ETVमें काम कर चुके लोगों पर आंखे बंद कर भरोसा करते हैं...रामोजी फिल्म सिटी में काम करना अपने आप में अनोखा अनुभव है...वहां की तकनीक काफी उन्नत किस्म की है...वहां की लाइब्रेरी जैसे आधुनिक उपकरण तो अब तक किसी मीडिया हाउस में नहीं है...१२ क्षेत्रीय भाषाओं का प्रसारण कोई आम बात नहीं...वहां काम करने वालों को एक साथ देश की १२ संस्कृतियों को जानने का मौका मिलता है...शानदार ऑफिस...शानदार कैंटीन...शानदार लाइब्रेरी...औऱ शानदार नज़ारे...फिल्म सिटी में घुसते ही लगता है आप किसी राजा के सामराज्य में आ गए...अगर आपको मेरी बातों पर यकीन न हो तो एक बार रामोजी फिल्म सिटी घूमकर आईए...आपको खुद ब खुद भरोसा हो जाएगा...और अगर आप वहां तक नहीं जा सकते तो GOOGLE IMAGE में RAMOJI FILM CITY SEARCH कीजिए...आपको वहां के नजारों की खूबसूरत झलकियां देखने को मिल जाएंगी...ETV को मीडिया स्कूल भी कहा जाता है...अपना कोर्स खत्म कर आपने अगर शुरूआत वहां से की...तो देश के किसी मीडिया हाउस में आपको कोई परेशानी नहीं होगी...ETV अपने कर्मचारियों को मीडिया के हर पहलू से अवगत करा देता है...नोएडा फिल्म सिटी SECTOR 16 में जब आप अपने मीडिया हाउस से बाहर निकलेंगे तो आपको सभी चैनलों से कोई न कोई बंदा ETV का मिल ही जाएगा...ETV के लोगों को विभिन्न चैनलों में देखकर बड़ी खुशी होती है...और हैदराबाद की यादें एक बार फिर ताज़ा हो जाती हैं...ETV से करियर की शुरूआत को मीडिया जगत में काफी अच्छा माना जाता है...वहां की खूबसूरत वादियां...लुभावने नज़ारे...पर्यटकों को ही नहीं फिल्म इंडस्ट्री को भी आकर्षित करती आई हैं...तभी तो वहां के क्षेत्रीय फिल्मों के अलावा बॉलीवुड के फिल्मों की शूटिंग भी खूब होती है...वहां फिल्म सरकरा राज कि शूटिंग के दौरान फिल्म सिटी आए अमिताभ,ऐश-अभिषेक और फिल्म के अन्य कलाकारों ने यहां खूब इंज्वॉय किया...अमिताभ ने फिल्म की शूटिंग पूरी होने पर फिल्म सिटी के बारे में कहा...'वाकई यहां जो भी आएगा...अपनी पूरी फिल्म शूट होने के बाद ही जाएगा....इस फिल्म सिटी में रामोजी राव ने सारी सुविधाए मुहैया करा रखी हैं...'हैदराबाद में अपनी जिंदगी के हंसीन लम्हें बिताए हैं मैंने...पहली बार घर से दूर रहने का अनुभव...अपने घर से अकेले हैदराबाद तक आना-जाना...मैंने अपनी जिंदगी को खुलकर जिया है वहां...इंजवॉय किया है अपनी LIFE को...दोस्तों के साथ घूमने जाना...फिल्म देखना...अपनी पसंद की शॉपिंग करना...काफी मज़ेदार अनुभव रहा जिंदगी का...वहां मेरे एक सहभागी से मेरी अच्छी पटती थी...बिहार डेस्क के एंकर...मेरे घर के नज़दीक ही रहते थे ...आज वो जी यूपी में एंकर हैं...हमने काफी समय वहां साथ बिताया...कई फिल्में भी साथ में देखीं...वो मुझे अपने छोटे बच्चे की तरह ट्रीट करते थे...उन्हें चिकन बेहद पसंद था हफ्ते में दो-तीन दिन तो हमारा चीकन खाना निश्चित था...जिस दिन मैं उनके घर चिकन खाने नहीं जाती उस दिन उन्हें खाना खाने मैं मज़ा ही नहीं आता था...वो भी मुज़फ्फरपुर के थे और मेरे पत्रकारिता विभाग में मुझसे दो साल सीनियर भी...आज उनकी शादी हो चुकी है...हम आज भी एक दूसरे के बारे में जानने के इच्छुक रहते हैं...
EVT छोड़ने का अनुभव मेरा बेहद खराब रहा...डेढ़ साल पूरे हो चुके थे EVT में...मेरे कुछ दोस्तों ने दिल्ली में 40 से 60 हजार की सैलरी पर चैनल JOIN किया था...मेरा भी मन अच्छे पैकेज को मचलने लगा...मुझे याद है मैंने उस दिन ETV में EVENING SHIFT की थी...रात को डेढ़ बजे घर पहुंची थी...दूसरे दिन OFF था...सुबह हमें ZEE NEWS में INTERVIEW देने रायपुर जाना था और हमारी फ्लाइट सुबह साढ़े पांच बजे थी...तीन बजे रात को ही हमें एयरपोर्ट के लिए निकलना पड़ा...दिन में हमने INTERVIEW दिया और तीसरे दिन की फ्लाइट से फिर हैदराबाद वापस...किसी को हमारे INTERVIEW की कानों कान खबर न हो इसके लिए ये ज़रूरी था...क्योंकि अगर हमारे INTERVIEW की ख़बर वहां के मैनेजमेंट को चल गई तो हमारी शामत...तीसरे दिन फिर से EVENING SHIFT में अपने काम पर...दो दिन और दो रातें...बिना सोए हमने ऑफिस का काम किया...उफ कितना हैटिक शिड्यूल था वो...एक महीने बाद खबर मिली की मेरा सेलेक्सन हो गया...लगभग 300 लोगों ने EVT से INTERVIEW दिया था जिसमें से केवल 18 लोगों का selection हो पाया था...मेरे लिए ये बेहद नाजुक फैसला था...मुझे हैदराबाद छोड़ना पड़ा...लेकिन आज भी मेरे ज़ेहन में हैदराबाद की यादें ताज़ा हैं...

शुक्रवार, अगस्त 7

मीडिया...महिलाओं के लिए कितना सुरक्षित?

मीडिया में महिलाओं का बर्चस्व बढ़ता जा रहा है...आज महिलाएं भी मीडिया क्षेत्र में पुरूषों के साथ कदम से कदम मिला कर चल रहीं हैं...न केवल वेतन बल्कि...काम के तौर पर भी महिलाएं पीछे नहीं हैं...महिलाओं को भी पुरूषों के समान ही वेतन और भत्ता मिलता है... हालांकि लोगों की ऐसी धारनाएं होती हैं कि मीडिया में महिलाएं सुरक्षित नहीं...उन्हें दिन- दोपहर, सुबह शाम यहां तक की रात की शिफ्ट में भी काम करना पड़ता हैं...जहां तक सवाल है महिलाओं की सुरक्षा का...तो मीडिया की महिलाओं पर कोई बुरी नज़र डालने से पहले भी सौ बार सोचता है...क्योंकि इस क्षेत्र में वही महिलाएं टिक सकती हैं जो पूरी तरह बोल्ड हो...जी हां......बोल्ड का मतलब ऐसी महिलाएं जो जुझारू हो...तेज़ तर्रार हो...और बुरे वत्त में धैर्य और हिम्मत से काम लेना जानती हो...मीडिया हाउस में तो कोई ऐसी हिमाक़त ही नहीं कर सकता... कभी-कभी मीडिया हाउस से बाहर या रिपोर्टिंग के समय उसे मुश्किल की घड़ियों से गुज़रना पड़ सकता है...वहां लड़के उनके साथ छेड़खानी तो नहीं छीटाकशी कर सकते हैं...लेकिन वहां एक ड्राइवर और एक कैमरामैन हमेशा उनके साथ होते हैं...और कुछ नहीं तो पब्लिक तो होती ही है...लेकिन हां अगर एक महिला पत्रकार ख़ुद चाहे किसी के साथ रिश्ता बनाना तो भला उसे कौन रोक सकता है...

दिल्ली और मुंबई को तो मीडिया का हब माना जाता है... और इन शहरों में महिला पत्रकारों की संख्या सबसे ज्यादा है...वहीं हैदराबाद...रायपुर...भोपाल जैसे शहरों में भी महिला पत्रकारों की संख्या में इजाफ़ा देखने को मिल रहा है...क्षेत्रीय चैनलों में महिला पत्रकार बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रही हैं...देखा जाए तो महिला पत्रकार आज विदेशों में भी अपना परचम लहराने में कामयाब हो रही हैं...नेश्नल चैनल महिला पत्रकारों पर भरोसा कर उन्हें भी विदेशों में काम करने के अवसर प्रदान कर रहे हैं...इराक युद्ध के दौरान राखी बख्शी ने रिपोर्टिंग कर लोगों को चौका दिया तो वहीं श्वेता तिवारी क्रिकेट की ख़बर के कवरेज़ के लिए लंदन तक पहुंच गई...हिन्दुस्तान की संपादक मृणाल पांडे ने प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा में कई बार शामिल होकर देश का गौरव बढ़ाया है... मीडिया में कई महिला पत्रकार अपनी काबीलियत के दम पर राज कर रहीं हैं...शीतल राजपूत...रितू कुमार, नीलम शर्मा हो या अल्का सक्सेना...सभी मंजी हुई पत्रकारों ने पत्रकारिता की मिसाल पेश की है...एक बात और आपके टीवी स्क्रीन पर जो खूबसूरत चेहरे दिखाई देते हैं केवल उन्हें ही बड़ा पत्रकार नहीं कहा जाता...बल्कि जिन महिलाओं ने रिपोर्टिंग के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई वो भी इन महिला पत्रकारों से किसी मामले में कम नहीं होतीं...स्क्रीपट राइटर हो या कॉपी एडिटर वो भी इन चमकते हुए चेहरों के बराबर ही वेतन और सुविधाएं पातीं हैं...
एक क्षेत्र ऐसा भी है जहां महिलऔं को थोड़ी कम तरज़ीह मिल पाई है और वो है...क्राइम सेक्टर...इसमें आज भी पुरूषों का बोलबाला हैं...कभी कदार ही महिलाएं आपको क्राइम की रिपोर्ट सुनाती नज़र आएंगी...कुछ महिलाओं ने इस ओर भी कदम बढ़ाया...लेकिन शायद दर्शकों को ये बदलाब नहीं जमा...दर्शक भी महिलाओं को सॉफ्ट और ग्लैमर्स लुक में देखना पसंद करते हैं...देखा जाए तो महिलाएं रिप्रजेंटेशन के मामले में काफी सतर्क होती हैं...
कुल मिलाकर देखा जाए तो मीडिया सेक्टर महिलाओं के लिए सुरक्षित तो है ही साथ ही यह काफी आकर्षक क्षेत्र भी है...इस फील्ड में अपको इज्ज़त भी काफी मिलती है...और शोहरत भी...इस क्षेत्र में केवल आकर्षक चेहरा काम नहीं आता...बल्कि इसमें आपके तुरंत निर्णय लेने की क्षमता और सूझबूझ काम आता है.... शो पीस की तरह आपको कोई चैनल नहीं झेलता...बल्कि आपका काम बोलता है...रिपोर्टिंग के क्षेत्र में तो आप जितना सिंपल दिखती है आपका रिप्रजेंटेशन उतना ही ओथेंटिक होता है... निर्भर करता है कि आप उस ख़बर को कैसे मोड़ देतीं हैं...एक छोटी से छोटी ख़बर को भी आकर्षक तरीके से पेश कर पाती है या नहीं...मीडिया में कई ऐसी शख्सियत मौजूद हैं जिसे आगर आप देखेंगे तो आपको वो बिल्कुल सिंपल और आम लोगों की तरह ही नजर आए...लेकिन एक साधारन सी दिखने वाली पत्रकार भी कब आपकों गज़ब का कारनामा करते दिख कोई नहीं कह सकता...

गुरुवार, अगस्त 6

चुनौती से भरा करियर


पत्रकारिता...एक चुनौती भरा करियर...रोचक और मज़ेदार करियर....इसमें वही टिक सकता है जो इन चुनौतियों से जूझने की काबीलियत रखता हो...यहां कोई थ्योरी काम नहीं करती...कोई प्रेक्टिकल नहीं चलता...बस आप इसमें लंबी रेस का घोड़ा तभी बन सकते हैं...जब आप इन चुनौतियों से लड़ने का माद्दा रखते हों... वाकई पल-पल इसमें एक नई चुनौती से गुज़रना पड़ता हैं...आपकी एक ग़लती आपके हाउस पर प्रश्नचिन्ह लगा सकती है...बड़ी ही सतर्कता और जल्दी में आपको हर काम निपटाना होता है... हर आधे घंटे में ख़बरे बदल जाती हैं...और आपके सामने होता है एक नया विषय....रोचक और जानकारियों से भरा...देश दुनिया की पल-पल की जानकारी से दुनियां भर के लोगों को अवगत कराने का जिम्मा होता है आप पर...
आज से करीब दस साल पहले पत्रकारिता का वो बर्चस्व नहीं था...पत्रकार शब्द सुनते ही पहले हमारे जेहन में जो तस्वीर उभरती थी...वो थी... खादी का कुर्ता...लंबा सा झोला...और चप्पल पहने...आखों पर मोटा सा चश्मा लगाए...एक ऐसा शक्स जो थोड़ी अजीब सी मान्यता रखता हो...समाज को देखने का नज़रिया भी उसका अलग सा हो...पहले के लोग पत्रकारों को भी ज्यादा फुटेज नहीं देते थे...लेकिन अब समय बदल गया है...आज के पत्रकारों ने पत्रकार शब्द की छवि ही बदल दी है...पत्रकारिता में खबरिया चैनलों की भीड़ ने क्रांति ला दी है...लोगों को ख़बरों के प्रति जागृत कर दिया है...ब्रेकिंग न्यूज़...एक्लूसिल खबरें...और अपने इलाके की जानकारी लोगों को उत्सुक बनातीं हैं...पत्रकारिता क्षेत्र में पैसा भी कम नहीं आपके पास जितना ज्यादा अनुभव होता है आप की बोली उतनी ही ज्यादा लगती है...आप दूसरी प्रतिद्वंद्वी चैनल या अख़बार में ज्वाइन करते हैं तो आपको अच्छा जंप मिलेगा...आर्थिक मंदी में मीडिया सेक्टर भी थोड़ा प्रभावित तो हुआ है...लेकिन इसपर ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है...हर ६ महीने में एक नया चैनल लॉच होता है... आज अच्छे पत्रकार लाखों रुपए प्रति माह की तनख़्वाह पा रहे हैं...हालांकि देखा जाए तो इस मामले में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकार ज्यादा लक्की हैं...एक समान्य पत्रकार भी २० हजार से ६० हजार और अच्छा और नामी गिरामी पत्रकार १ लाख से १० लाख रुपए तो प्रति माह आसानी से हासिल कर सकता है... और बात जब नए चैनल में जाने की आती है तो वो अपनी प्राप्त तनख़्वाह से दोगुनी से तिगुनी पर अपनी बोली लगाता है...हर पत्रकार अवसर की तलाश में रहता है कि कब उसे एक अच्छा जंप मिले और वो नई जगह अपनी साख़ कायम करे...हालांकि इस मामले में बैनर भी काफी मायने रखता है...आगर आप अच्छे बैनर से जुड़े हैं तो आपके पांव १२...जी हां आपकी बोली लगाने से पहेल सामने वाले को सोचना ही पड़ता है...क्योंकि एक अच्छा बैनर आपको कम तनख़्वाह में तो रखेगा नहीं...अच्छे बैनर छोड़ने का मतलब है आप उसे मोटी रकम पर साइन कर रहे हैं...या नहीं...अगर नहीं तो भला वो क्यों अपना बैनर छोड़ कर आपके चैनल में आए...टीवी के इडियट बॉक्स ने सबको अपनी चपेट में ले रखा है...लोगों को खबरों के साथ-साथ मनोरंजन...खेल...व्यवसाय...हर तरह की जानकारी उपलब्ध कराता है...टीवी का रिमोट ऑन करते ही ये सारी जानकारी मिल जाए तो भला कौन इससे बच पाए...आजकल तो चौबीसो धंटे live खबरें दिखाई जाती हैं....और आप आ जाते है इस बुद्धू बॉक्स के मायाजाल में...खबरें मोबाइल पर खबरे आपके नैट पर...खबरें आपकी यात्रा में...हर जगह खबरें ही खबरें...आप इससे ख़ुद को अछूता नहीं रख सकते...
मीडिया फिल्ड में जो एक बार आ गया उसे इसके मायाजाल से निकले में भी काफी मुश्किलें आती हैं...हर समय आप चकाचौंध में जीने के आदि हो जाते हैं...प्रतिष्ठित लोगों से मलने का अनुभव उनके जीवन में ताक-झांक करने का अनुभव...मीडिया की नज़र से कोई बच नहीं सकता...इसलिए मीडिया पर्सन से दोस्ती करने से पहले भी लोग एक बार सोचते ज़रूर हैं...मीडिया में काम करने वाले दोस्ती तो निभा सकते हैं लेकिन अगर आपसे उन्हें कोई रोचक और धांसू ख़बर मिल रही है तो वो ख़ुद को इससे अलग नहीं कर सकते...इसमें भले ही आपका अहित क्यों न हो रहा हो...अगर वो इसे कवर नहीं करेगा तो दूसरे चैनल वाले इसका फायदा उठा सकते हैं...मीडिया जिम्मेदारी का काम भी बख़ूबी निभाता है...आपके ग़म में शरीक होता है...आपको मुसीबतों से भी बचाता है...इस क्षेत्र में करने के लिए काफी कुछ है...जिसका अंत कभी नहीं हो सकता...समय समय पर अभिनेता मीडिया की खूबियों की तारीफ करते नजर आए हैं...अमित जी ने अपने ब्लॉग में लिखा भी है कि उनकी भी हार्दिक इच्छा है संपादकीय बैठक में शामिल होने की...कैसे खबरों की तलाश की जाती है...कैसे इसे रोचक बनाया जाता है और कैसे इसे परोसा जाता है...अमित को ये सारी चीजे काफी चौकाती हैं...उनकी इच्छा है मीडिया हाउस में कुछ समय बिताने की...हमे भी इंतजार है कब अमित जी को इसका अवसर मिलता है औऱ वो मीडिया पर्सनैलिटी की दिनचर्या से रू-ब-रू हो पाते हैं