गुरुवार, अगस्त 27

घर में घमासान


इन दिनों भाजपा में आपसी घामासान खुलकर सामने आ रहा है...नेता...नित नए-नए खुलासे कर रहे हैं...पार्टी की अंदरूनी कलह से हर रोज़ एक नया मामला उभरकर सामने आ रहा हैं...जिससे न केवल देश की जनता बल्कि भाजपा के आलाकमान भी सक्ते में हैं...जिन्ना के जिन के बाद जसवंत सिंह को आनन-फानन में पार्टी से निकालना भाजपा नेतृत्व को भारी पड़ रहा है...पार्टी के भीतर बगावत की जो लहर उठी, उससे न सिर्फ पार्टी दो गुटों में बंटी दिख रही है...बल्कि इस फेरबदल से बड़े नेता भी चपेट में आ गए। जसवंत ने जिन्ना प्रकरण व कंधार कांड पर आडवाणी पर सवाल उठाए ही थे, कि अरुण शौरी संघ का झंडा उठाए समूचे भाजपा नेतृत्व को ही बदलने का नारा लगाने लगे। और तो और, राजग सरकार में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे व पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नजदीकी रहे ब्रजेश मिश्र भी मैदान में उतर आए। उन्होंने भी कंधार कांड को लेकर आडवाणी पर निशाना साधा। कुछ समय से शांत बैठ यशवंत सिन्हा ने भी मौका देख ब्रजेश की बात का समर्थन कर पार्टी की मुसीबत और बढ़ा दी।
उत्ताराखंड में मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के बाद नाराज चल रहे भुवन चंद्र खंडूड़ी ने दिल्ली पहुंच कर मोर्चा खोला...उन्होंने आडवाणी से मुलाकात कर अपने मामले में पुनर्विचार की मांग कर नया विवाद खड़ा कर दिया...राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की ओर से भी पार्टी की सिरदर्दी बढ़ा दी...
ऐसे में लगता है...भाजपा के नए घमासान की तोड़ फिलहाल संघ के पास भी नहीं है...हालांकि दिल्ली में डटे संघ प्रमुख मोहन भागवत से भाजपा के वरिष्ठ नेता डा.मुरली मनोहर जोशी मुलाकात कर पार्टी को एसे समय में टूटने से बचाने की मुहिम में जुटे हैं...जोशी ने अनुशासन के मामले में कड़ी कार्रवाई करने की बात तो कही है...भाजपा के तमाम नेताओं की नजर मोहन भागवत पर टिकी है...पार्टी को संकट से निकालने के लिए शायद कोई नायाब तरकीब हाथ लगे...इस घमासान के बीच पार्टी की कश्ती डूबती नजर आ रही है...अब देखना है कि इस मुसीबत से भाजपा खुद को कैसे निकाल पाती है...और कौन-कौन से नेता भाजपा के शासनकाल के नए-नए खुलासे लेकर आते हैं...इस बार भी भाजपा के चुनावी पराजय के बाद पार्टी के नेता पार्टी का साथ छोड़ कर भागने लगे हैं...और जाते –जाते पार्टी की कटु आलोचना और दोषारोपण भी करके जा रहे हैं...भाजपा भला कैसे और किन किन नेताओं पर कार्रवाई करे...पार्टी का डूबता जहाज छोड़ नेता चूहों की तरह पार्टी का साथ छोड़- छोड़ कर भागने लगे हैं, और पार्टी के खिलाफ किताबें लिखने लगे हैं...वैसे भी जहाज का अस्तित्व चूहों से नहीं होता, चूहों का अस्तित्व जहाज से होता है...मलाई का मोह बड़ा भारी होती है, आज नहीं तो कल फिर ये नेता “भाजपा शरणं गच्छामि” कहते लौट आए तो कोई बड़ी बात नहीं...

1 टिप्पणी:

  1. आपकी बात से एकदम सहमत!
    मोहन भागवत जी सेउम्मीद थी कि वे जरूर कुछ करेंगे, लेकिन आज वे भी पल्ला झाड़ चल दिये कि हमारा काम सिर्फ सलाह देना है।
    कोई उम्मीद नजर नहीं आती कि भाजपा फिर से उठ खड़ी होगी। जहाज को खुद अपने ही चूहों ने कुतर-कुतर कर डुबोया है।
    धन्यवाद।
    ॥दस्तक॥|
    गीतों की महफिल|
    तकनीकी दस्तक

    उत्तर देंहटाएं