सोमवार, सितंबर 7

कविता की व्यथा...




मैं हूं कविता...कवियों की अनमोल कल्पना...लेकिन अब मुझे भला कौन पूछता है...आज के तड़कीले-भड़कीले संगीत के सामने मैं बेबस-लाचार हूं...रिमिक्स...इंडीपॉप...वेस्टर्न...गज़ल...फिल्मी संगीत...एल्बम...इन सबके आगे लोग मुझे भूल गए हैं...केजी, नर्सरी के बच्चों की ज़ुबान पर तो कभी-कभी मैं चढ़ भी जाती हूं...लेकिन उतनी ही जल्दी मैं भुला भी दी जाती हूं...कालिदास ,जयशंकर प्रसाद, हरिवंश राय बच्चन, महादेवी वर्मा जैसे कवियों ने मुझे जीवंत किया...लेकिन अब लगता है मुझे आगे बढ़ाने वाला शायद कोई नहीं...आज-कल के कवि अपनी कविता में केवल तुक बांध देते हैं...और बन जाती है कविता..लेकिन उसमें न तो रस का अता-पता होता है...और न ही अलंकारों का...अलंकार तो पूरी कविता में आप खोजते रह जाएंगे...मेरे रस बेमतलब साबित होते जा रहे हैं...औऱ अलंकारों की तो पूछिए ही मत...लोग संगीत सुनना ज्यादा पसंद करते हैं...भला करें भी क्यों ना...आजकल के संगीत में मधुर-धुन...वाद्य यंत्रों के आधुनिक उपकरणों का प्रयोग...लटके-झटकों वाले दृश्य...विदेशी परिवेश की छटा...महंगे सेट के नजारे...आपको भरे-पड़े मिलेंगे...यही आज की पसंद भी है...मेरा सहारा तो बस शब्दों का सटीक चयन हैं...आज की हाईटेक जिंदगी में लोगों के पास इतना वक्त कहां कि वो मुझे पढ़ने में वक्त जाया करें...मैं तो बस अपने शब्दों के मायाजाल में लोगों को कल्पनालोक की सैर करवाती हूं...पहले तो कहा भी जाता था 'जहां न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि'लेकिन अब तो कोई कल्पनालोक में डूबकर मोतियों जैसे शब्दों में मुझे पिरोता भी नहीं...शब्दों की कल्पना से कुछ कवि कभी-कदार मुझे उकेरने का प्रयास भी करें...तो पाठक और श्रोता मुझे बिना भाव के एक लय में पढ़ जाते हैं...फिर तो मेरे अंदर समेटे भाव उभरकर निकल ही नहीं पाते...मैं अपनी कविता में भले ही कितने भी मार्मिक शब्दों का जाल बुन दूं...लेकिन मेरे अंदर के भाव को कम ही लोग समझ पाते हैं...

1 टिप्पणी:

  1. बेनामीसितंबर 08, 2009

    'चमकती है सदियों में कहीं आंसुओं से जमीं,
    गज़ल के शेर कहां रोज-रोज होते हैं।'
    और
    'हमसे पूछो कि गजल मांगती है कितना लहू,
    लोग कहते हैं ये धंधा बड़े आराम का है।'
    इन दो शेरों में दो शायरों ने साफ कहा है शब्दों को साधना... और उन्हें सरस्वती बनाकर काले अक्षरों से कागज पर उतारना कितना मुश्किल है... कविता का ये दर्द वाजिब है...
    क्या सुनाएं इस जमाने में
    दर्द मिलता है दवाखाने में।
    मंच पर नाचती है बोतल
    और कविता शराबखाने में।
    -अनिल तिवारी, रायपुर

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