शुक्रवार, अक्तूबर 29

ऐ सूरज
तू इतना बेरहम क्यों हो गया है
अब कहीं ज्यादा
तो कहीं कम चमकने लगा है?(ध्रुव)

क्या तूने अमीरों-गरीबों में
भेद करना सीख लिया है?

अमीर तो फिर भी
अपनी हिफाजत कर लेते हैं
लेकिन हर रोज
पिसते बेचारे गरीब हैं

अमीर AC/ कूलर में रहकर
चुराते हैं तुझसे नजर

 
बेचारे गरीब नहीं जानते
तेरे जला देने वाले आक्रामक तेज को


दो जून की रोटी की खातिर
करते हैं तुझसे सामना
और बहाते हैं हर रोज
तेरे आगे खून पसीना


अब तू ही बता क्या मिलता है
तुझे उनकी मेहन की फसलों को जलाकर
क्या इससे होती है तेरी ज्वाला शांत
औऱ मिल जाता है तुझे सुकून


इससे भी तेरा मन नहीं भरता तो
तू भेज देता है अपनी सौतन को
जो अपने साथ बहा ले जाती हैं
किसानों की साल भर की मेहनत


चल...तू ही बता कितने अमीरों के घर
जलती है तेरे नाम की ज्योत?

कितने अमीर देख पाते हैं
तेरी पहली औऱ आखरी किरण के मिलन को?

क्यों करता है तू अपनों के साथ अन्याय
क्यों लेता है तू हर बार अपनों की ही अग्निपरीक्षा?

गुरुवार, अक्तूबर 28

जीत होगी जरूर

हार...अंतिम पड़ाव नहीं
जीत का है वो पहला रास्ता


       जीत... होगी एक दिन जरूर
       क्योंकि है हमें पूरा हौसला

हार-जीत का खेल तो लगा रहेगा
जीतेगा वही...जो निरंतर चलता रहेगा...

       बाधाएं आएंगी पग-पग पर अनेक
       डटकर करना है उसका सामना

थक जाओ अगर...
तो कुछ पल के लिए ठहरना

     जिगर को मजबूती से थामना और
     हिम्मत से करना मुश्किलों का सामना

खुल जाएंगे खुद-ब-खुद सारे द्वार
और हो जाएंगे हम भवसागर के पार

शुक्रवार, अक्तूबर 15

याद तुम्हारी आती है

अपनों से दूर जब भी मैं जाती हूं
याद तुम्हारी आती है...
जब कहीं बजते हैं ढोल नगाड़े
याद तुम्हारी आती है...


याद आती है बचपन की वो गलियां...
याद आती है वहां की सोंधी मिट्टी की खुशबू
जहां खेला करते थे हम नंगे पांव
याद आती है मां की वो प्यार भरी फटकार
जिसे सुनने के लिए अब कान तरसते हैं


खासकर जब आता है कोई त्योहार
याद तुम्हारी आती है....
याद आता है वो लम्हा
जब मां लेती थीं दशहरा के पहले दिन
हमारी बलइयां...
झाड़-फूंक कर न जाने क्या पहनाती थी गले में
मां से दूर अब कौन ले ऐसी बलइयां


याद आता है
सबके साथ मौज-मस्ती का वो बीता पल
पर अब वक्त कितना बदल गया है
अपने भी हैं कितने दूर-दूर


कभी-कभी जी करता है
उड़कर चली जाऊं
अपनों के पास
इस इंतजार में जीता है मन
कि आएगा एक दिन वो...खास


त्योहार आता है और
अपनी दस्तक देकर जाने कब चला जाता है
मन मचलता है अपनों से मिलने को
लेकिन ये कैसी मजबूरी है
बैठी हूं अपनों से इतनी दूर
जाने किस आस में!


त्योहारों में अपनों के संग जीने की  कीमत
क्या मैं अब अपनी नौकरी के चंद पैसों में तलाश रही हूं?

बुधवार, अक्तूबर 6

मां के नौ रूप

नवरात्र वो पर्व है, जिसमें देवी अपनी शक्ति का संचार अपने भक्तों में करती हैं। ये पर्व प्रकृति में स्थित शक्ति को समझने और उसकी आराधना का है। प्रकृति में विभिन्न रूपों में मां शक्ति स्थित है। उसी की आराधना हम नवरात्र में करते हैं-

नौ दिनों तक चलने वाले नवरात्र में मां पार्वती, मां लक्ष्मी और मां सरस्वती के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है...पहले तीन दिन पार्वती के स्वरूप, फिर तीन दिन मां लक्ष्मी के स्वरूप और अंतिम तीन दिनों में मां सरस्वती के स्वरूप की पूजा की जाती है....

आदिशक्ति मां दुर्गा का पहला स्वरूप है शैलपुत्री-
पर्वतराज हिमालय के यहां जन्म होने से इन्हें शैलपुत्री कहा जाता है...नवरात्रि की पहली तिथि को शैलपुत्री की पूजा की जाती है...माना जाता है कि इनके पूजन से भक्त को जीवनभर किसी चीज की कमी नहीं रहती....



भक्तों और साधकों को अनंत कोटि फल प्रदान करनेवाली मां का दूसरा रूप है ब्रह्मचारिणी जिसकी उपासना करने से तप,त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम की भावना जागृत होती है...


मां का तीसरा स्वरूप चंद्रघंटा है...इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है...इसी कारण उन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है...इनकी पूजा अर्चना करने से सिद्धियां प्राप्त होती हैं...और सांसारिक कष्टों से मुक्ति मिलती है....


नवरात्रि का चौथा दिन मां कुष्मुंडा का होता है...माना जाता है कि उनके उदर से ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई है..इसलिए इन्हें कुष्मुंडा कहा जाता है...इनकी भक्ति से आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है...


पांचवां दिन स्कंदमाता की उपासना का होता है कुमार कार्तिकेय की माता होने के कारण इन्हें स्कंदमाता कहा जाता है...जिनके आशीर्वाद से मोक्ष का रास्ता सुलभ हो जाता है...


महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न आदिशक्ति ने उनके यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया और इस लिए छठवें दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है...जो हमें रोग, शोक संताप, भय से मुक्ति दिलाती हैं...





सातवां दिन होता है मां कालरात्री का जो काल का नाश करती है..इनकी पूजा अर्चना करने से सिद्धियों की प्राप्ति होती है...



मां का आठवां रूप है महागौरी का इनका वर्ण गौर होने से ये महागौरी कहलाती हैं जिनकी साधना असंभव कार्य को भी संभव बना देती है...


मां का नौवां रूप है मां सिद्धिदात्री..सभी सिद्धियों की दाता होने से मां सिद्धिदात्री कहलाती हैं..और नवरात्री के अंतिम दिन मां के इसी रूप की पूजा होती है...


ये है मां के नौ रूप...जिनकी उपासना से शक्ति और समृद्धि मिलती है...और मां की शरण में आनेवाला भक्त कभी खाली हाथ नहीं लौटता....

शुक्रवार, सितंबर 24

बदलना सीख लिया है...

बे-रंग नहीं ये ज़िंदगी...
मैंने रंग बदलना सीख लिया है

कंटीले रास्तों पर चलते-चलते
गिरकर संभलना सीख लिया है

ज़ख़्म नासूर न बन जाए हमेशा के लिए
तभी तो मरहम को मलना सीख लिया है

ग़म से भरी हैं पलकें तो क्या
नमी ने पिघलना सीख लिया है

तुम मुझे ठुकराओ इससे पहले
मैंने नीयत को पढ़ना सीख लिया है

टूटती नहीं अब कांच के टुकड़ों की तरह
क्योंकि मैंने हिम्मत कर...चलना सीख लिया है

देख ली है मैंने भी दुनिया बहुत
अब इंसान परखना सीख लिया है

शुक्रवार, सितंबर 10

मीडिया है कमाल

मीडिया...यारों चीज बड़ी है कमाल
यहां बिछा है हर तरफ ...
खबरों का ही मायाजाल...।।

इसके दर पे
संपादक रहते हैं हमेशा बेहाल
उन्हें रहता है अक्सर खबरों का ही मलाल
सुबह-शाम, उठते-बैठते हर वक्त
उन्हें आते हैं खबरों के सपने।।

जितनी भी खबरें दो उनके आगे परस
एक बार में जाते हैं वो गटक
थोड़ी देर में खबरें हो जाती है...हजम
और फिर करते हैं...खबरों का महाजाप।।

इनपुट डेस्क है खबरों का सूत्रधार
पत्रकार करते हैं खबरों की पड़ताल
ऑउटपुट डेस्क करते हैं खबरों का पोस्टमार्टम
ऐंकर को रहता है पोस्टमर्टम रिपोर्ट का इंतजार।।

पीसीआर में लगती है रिपोर्ट पर मुहर
और खबरें हो जाती है कुछ पल में ऑन एयर
हफ्ते भर में आ जाती है टीआरपी रिपोर्ट
जिसके बाद...एक बार फिर लगती है
पूरी टीम की अच्छी-भली क्लास।।

पर दोस्तों...
हर मीडिया हाउस की है ऐसी ही सरकार।।

नोट: इस कविता के सभी पात्र काल्पनिक हैं...इसका किसी व्यक्ति विशेष से कोई सरोकार नहीं...ये मात्र भावों की अभिव्यक्ति है..अतः इसका गलत अर्थ न लगाए(एक व्यंग)

सोमवार, सितंबर 6

क्या नाम दूं?

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इस जिंदगी को...
मैं क्या नाम दूं...?

कभी धूप कहूं कभी छांव कहूं
कभी सैलाबों का नाम मैं दूं
कभी जीत कहूं, कभी हार कहूं
कभी कुदरत का मैं प्यार कहूं

कभी शोर कहूं...कभी मौन कहूं
कभी खामोशी का जाम कहूं....

कभी गम की शाम कहूं
तो कभी इठलाती मुस्कान कहूं

कभी खुशियों का पैगाम कहूं
या जीवन का संग्राम कहूं!

गुरुवार, सितंबर 2

शब्दों की उधेड़बुन



शब्दों का जाल भी कभी कभी हमें कैसे जकड़ लेता है...इसकी बानगी देखने को मिली एक दिन मेरे ऑफिस में...दरअसल मैं एक खबर बनाने बैठी और मुझे एक शब्द इस्तेमाल करना था...मैं ''कश्मकश'' शब्द का प्रयोग करना चाहती थी... लेकिन मैंने इस शब्द का इस्तेमाल काफी दिनों से नहीं किया था इसलिए थोड़ी सी दुविधा में पड़ गई...मुझे थोड़ा कन्फ्यूजन था कश्मकश शब्द सही कैसे लिखा जाता है... असल में मैं कशमकश के ''श'' पे अटक गई मुझे लग रहा था कि पहला ''श'' पूरा होता है या आधा...हालांकि ये जो शब्द आप अभी लिखा देख रहे हैं... इसने पूरे ऑफिस को थोड़ी देर के लिए परेशान कर दिया...कोई हमें बता रहा था ''कशमकश''  सही है कोई कह रहा था ''कसमकश'' सही है तो कुछ लोग कह रहे थे ''कसमकस'' सही है... तो कुछ ने ''कश्मकश'' पर मुहर लगाई..एक शब्द के इतने सारे रूप देखकर मेरी उलझन और बढ़ गई...


        अब कुछ लोग नेट पर शब्द छानने लगे तो कुछ ने डिक्शनरी पलटनी शुरू कर दी...किसी ने अपनी सेखी
बघारते हुए कहा मैं तो 16 आने सही कह रहा हूं...यही सही है....देख लो...हिन्दी में जिसकी पकड़ अच्छी है मैं उनके पास भी गई...तो वो बेचारे भी थोड़ा सा कन्फ्यूजिया गए...डिक्शनरी में कश-मकश लिखा मिला तो इंटरनेट  लोगों को और उलझन में डालने वाला निकला...गूगल में तो ''कश्मकश''... ''कसमकश'' ...''कशमकश'' तीनों सही निकले...हालांकि ''कसमकस'' और ''कश्मकस'' को गूगल ने गलत साबित किया....और शब्दकोश ने कश्मकश को सही करार दिया....लेकिन जरा सोचिए एक शब्द हमें इतनी परेशानी में डाल सकता है कभी आपने सोचा होगा...नहीं ना...

अब तो लोग अपनी सुविधाअनुसार शब्दों का इस्तेमाल करने लगे हैं...जैसे कुछ लोग 'रोशन' लिखते हैं तो कुछ 'रौशन'....मात्राओं में कई बार हेर फेर देखने को मिलती है....कही आप 'काबिलियत' देखेंगे तो कहीं 'काबीलियत'
लेकिन सहीं क्या है इससे लोग और दिग्भ्रमित होते हैं...एक्सर जब हम दुविधा में होते है तो डिक्शनरी का सहारा लेते हैं..लेकिन जहां किसी शब्द की शुरूआत आधे शब्द से होती है वहां डिक्शनरी में भी परेशानी हाथ लगती है....जैसे एक शब्द है ' ब्योरा'...कुछ लोग इसे 'ब्यौरा' भी लिखते हैं लेकिन डिक्शनरी में इस शब्द की तलाश जरा करके देखिए...सच्चाई आपको साफ नजर आएगी...मेरे एक सहयोगी का कहना है कि ''मात्राओं में भेदभाव मैं नहीं कर सकता...किसमें मात्रा छोटी होती है किसमें बड़ी मुझे फर्क करना नहीं आता'' लेकिन क्या आप जानते हैं ....एक शब्द में एक छोटी सी मात्रा के गलत इस्तेमाल से शब्द अर्थ से अनर्थ सिद्ध हो सकता है...

अब जरा सोचिए शब्दों के जानकार कितने कम होते जा रहे हैं...जो ऐसा ही क्यों लिखा जाता है इससे आपको संतुष्ट कर सकें...कम ही लोग है जो शब्दों के सही इस्तेमाल को प्रमाणित कर पाएं...वाकई हिन्दी में भी कुछ शब्द ऐसे हैं जो आपको सोचने पर मजबूर कर देंगे...कुछ लोग हिन्दी का आसान भाषा समझते हैं लेकिन शायद उन्हें इसकी गहराई का अंदाजा नहीं है....और हिन्दी लिखने या पढ़नेवालों को वो तुच्छ समझते हैं लेकिन मेरा मानना है...
''हिन्दी एक बिंदी है भारत के भाल पर''


मेरा मंगेतर इन दिनों मैक्सिको गया हुआ है और उसे स्पेनिश बिल्कुल नहीं आती बेचारा एक दिन चिकन खाने निकला ...अब वहां उसे समझ नहीं आ रहा था...कि वो सामने वाले को कैसे समझाए कि उसे चिकन खानी है...वहां लोग अंग्रेजी समझ नहीं रहे थे....और उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसे चिकन परोसा गया है या किसी और का गोश्त...बेचारे को घंटों मशक्कत के बाद पता चला की उसे चिकन ही परोसा गया है...उसे अपने ऑफिशियल वर्क के लिए अलग अलग देशों का सफर करना पड़ता है...अब बेचारा कहां कहां की भाषा सीखे...



शनिवार, अगस्त 28

मैं पंछी...गगन की

मैं पंछी उन्मुक्त गगन की
मत बांधो मुझे डोर में
सारे पंख टूट जाएंगे
पिंजड़े की उस छोड़ में...

   दो मुझको रिश्तों का बंधन
   पर उसको यूं मत कसना


हंसकर उसे निभाना होगा
कसकर उसे पिरो देना...


     गांठ छुड़ाना मुश्किल होगा...
     अरमान हमारी मत खोना


मैं पंछी उन्मुक्त गगन की
बांधो मुझको डोर में

रिश्तों की डोर मुलायम होगी
जी लूंगी उस कोर में

शुक्रवार, अगस्त 27

पहचान छीन लेता है...

कोई हमसे हमारी पहचान छीन लेता है
कोई पल भर में सारे एहसान छीन लेता है
हंसते हैं कम कुछ पल के लिए अगर
तो कोई पल भर में सारी मुस्कान छीन लेता है


रेत पर हम बड़े अरमानों से बनाते हैं घरौंदा
लेकिन एक तूफान हमारे सारे अरमान छीन लेता है
हमारी सदियों की मेहनत को कोई...
बस यूं ही... हंस कर कोई सरेआम छीन लेता है

गुरुवार, अगस्त 19

रंग बदले है दुनिया!


 अपनी जिंदगी में बिताए लम्हों में शादय सिनेमाहॉल से जुड़ी आप सबकी की भी कुछ न कुछ खट्टी-मीठी यादें होंगी...
सिनेमाहॉल जाने पर किसी को डांट खानी पड़ी हो या चोरी छिपे जाने पर किसी परिचित ने देख लिया हो... एक बार मैंने और मेरे भाई ने भी महज टीवी देखने किसी दूसरे के घर जाने पर पिता की डांट खाई थी...

वहीं एक बार तो ऐसा हुआ की हमारी कक्षा के कुछ लड़के स्कूल से बंक मारकर सिनेमाहॉल पहुंचे पिक्चर देखते वक्त वो आगे की सीट पर बैठे थे और उनकी
सीट से एक लाइन पीछे हमारे स्कूल की ही दो मैडम फिल्म देखने पहुंची थी...लड़के फिल्म के खुछ हॉट सीन आने पर छीटाकशी भी कर रहे थे...जब इंटरवल आया और हॉल की लाइट जली तो लड़कों ने पीछे पलटकर देखा....अपने पीछे स्कूल की टीचर को पाकर तो जैसे उनके पैरों तले जमीन खिसक गई हो...उनमें से एक तो किसी टीचर का  बेटा भी था....फिर क्या था उसकी तो घर जाने पर धुनाई पक्की....बेचारे इंटरवल के बाद सज्जन बच्चों की तरह चुपचाप बैठे रहे और फिल्म खत्म होते ही खिसक लिए....

  पहले अक्सर परिक्षार्थी  छुप-छुप कर सिनेमा हॉल जाया करते थे...पहले सिनेमाहॉल जाना कितना मुश्किल हुआ करता था ना....लेकिन अब देख लीजिए लोगों को बस नई और अच्छी फिल्मों के आने का इंतजार रहता है...सिनेमाघरों में भीड़ टूट पड़ती है...हां कुछ फिल्मों को दर्शकों का टोटा रहता है...लेकिन दर्शक हमेशा अच्छी फिल्मों की ताक में रहते हैं... अब धड़ल्ले से हर वर्ग के लोग आपको सिनेमाघरों में नजर आएंगे...छुट्टी का दिन हो तो.... या आप किसी दिन मॉर्निग शो  देखने जाइए आपको वहां स्कूली बच्चों और कॉलेज के स्टूडेंटों की बड़ी तादात  दिख जाएगी...ऐसा भी नहीं है कि इसमें सिर्फ लड़के ही नजर आए... इसमें लड़कियों उतनी ही तादात में शामिल होती हैं...वैसे लड़कियां भी अब फिल्में देखने के मामले में पीछे नहीं हैं....
दुनिया के किसी भी कोने में आपको ये नजारा आसानी से दिख जाएगा..अब खासकर कपल्स भी फिल्में देखने खूब आते हैं...

अब कुछ फिल्में भी ऐसी बनने लगी है जिन्हें स्कूल से बच्चों को दिखाने के लिए ले जाया जाता है...जैसे फिल्म तारे जमी पर को ही ले लीजिए...मुझे याद है जब फिल्म टाइटेनिक आई थी...उस वक्त तो नहीं लेकिन कुछ साल बाद जब में कक्षा 11 वीं में थी तो हमारे स्कूल में VCR के जरिए ये फिल्म दिखाई गई थी क्योकि इसकी स्टोरी हमारी 11 वीं की अंग्रेजी के पाठ्यक्रम में थी... अब छुट्टियों के दिन अक्सर आपको माता पिता के साथ बच्चे भी सिनेमाघरों में नजर आएंगे...माफ कीजिएगा अब सिनेमाहॉल का नहीं अब तो मॉल और मल्टीप्लेक्स का जमाना है...तो मॉल और मल्टीप्लेक्स में हर वर्ग के लोग आपको नजर आएंगे...पहले बच्चों को सिनेमाहॉल जाने की परिवार की ओर से बड़ी मुश्किल से आज्ञा मिलती थी...लेकिन अब बच्चों को भी शौकिया तौर पर लोग ले जाते हैं...आखिर उनकी इच्छाओं को क्यो मारा जाए...

अब फिल्मों की बात की जाए और ऑफिस में काम करने वालों को इससे दूर रखा जाए भला ये कैसे हो सकता है...ऑफिस से मेरा मतलब है काम करने वाले  कर्मचारी....उनके लिए हफ्तेभर में एक  छुट्टी का दिन ही तो  मिलता है खुद पर समय खर्च करने के लिए...ऐसे में वो बीच बीच में फिल्में देख कर अपने दिल को थोड़ा तो सुकून दे ही सकते हैं....इनमें सबसे ज्यादा फिल्मों के शौकीन होते हैं I.T. सैक्टर में काम करने वाले...उनके लिए दो दिन की छुट्टी का मतलब होता है फुल फन...चार यार दोस्तों का साथ मिला और निकल लिए फिल्म देखने...किसी को फिल्म की हिरोइन पसंद आ गई तो कोई फिल्म के गानों पर ही कुर्बान हो गया...

अब फिल्म हॉल जाने को लेकर लोगों का नजरिए थोड़ा बदला है....और ये है आज की रंग रंगीली हमारी दुनिया

बुधवार, अगस्त 18

ब्रेकिंग न्यूज...''मिल गया नत्था''

नत्था हमारे साथ

कहते हैं मीडिया की नजरों से कोई नहीं बच पाया है...फिर भला नत्था कैसे बच सकता है? 
फिल्म पीपली लाइव में भले ही नत्था मीडिया की नजरों से बच निकला हो....
लेकिन रियल लाइफ में नत्था मीडिया की सुर्खियों में आ ही गया...

दरअसल नत्था यानी ओंकार दास मानिकपुरी भिलाई के पास स्थित जामुल का रहने वाला है... वहीं बुधिया की भूमिका निभाने वाले रघुवीर यादव मध्य प्रदेश के जबलपुर से ताल्लुक रखते हैं। फिल्म में देहाती अम्मा का प्रभावी और मजेदार किरदार कर रहीं फर्रुख जफर लखनऊ की हैं तो धनिय
बनी शालिनी वत्स पटना से हैं।
फिल्म की रिलीज के बाद पहली बार नत्था अपने गृह राज्य पहुंचा...और प्रदेशवासियों ने उसे अपनी पल्कों पर बिठा लिया....एक आम इंसान की जिंदगी में फर्श से अर्श तक का फासला यहां साफ नजर आया...
आमिर की फिल्म में ब्रेक मिलना...और फिल्म में इतने सारे किरदारों के बीच अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले नत्था से प्रदेश ने खुद को गौरवान्वित महसूस किया....इस फिल्म में मंजे हुए कलाकार नसरूद्दीन शाह और रघुवीर यादव की मौजूदगी के बावजूद ओंकारदास ने अपनी अलग पहचान बनाई...ऐसा लगता है जैसे फिल्म बस नत्था के लिए ही बनाई गई हो....हालांकि इस फिल्म में नत्था के बेटे ने भी अभिनय किया है लेकिन नत्था का किरदार सभी पात्रों का केन्द्र बिन्दू बन गया...

फिल्म में किसानों की आत्महत्या पर कम मीडिया पर ज्यादा फोकस किया गया है...सरकार की कम और मीडिया की ज्यादा खिंचाई की कई है......मीडिया में कार्यरत होने के बावजूद मैं कहूंगी इस फिल्म में सरकार और मीडिया को आईना दिखाने का काम किया है...फिल्म में मीडिया पर फिल्माए गए दृश्यों को देखते वक्त मुझे ऐसा लगा जैसे समचमुच मैं अपनी दुनिया में पहुंच गई हूं...वैसे ही लोग... वैसा ही माहौल और खबरों को लेकर वैसी ही मारामारी....स्टूडिया का सीन हो या रिपोर्टिंग  स्पॉट सभी स्वाभाविक लगे....खबरों के चयन का तरीका हो या बॉस की प्रतिक्रिया...सभी मेरी जिंदगी के काफी करीब नजर आए...एक पल तो ऐसा लगा मीडिया चैनल के किसी ऑफिस में आकर फिल्म की शूटिंग कर ली गई हो...वैसे भी फिल्में समाज का आईना होती हैं और आईना कभी झूठ नहीं बोलता...कम बजट की इस फिल्म ने साबित कर दिया है कि लोगों का टेस्ट कैसा है...                       

शनिवार, जुलाई 3

बोलो ऑक्टोपस बाबा की...

मुझे लगता था सिर्फ हमारे देश भारत में ही अंधविश्वास से लोग जकड़े हुए हैं.... लेकिन नहीं अब लगता है....मैं गलत थी...जानकर खुशी हुई कि दुनिया में अंधविश्वासियों की कमी नहीं हैं....तभी तो फुटबॉल विश्व कप के साए में भी अंधविश्वास की छाया मंडराती नजर आती है....फुटबॉल का फीवर इस कदर छाया है कि हम ऊल फिजूल की बातों को भी तबज्जो देने से नहीं चूकते....ऐसे में हम बेजुबानों को तरह-तरह  के आडंवरों से जोड़ने से बाज नहीं आ रहे....अब तो बोजुबानों ने  खेल की दिशा और दशा निर्धारित करनी शुरू कर दी है....हमारे ऑक्टोपस महाराज को ही ले लीजिए....ऑक्टोपस 'पॉल' ने क्या भविष्यवाणी करनी शुरू की भविष्यवाणी कर्ताओं की तो जमात ही जुटने लगी...एक-एक कर कई चेहरे सामने आने लगे...इतने दिनों से ये कहां दुबक कर बैठे थे...इनकी कीमती भविष्यवाणियों की तो दुनिया को दरकार थी..

                                  पॉल के बाद सिंगापुर के तोते ' मणी' की भविष्यवाणी ने सबको चौंका दिया....फिर तो भविष्यवाणी कर्ताओं की कतार सी लग गई...भारत के किसी भी प्रदेश में तोते और बैलों द्वारा भविष्यवाणियां करना सामान्य बात है। गली-गली में लोग पिंजरे में तोते लेकर घूमते हैं जो भविष्यवाणियां करते हैं। अब तक तो लोग उनके आसपास भटकते तक नहीं थे...लेकिन इस वाक्ये ने लोगों में जागृति पैदा कर दी है....अब तोते के जरिए भविष्य पढ़नेवालों की चांदी हो रही है...सब अपने अपने तोते को ज्ञानी बताने  में जुटे हैं...नहले पर दहला तो तब हो गया जब ऑस्ट्रेलिया में 'हैरी' नाम के एक मगरमच्छ ने भी फीफा विश्व कप-2010 भविष्यवाणी कर दी....वहीं नीदरलैंड के एक जू में तो तीन-तीन जानवरों ने पॉल को चुनौती दे डाली....यहां एक लंगूर , एक ऊंट और एक जिराफ ने पॉल को कड़ी टक्कर दे डाली....खैर अब विश्वकप का ऊंट किस करबट बैठता है ये तो देखने वाली बात होगी...लेकिन कब तक इनकी दुकानदारी में रौनक रहेगी....भविष्यवाणियों का ये दौर कब तक चलेगा ये देखना दिलचस्प होगा....

           हालांकि इन दिनों मीडिया में ये खबरें खूब तैर रही हैं.... चैनलवालों को नया मसाला मिल गया है....भविष्यवाणी कर ऑक्टोपस 'पॉल' ने तो रातोंरात खूब शोहरत  बटोरी और मीडिया चैनल ने भी इस मसालेदार खबर को खूब भुनाया....किसी ने स्टूडियो में ज्येतिष्यों को न्योता दे दिया तो किसी ने घंटो इस खबर पर वैज्ञानिकों से चर्चा कर डाली..एक दिन दो दिन नहीं इनकी नौटंकी विश्व कप के समापन तक जारी रहने की उम्मीद बरकरार है....सचमुच कई बार मीडिया की ये भूमिका एक दर्शक होने के नाते हास्यास्पद भी लगती है....खबरें दिखाने में कोई हर्ज नहीं है...लेकिन इन खबरों को तबज्जो से दिखाना थोड़ा अटपटा जरूर लगता है....

             वैज्ञानिक तरीके से ये कितना सच है ये तो गहन अध्ययन का विषय बन गया है....लेकिन समय-समय पर जानवरों की ऐसी भविष्यवाणी की खबरों से दर्शकों में भ्रम पैदा होना लाजमी है....खैर विश्वकप के बाद तो ये स्पष्ट हो ही जाएगा कि कौन कितने पानी में है...

शुक्रवार, जून 25

फैशन की गर्दिश

मधुर भंडारकर की एक फिल्म आई थी...फैशन...शायद आपको इसकी कहानी याद होगी....इस फिल्म में फैशन जगत से संबंधित खामियों को बखूबी दर्शाया किया गया है....फिल्म में एक मॉडल के करियर की बुलंदियों से लेकर उसके जमीन पर आ गिरने तक की कहानी दिखाई गई है...एक सफल मॉडल के त्रासदी की कहानी...जिसने सबको झकझोर कर रख दिया....
वास्तव में फैशन जगत जितना चकाचौध भरा दिखता है उतना है नहीं...यहां दिखता कुछ और है और वास्तिवकता कुछ और होती है...चेहरे पर सुर्ख मुस्कान लिए मॉडल रैंप पर अदाओं का जलवा तो बिखेरती है...उन्हें देखकर आप कतई अंदाजा नहीं लगा सकते कि उनकी जिंदगी में भी कोई परेशानी होगी..लेकिन ये सच है...उनकी जिंदगी में भी उतार चढ़ाव आते हैं...उन्हें भी कई बार परेशानियों से गुजरना पड़ता है...यहां कुछ मॉडल सफलता की नई इबारत लिखती हैं तो कुछ गुमनामी के अंधेरे में खो जाती हैं...


ताजा मामला है भारत की मशहूर मॉडल विवेका बाबाजी का...चर्चित मॉडल विवेका बाबाजी ने मुंबई के पॉश इलाके बांद्रा में खुदकुशी कर ली। विवेका की लाश उनके घर में रस्सी से लटकी मिली। 37 साल की विवेका बाबाजी मॉरीशस की रहनेवाली थी और मुंबई के बांद्रा इलाके में पिछले 10 साल से रह रही थी।  लाश के पास एक डायरी, एक लैपटॉप और नींद की गोलियां मिली....वहीं विवेका के किचन में गैस का रिसाव हो रहा था...शुरुआती जांच में पुलिस को ये खुदकुशी का मामला लगा। विवेका की मौत की जांच के लिए तीन टीमें बनाई गई है। दो टीम मुंबई पुलिस की है जबकि क्राइम ब्रांच की भी एक टीम मामले की जांच में जुटी है। खैर ये तो जांच के बाद ही पता चलेगा कि ये मामला खुदकुशी का है या फिर हत्या का....

लेकिन कुछ साल पहले आपको याद होगा एक सुपर मॉडल सड़क के किनारे नशे की हालत में मिली थी...उसे उसकी नशे की आदतों ने सड़क पर पहुंचा दिया....
 इसके कुछ साल बाद मशहूर मॉडल और एमटीवी वीजे नफीसा जोसेफ की आत्महत्या की खबर आई...उन्होनें गौतम खांडुजा के साथ विवाह किया था...मृत्यु से पहले वे काफी निजी परेशानियों का सामना कर रही थी....नफीसा फैशन जगत में ही नहीं टीवी जगत में भी जाना पहचाना नाम बनती जा रही थी..लेकिन इन सुपर मॉडलों की मौत ने फैशन की चकाचौंध का घिनौना चेहरा सामने ला दिया....

वहीं ब्रिटेन में भी ऐसे ही कुछ मामले सामने आए  हैं... प्रख्यात मॉडल हेले क्रुक को हैम्पशायर स्थित उनके अभिभावकों के घर में मृत पाया गया। क्रुक के पुरुष मित्र को 17 जून को मॉडल के बिस्तर पर उसका शव मिला। मौत की वजह अब तक पता नहीं लगाई जा सकी है। पूर्वोत्तर हैम्पशायर के जांच अधिकारी एंड्रयू ब्राडली उनकी मौत के कारणों की जांच कर रहे हैं। तेईस वर्षीय क्रुक लंदन स्टूडियो सेंटर से स्नातक थीं।

मियामी में भी मशहूर पत्रिका ‘प्लेबॉय’ की पूर्व मॉडल एवं एक अरबपति की विधवा एना निकोल स्मिथ की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो गई थी...39 वर्षीया स्मिथ फ्लोरिडा के एक होटल में ठहरी थीं। एक निजी नर्स ने अस्पताल से चिकित्सीय सहायता के लिए संपर्क किया और स्मिथ को अस्पताल ले जाया गया, जहां उनकी मृत्यु हो गई। हालांकि अबतक उनकी मौत के कारण का पता नहीं चल सका है।

अब सवाल ये उठता है कि आखिर ऐसे मामले लगातार सामने क्यों आ रहे हैं... सुपर मॉडल बनने के लिए कुछ नहीं बहुत कुछ कर गुजरने की चाह रखने वाली टॉप और बोल्ड मॉडलों को क्या हो जाता है कि वो खुद को इतना कमजोर महसूस करने लगती हैं...और ऐसे कदम उठा लेती हैं...?

दरअसल सुपर मॉडल बनने की चाह में ये मॉडल अपना घर परिवार, शहर, दोस्त और प्यार सब छोड़ देती है... और जब उन्हें ठोकर लगती है तो वो पाती है कि उसके हाथ में कुछ नहीं बचा है...जिंदगी से समझौता करने के बाद लड़कियां अपने सुपर मॉडल बनने का सपना पूरा करने में इतनी बिजी हो जाती है कि उन्हें अपनी असली दुनिया नजर ही नहीं आती और ऊपर जाने की धुन में वो नीचे गिरती चली जाती है... इनमें से गिनी चुनी मॉडलें ही बुलंदियों पर कुछ समय के लिए टिक पाती हैं...या बॉलीवुड में हाथ आजमाती हैं...लेकिन इनमें से ज्यादातर लड़कियों को वापस लौटना पड़ता है....ये दुनिया कभी किसी की नहीं हुई...यहां चमकनेवाला सितारा  कम समय के लिए ही बुलंदियों पर टिक पाता है....और जब वो औंधे मुह गिरता है तो उसे जिंदगी की हकीकत नजर आती है....आई ऍम बेस्ट के भ्रम मैं रहने वाली सुपर मॉडल  चंद लम्हों में जमीन पर आ जाती है...फैशन की दुनिया का घिनोना चेहरा तब सामने आता है जब एक मॉडल खुद को असहाय महसूस करने लगती हैं..चकाचौध की दुनिया से वो सीधे आंधकारमय जीवन की ओर मुखातिब हो जाती है...

यहीं से शुरू होती है उसकी त्रासदी की कहानी...अब वो खुद को असुरक्षित मसहूस करने लगती हैं....उनसे कम उम्र की मॉडल उसकी जगह लेने लगती है....इस जगत में लड़कियों का करियर काफी कम समय के लिए  ठहरता है...लेकिन इस बात को वो अपने जेहन में नहीं उतार पातीं....घर परिवार से अलग दुनिया...शादी में इसलिए देरी क्योंकि इस फील्ड को शादी के बाद करियर का पड़व समझा जाता है....ऐसे में एक सफल मॉडल भला क्या करे....शादी का समय निकलता चला जाता है...परिवार से भी ज्यादा लगाव नहीं रह जाता....ऐसे में उनका इकलौता करियर भी उन्हें टिमटिमाता नजर आता है....जो धीरे-धीरे उन्हें खोखला करती चली जाती है...चेहरे पर हमेशा खुशियों का मुखौटा ओढ़नेवाली मॉडल खुद को असहाय महसूस करने लगती हैं...उसकी  हर रोज शान से जीने की अपनी आदत उसपर भारी पड़ने लगती है... और गुमनामी का डर उसे सताने लगता है..इस वक्त वो उम्र के ऐसे पड़ाव पर आ जाती हैं...जब उनके लिए शादी का वक्त निकलता नजर आता है ...और करियर बदलने का कोई दूसरा रास्ता भी नहीं रह जाता...

बुधवार, जून 16

अजब अनोखा देश

मीडिया में कार्यरत होने की वजह से मुझे आए दिन देश-दुनिया की ऐसी खबरों से रू-ब-रू होना पड़ता है जिन्हें देखकर अश्चर्य होता है...क्या करूं पेशा ही ऐसा है...खैर मेरा इरादा आपको अपनी व्यथा सुनाकर बोर करना बिल्कुल नहीं है...दरअसल मैं आपको कुछ रोचक खबरों से अवगत कराना चाहती हूं... रोज-रोज की खबरों से अलग मुझे कुछ ऐसी खबरें बनाने को मिलीं जिनसे महिलाओं की अनोखी कला का सरोकार है...मैं इस खबर को आपके साथ भी बांटना चाहूंगी.. हालांकि इन खबरों की feed Reuter में आई थी... और आप इन खबरों को कई मीडिया चैनल पर भी देख सकते हैं... लेकिन मेरा उद्देश्य आपको हमारे देश की परंपरा और संस्कृति से अवगत कराना है...ताकि देश की इस परंपरा को दुनियाभर में नई पहचान मिले...भले ही इसमें कुछ खबरें रोचक हो सकती हैं और कुछ अजीबो-गरीब भी....लेकिन हैं बिल्कुल 16 आने सच्ची...

राजनीतिक, सामाजिक, दुर्घटना, गॉसिप्स और कारोबारी खबरें तो हर-रोज आपको देखने को मिलतीं है...लेकिन SOFT  STORY तो हर कोई पसंद करता है...कुछ ऐसी ही खबरें मुझे एक दिन बनाने को मिलीं...जिसमें महिलाओं ने अनोखी मिसाल कायम की हैं..


पहली खबर उड़ीसा से...
वैसे तो महिलाएं आंसू बहाने में सबसे आगे रहती हैं....छोटी-छोटी बातों पर घड़ियाली आंसू बहाना तो कोई उनसे सीखे...उड़ीसा के कोणार्क में एक ऐसी ही प्रतियोगिता आयोजित की गई...जिसमें महिलाएं विलाप करती नजर आई...विलाप का नाम सुनते ही अनहोनी की आशंका मन में घर कर जाती है....महिलाओं का रुदन सुनकर किसी के भी रौंगटे खड़े हो जाते हैं....ऐसा लगता है जैसे दिल फट कर बाहर आ जाएगा...लेकिन जनाब इस प्रतियोगिता में महिलाएं अपने रोने की कला का प्रदर्शन करती हैं और जो सबसे ज्यादा हृदय विदारक क्रंदन करती हैं...उन्हें पुरस्कृत भी किया जाता है....आप सोच रहे होंगे कैसी अजब-अनोखी प्रतियोगिता है...लेकिन ये प्रतियोगिता एक खास मक्सद से आयोजित की जाती है... इसका उद्देश्य है समाज की आधुनिक पीढ़ी को पुरानी परंपरा से जोड़ना....दरअसल आधुनिकता का सबसे ज्यादा असर आज की युवा पीढ़ी पर पड़ा है...खुद को मॉडर्ऩ साबित करने के लिए लोग क्या-क्या जतन नहीं करते....खासतौर से अब शादी-विवाह के अवसर पर जब लड़कियां अपने मायके से विदा होती हैं तो...रोना-धोना उचित नहीं समझतीं... रोने का रिवाज तो जैसे धीरे-धीरे खत्म ही होता जा रहा है...पुराने जमाने में कहा जाता था कि जब लड़की अपने मायके से रोते हुए विदा होतीं थीं...तो पिता की संपत्ति बढ़ जाती थी... और परिवार-समाज से उस कन्या का जुड़ाव झलकता था... लेकिन अब ऐसा हो गया है ...कि लड़की विदाई के वक्त रोना उचित नहीं समझती...उन्हें लगता है उनका मेकअप खराब हो जाएगा...अपना घर छोड़ने का गम तो सबको होता है...लेकिन वो रोती भी हैं तो इसका खास ख्याल रखते हुए कि कहीं चेहरा खराब न हो जाए....
ऐसे में ये प्रतियोगिता उन लड़कियों को संदेश देता है कि परंपरा को किस तरह जीवित रखा जा सकता है...उन्हें इस रूदन के माध्यम से परंपरा की अहमियत से रू-ब-रू कराया जाता है...इन प्रतिभागी महिलाओं का उद्देश्य परंपराओं को लंबे समय तक सहेजना हैं...भले ही ये प्रतियोगिता थोड़ी हास्यास्पद हो लेकिन है बड़ी ही दलचस्प...है ना...!



दूसरी खबर बिहार के वैशाली जिले से...
यहां महिलाओं का एक ऐसा समूह कार्यरत है....जिन्होंने प्रदेश में मिसाल कायम की है...महिलाओं के इस समूह ने केले के पेड़ से रोजगार के नए अवसर तलाशे  हैं...वैसे तो केले के पेड़ से एक बार ही फल लिया जा सकता है और उसके बाद ये पेड़ बेकार हो जाता है....लेकिन महिलाओं ने इस पेड़ से निकलनेवाले रेशे से अनोखी कलाकृति बनाई है...इन कलाकृतियों ने महिलाओं को रोजी-रोटी का नया आयाम दिया है....ऐसे में जहां वैशाली जिले को पहले केले की खेती के लिए जाना जाता था...अब लगता है इसे केले से बनी इन कलाकृतियों के लिए भी बहुत जल्द पहचान मिलनेवाली है....यहां की महिलाएं भी अब आत्मनिर्भर बनती नजर आ रही हैं....

शुक्रवार, जून 11

क्या होगा चौथा स्तंभ न हो तो?

जरा सोचिए किसी दिन आप नींद से जागे और सामने अखबार न हो...
टीवी पर मनोरंजक कार्यक्रम तो दिखाए जा रहे हों... लेकिन उनमें न्यूज चैनल नदारद हो...
एक दिन तो चलो जैसे-तैसे गुजर जाएगा..लेकिन अगर ये सिलसिला लगातार जारी रहे तो...!
क्या कभी सोचा है...मीडिया की भूमिका खत्म हो जाए तो क्या होगा?
क्या आप बिना अखबार पढ़े या समाचार सुने अपनी जिंदगी ठीक वैसे ही गुजार सकते हैं जैसे अब तक गुजारते आए हैं....?
क्या आप मानते हैं आपकी जिंदगी में मीडिया की कोई भूमिका नहीं है?



लोगों का मानना है कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ दूषित हो गया है...
मीडियावाले उल्टी-सीधी खबरें छापते हैं...या गॉसिप्स औऱ ह्यूमर ज्यादा फैलाते हैं...
उनका कहना है कि ''आज पत्रकार रात की पार्टियों में विश्‍वास करता है। उसे जब तक टुकड़े डालो तब तक ही चुप रहता है। नहीं तो वो आपकी ऐसी की तेसी करने पर तुल जाता है।  आज का मीडिया दुम हिलऊ बनता जा रहा है''
लेकिन जनाब क्या सचमुच ऐसा है...क्या मीडियाकर्मी इतने होशियार है कि अपना उल्लू सीधा करने के लिए अरबों की जनता को एक पल में बेवकूफ बना जाते हैं....और क्या अरबों जनता इतनी ज्यादा बेवकूफ है कि हर रोज छले जाने के बाद भी इसे देखना और पढ़ना पसंद करती है...क्योंकि अगर जनता इसे नहीं देखती है तो चैनलों की TRP कहां से आती है...या न्यूजपेपरों का सर्कूलेशन कैसे हो जाता है..लाखों पेपर छपते हैं और हाथों हाथ बिक जाते हैं....
जरा गौर से सोचिए  देश का चौथा स्तंभ यानी मीडिया न हो तो क्या होगा...
कल्पना कीजिए  एक कुर्सी के चार खंभों  में से एक खंभा निकाल दिए  जाए तो...
उसी तरह देश  के चार स्तंभों में से यदि एक को भी निकाल दिया गया तो देश की स्थिति लड़खड़ा  सकती है...है ना....अब आप मीडिया की अहमियत का अंदाजा तो ब-खूबी लगा ही सकते हैं... देश की स्थिति मजबूत बनाने के लिए हर क्षेत्र में कार्य  करनेवालों का अलग अलग  योगदान है...और मीडिया अपना काम  बखूबी निभा रही है
क्या मीडिया के बिना आप अपने जीवन की कल्पना कर सकते हैं...क्या आपको देश  दुनिया की सारी जानकारी हू-ब-हू वैसे ही मिल पाएगी...जैसा मीडिया के माध्यम से आसानी से आपको मिल जाती है...क्या आप उन सारी बातों पर आंखें मूद कर भरोसा  कर पाएंगे....औऱ क्या सबको एक जैसी जानकारी मिल जाएगी....ये शायद संभव नहीं है...
आज आप रिमोट  का एक बटन दबाते हैं और पल भर में देश दुनिया की सारी बातें विस्तार से आपको मिल जाती है...अखबार  के पन्ने पलट लेते हैं  तो आपको आपके पसंद की सारी खबरें  उस कोरे कागज पर नजर आती  है...चाहे वो राजनीतिक हों, सामाजिक  हों, आर्थिक हों, बिजनस की बातें हों या फिर खेल  से जुड़ी कोई खबर....क्या आपने सोचा है इन सारी जानकारियों को इकट्ठा करने में हर-रोज  और दिन-रात सैंकड़ों लोग  किस कदर लगे रहते हैं....कैसे आपके सामने ये सारे मसाले  परोसे जाते हैं...
कई बार जब मैं  कहीं बाहर होती हूं और लोगों  को पता चलता है कि मैं मीडिया में हूं तो उनकी शिकायत होती है कि हर चैनल पर दिनभर  एक ही खबर दिखाई जाती हैं...एक ही खबर दिनभर खिंचती चली  जाती है...सच कहूं तो ऐसा अमूमन  होता नहीं है...हमारी कोशिश  रहती है कि किसी खबर को हम ज्यादा देर तक ना खींचे...अक्सर  जिस खबर को हम ज्यादा देर  तक खींचते हैं उसके पीछे कहीं न कहीं हमारी मंशा होती है खबर को अंजाम तक पहुंचाना...खबर  पर लगातार हम अपडेट देते हैं...मान  लीजिए हम सुबह से एक खबर  दिखा रहे हैं कि कोई बच्चा  बोरबेल में गिर गया...अब...जब तक वो बच्चा उससे निकल नहीं जाता तब तक तो उसे दिखाना हमारी मजबूरी है...ताकि प्रशासन  जल्द से जल्द हरकत में आए और बच्चा सुरक्षित बाहर निकल सके...मैं मानती हूं कि इस खबर को लगातार हम दिखाते हैं... लेकिन ऐसा भी नहीं है कि इनके साथ हम अन्य खबरें  नहीं दिखाते...या उस खबर में  कोई अपडेट नहीं होता...सभी  चैनल इस खबर पर इसलिए बने  रहते हैं ताकि वो उस समय  अपने अन्य प्रतिद्वंद्वी  चैनल से आगे निकलने की होड़ में शामिल होते हैं...
अभी कुछ दिनों  पहले मैं एक ब्लॉग देख  रही थी...मुझे एक महाशय के ब्लॉग पर मीडिया की आलोचना से भरा एक पोस्ट मिला...उन्होंने अपनी भड़ास मीडिया पर जमकर निकाली थी....मीडियाकर्मियों की भी उन्होंने जमकर खिंचाई की थी....और उनके पोस्ट पर टिप्पणी  करनेवालों की भी कमी नहीं थी....हालांकि मैं मीडिया में 4 साल से हूं...और चार  साल का अनुभव हमारी फील्ड  में काफी मायने रखता है....मैंने  मीडिया को गहराई से देखा है ...सच कहूं....तो मीडिया के प्रति  लोगों की धारणाओं को देखकर  बुरा लगता है....बिना जाने समझे किसी एक धारणा पर चलना उचित नहीं है...लोगों ने मीडिया के लिए ये धारणा बना ली है...कि मीडिया में गलत-सही कुछ भी दिखाया जाता है या प्रचारित किया जाता है....जिसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं होता....लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है...हम वही दिखाते हैं जो सचमुच घटित होता है...हमारे पास उसके साक्षात प्रमाण होते हैं...हम हवा में बातें नहीं करते....हम उसे visual के जरिए दर्शकों के सामने डंके की चौट पर रखते हैं...ताकि लोगों को यकीन हो....सब कहते हैं...जो दिखता है वो बिकता है...लेकिन मैं कहती हूं.....जो बिकता है वहीं यहां दिखता है....बिकने का मतलब है जो लोग देखना पसंद करते हैं...हम उसी को रोचक तरीके से आपके सामने पेश करते हैं....खबरें जो हम दिखाते है क्या आप खुले तौर पर उन्हें चुनौती दे सकते हैं...खबरों को प्रसारित होने से पहले उसे कई दौर से गुजरना पड़ता है...इसे पहले SCRIPT के रूप में लिखा जाता है...उससे संबंधित सारी जानकारी इकट्टा की जाती है...उसकी शुद्धता को परखा जाता है...न्यूज डेस्क पर बैठे कई वरिष्ठ पत्रकारों की नजर से गुजरने के बाद उसे आपके समक्ष पेश किया जाता हैं...ऐसे में गलतियों की संभावना बेहद कम होती है...
हमरी कोशिश  रहती हैं कि हम उस खबर से संबिधित सारी जानकारी जल्दी  से जल्दी आपके सामने रखें....अब गलतियां मानवीय प्रवृत्ति  का हिस्सा है...छोटी-मोटी गलती किसी से भी हो सकती है...इसका ये मतलब नहीं कि हमेशा हम गलतियों  को ही वरीयता देते हैं...हां  मैं मानती हूं कि कुछ  चैनलों ने ये फंडा अपना लिया है कि वो अजीबो-गरीब खबरों  को ज्यादा तबज्जों देते हैं...खैर  मैं किसी एक खास चैनल का नाम उजागर किए बिना कहती हूं कि सारे चैनल एक ही फंडे पर नहीं चलता...सभी मीडिया हाउसों का अलग-अलग फंडा होता है...इनमें से कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें TRP से कोई लेना-देना नहीं होता... लोग कहते हैं मीडिया में खबरें बनती नहीं है बल्कि बनाई जाती हैं...ऐसा सोचना सरासर गलत है....हम वहीं दिखाते हैं जिन्हें सचमुच उस वक्त दिखाया जाना जरूरी होता है...खबरों की महत्ता के हिसाब से हम उसे प्रसारित करते हैं...लेकिन अब मार्केट में बने रहना है तो हम उन चीजों को नजर अंदाज कर नहीं चल सकते...दूसरे मीडिया हाउस से आगे बढ़ने की होड़ में हमें कई बार ऐसा करना पड़ता है...


मीडिया को आपकी निजी जिंदगी से कोई सरोकार नहीं है लेकिन आपकी जिन्दगी  में कुछ अलग हो रहा है तो उसे जनता के सामने सच उजागर करने का पूरा अधिकार है....इस प्रक्रिया  में भले ही आपके लिए उसकी भूमिका गलत हो सकती है... लेकिन  दुनिया की नजर में वो गलत  नहीं है...उस स्थिति में उसे  पूरा हक है जिंदगी के हर पहलू पर ताकझांक करने का.... क्योंकि  वो किसी एक व्यक्ति विशेष  के लिए काम नहीं करता...ऐसे  में मीडिया आपके लिए मददगार भी साबित हो सकती है और खतरनाक भी...हमारा काम है दबे कुचलों की आवाज बुलंद करना... उसे  उसका हक दिलाना....और देश दुनिया में घटित सभी तथ्यों को हू-ब-हू  उजागर  करना...


मैं ये बिल्कुल  नहीं कहती कि मीडिया पाक-साफ  है...मीडिया में भी गंदगी  भरी है...जब कोई फिल्म बनती है तो उसमें सारे मसाले  भरे जाते हैं...उसी तरह  मीडिया में भी वो सारी चीजें  मौजूद हैं...यहां भी वो सारे स्केन्डल्स मौजूद हैं....लेकिन  हर जगह एक जैसी बात नहीं होती...शरीर पर धूल लग जाए  तो उसे फिर से साफ कर आप खड़े हो जाते हैं...इसका मतलब ये कदापि नहीं कि आप हमेशा  धूल-धु-सरित ही रहते हैं...मीडिया में काम करनेवालों के लिए ये जरूरी है कि आप किस  हद तक खुद को सुरक्षित रख पाते हैं...आपको उसूलों की यहां भी कद्र की जाती है...आपकी क्षमता को यहां भी परखा जाता है...और उसको तबज्जो दी जाती है


सबसे पहले तो मैं ये बता दूं कि....मैं ये ब्लॉग  इसलिए नहीं लिख रही कि मुझे मीडिया को पाक-साफ बताने  के लिए कोई सफाई देनी है...ना ही मेरा मक्सद मीडिया का बखान करना है...या इसका बीच बचाव करना है...देश का ये चौथा स्तंभ आज भी हिला नहीं हैं...अब भी वो बेहद मजबूत है...उसे किसी की सहानुभूति की जरूर नहीं है...वो अपना काम बखूबी करना जानता है... 
हां...जो जैसा सोचते हैं..वो बिल्कुल अपने तरीके से सोचने के लिए स्वतंत्र हैं...मैं अपने ब्लॉग के जरिए सिर्फ इतना बताना चाहती हूं कि किसी एक मान्यता को आंखें मूद कर भरोसा करने से पहले उसे अपने तरीके से जांच परख लें...फिर उसपर यकीन की मुहर लगाए...कभी मौका मिले तो किसी मीडिया हाउस में जाकर देखें कि वहां काम कैसे होता है....उन्हें आप तक किसी खबर को पहुंचाने से पहले कितनी मेहनत करनी पड़ती हैं...और मीडियाकर्मी अपनी मेहनत के लिए आपसे प्रत्यक्ष रूप से कुछ नहीं लेता... उन्हें उनकी मेहनत के लिए कंपनी भरपूर पैसे देती है...अगर कोई मीडियाकर्मी आपके साथ ऐसा कुछ करता है तो आप उसके खिलाफ जरूर आवाज उठाए...ऐसी हरकत निचले ओहदे पर काम करनेवाले लोग ही कर सकते हैं
लेकिन किसी एक की गलती के लिए आप सबको ना कोसें...मेरे ख़्याल से सबके लिए एक जैसी धारणा बनाना  गलत है..क्या आपकी धारणा  दीपक चौरसिया, पुण्य प्रसून वाजपेई, प्रभू चावला, रजत  शर्मा, मृणाल पांडे, बरखा दत्त, अल्का सक्सेना, नीलम शर्मा जैसे दिग्गजों के लिए  भी ऐसी ही है...शायद नहीं....उन्होंने भी ये बुलंदी काफी घर्षण के बाद पाई है...तो इस क्षेत्र  में आनेवाले नए चेहरों को थेड़ा वक्त तो चाहिए  खुद को स्थापित करने के लिए...कोई भी एक बार में  इन दिग्गजों की सूची में शामिल  नहीं हो सकता ना...

सोमवार, मई 24

अशांति कब तक?

थाईलैंड जिसका प्राचीन भारतीय नाम श्याम्देश था ..इसे सियाम के नाम से भी जाना जाता है...थाई शब्द का अर्थ थाई भाषा में आज़ाद होता है। 1992 में हुई सत्ता पलट में थाईलैंड एक नया संवैधानिक राजतंत्र घोषित कर दिया गया।...बौद्घ धर्म के अनुयायियों की ये धार्मिक स्थली मानी जाती है...लेकिन धर्म की इस नगरी को सबने खून से लाल होते देखा....



थाईलैंड में भले ही अब हालात सामान्य हो गए हों और जिंदगी फिर से पटरी पर लौटने लगी हों...लेकिन पिछले कुछ दिनों में शांत कहे जाने वाले इस देश में अशांति का आलम व्याप्त रहा...स्कूल, सड़कें, सरकारी एजेंसियां आदि कई दिनों तक बंद रहे....

बौद्ध अनुयायियों के लिए प्रसिद्ध धार्मिक स्थल कहे जानेवाले थाईलैंड का  पिछले कुछ दिनों में...रक्त रंजित चेहरा सामने आया...सरकार विरोधी लाल कमीज धारकरों के विरोध प्रदर्शन ने विश्व पटल पर देश की छवि धुमिल की...ऐसे में पिछले कुछ महीनों से चल रहे विवाद ने देश की आर्थिक दशा को तो नुकसान पहुंचाया ही....यहां आनेवाले पर्यटकों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया....इससे देश के पर्यटन विभाग को मिलनेवाले राजस्व में कितना नुकसान हुआ होगा इसका  अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है....देश की दुर्दशा को देखते हुए विदेशी पर्यटकों ने अपनी थाईलैंड की यात्रा रद्द कर दी....इस बीच यहां के पर्यटन स्थल पर्यटकों की बाट जोहते रहे

काफी दिनों से चल रहे विवाद ने देश के कारोबार पर भी खासा असर डाला....थाइलैंड का व्यापार काफी दिनों ठप्प पड़ा रहा..... यहां चल रहा गृह युद्ध  देश की आम जनता के लिए भी परेशानी का सबब बन गई
प्रधानमंत्री अभिसीत के ख़िलाफ़  हज़ारों की संख्या में लोगों ने बैंकाक की सड़कों पर महीनों डेरा डाले रखा... लाल कमीज़ में ये प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री के इस्तीफ़े और नए चुनावों की मांग करते रहे....हालातों पर काबू न होता देख सकरार ने यहां कर्फ्यू भी लगाया...प्रदर्शनकारियों और सेना के बीच हुई झड़पों में अब तक कितने ही लोग मारे गए और कई दर्जन लोग घायल भी हुए...लेकिन आखिरकार विरोध प्रदर्शनकारियों को पीछे हटना पड़ा.... पूर्व प्रधानमंत्री थाकशिन शिनावात्रा के समर्थक प्रदर्शनकारी नया चुनाव चाहते रहे....उनका कहना था कि वर्तमान सरकार अवैध है क्योंकि वो चुनाव जीतकर सत्ता में नहीं आई. ..लाल कमीज़ धारी प्रदर्शनकारी चाहते थे कि संसद भंग की जाए और नए चुनाव कराए जाएं....लेकिन वर्तमान सरकार इसके पक्ष में नहीं रही...हालांकि प्रधानमंत्री ने 14 नवंबर की चुनाव की तारीख़ दी है....वैसे थाइलैंड में अगले साल नवंबर में चुनाव होने हैं....
लेकिन लंबे समय तक चले इस विवाद का परिणाम क्या निकला..किसके खाते में क्य़ा-क्या आया...ये सोचने वाली बात है....पूरे प्रकरण में नुकसान वहां की आम जनता को उठाना पड़ा...यदि देश में प्रजातंत्र है तो अगले चुनाव में वो खुल कर सामने आ ही जाएगा....अब देखना ये होगा कि जनसमर्थन किसे हासिल होता है..प्रधानमंत्री अभिसीत वेजाजिवा को या फिर लाल कमीजधारी प्रदर्शनकारियों के नेता थाकशिन शिनावात्रा को....

बुधवार, मई 19

LIFE IN A METRO




दिलवालों की....दिल्ली



भागती दौड़ती....दिल्ली


हम सब की प्यारी...दिल्ली


यहां जिंदगी चलती-फिरती नहीं....रेंगती सी नजर आती है....

 
 
 
मुझे कुछ दिनों पहले दिल्ली जाना पड़ा... हालांकि इससे पहले मैं साल 2004-05 में दिल्ली गई थी...तब मैं ग्रेजुएशन में थी औऱ IIMC में दाखिले की कोशिश कर रही थी...उस समय मेरे पिताजी मेरे साथ थे...और उन दिनों मेरे देखने का नजरिया थोड़ा अलग था....मैं उन जगहों को बड़े गौर से देखती थी जिन्हें मैंने किताबों में पढ़ा हो....हालांकि नजरिया अब भी ज्यादा नहीं बदला है....मैं ऐतिहासिक जगहों को बड़े गौर से देखती हूं....दिल्ली की ये मेरी दूसरी यात्रा थी... इस बार मैं अकेली दिल्ली के लिए रवाना हुई थी...और मैंने दिल्ली में काफी बदलाव देखा...मुझे यहां का मेट्रो कल्चर बड़ा अच्छा लगा....


इतने कम समय में दिल्ली काफी बदली सी नजर आई...यहां मेट्रो ने दूरियां जैसे कम कर दी हों....ऐसा लगा जैसे लोगों की लाइफ में मेट्रो की अहमियत काफी बढ़ गई है...हालांकि उस वक्त भी मैंने शौकिया तौर पर मेट्रो से सफर किया था... लेकिन तब कुछ ही हिस्सों तक मेट्रो जाती थी....



दिल्ली में मेट्रो का जाल सा बिछ गया है...जिधर देखो उधर मेट्रो की लाइने बिछाई जा रही हैं....न केवल आसमान की ऊचाइयों को छूने की कोशिश...बल्की धरती की गहराई में भी मेट्रो ने अपनी पैठ बना ली है...धरती की सतह पर जहां हम रह रहे हैं... उसके नीचे भी चलती फिरती एक खूबसूरत दुनिया बनती जा रही है....ऐसा लगता है जैसे आने वाले समय में दिल्ली के कोने-कोने में मेट्रो ही मेट्रो नजर आएगी....वाकई इसने दिल्ली में ट्रैफिक की समस्या को कम करने में मददगार भूमिका निभाई है....



एक दिन मैं यूं ही अपने कुछ पुराने मित्रों से मिलने  निकली...मैं ऑटो लेकर दिल्ली यूनिवर्सिटी पहुंची....वहां से  मैंने यूनिवर्सिटी से नोएडा सेक्टर 18  के लिए टिकट खरीदा...जब मैं स्टेशन के
अंदर घुसी तो ऐसा लगा...मैं एयरपोर्ट के अंदर जा रही हूं..सुरक्षा व्यवस्था काफी चाक चौबंद...ऐसा भला हमारे रेलवे स्टेशन पर कहां ? कुछ पल का इंतजार और लो आ गई हमारी गाड़ी...मैं अंदर दाखिल हुई...बाहर इतनी तेज धूप औऱ मेट्रो के आंदर दाखिल होते ही गर्मी काफूर हो गई.... ऐसा लग रहा था....जैसे 5-5 मिनट के अंतराल में स्टेशन आ रहा हो...2 घंटे का सफर कैसे कट गया पता ही नहीं चला.... सच में मजा आ गया....

कुछ दिनों पहले मैं अपने एक रिश्तेदार की कार से दिल्ली के कुछ हिस्सों में गई हालांकि मैं शाम करीब 5 बजे निकली लेकिन कार के अंदर भी ऐसा लगा जैसे तपिश से चेहरा जल जाएगा...एसी ने तो जैसे काम करना बंद कर दिया हो....मैंने उस दिन को याद किया...सच कहूं अपनी गाड़ी से बेहर सफर मुझे मेट्रो का लगा...

मंगलवार, मई 4

एक पत्रकार की हत्या



निरूपमा पाठक....एक ऐसा नाम जो अब तक था..गुमनाम …लेकिन अचानक 29 अप्रैल को हुई उसकी हत्या ने उसे सुर्खियों में ला दिया...आरोपों के घेरे में कोई औऱ नहीं बल्कि उसे जन्म देने वाली मां ही निकली...निरूपमा के दोस्तों ने भले ही न्याय का दरवाजा खटखटाया हो...और राष्ट्रीय महिला आयोग से गुहार लगाई हो....लेकिन कभी किसी ने ये सोचने की कोशिश की कि उसकी मां ने ये जघन्य अपराध क्यों किया...नहीं....
क्योंकि हम आरोपी को सबसे बड़ा गुनहगार समझते हैं..हालांकि अभी ये मामला अदालत में है..और इस वक्त किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी...लेकिन एक मां खुद अपनी कोख की कातिल कैसे हो सकती है...आखिर मां किलर कैसे बन गई...ये बड़ा सवाल है



दरअसल 23 साल की निरूपमा दिल्ली के एक अंग्रेजी अखबार में पत्रकार थी और उसका अपने ही साथ काम करने वाले मित्र प्रियभांशु के साथ अफेयर था...ये बात निरूपमा के माता- पिता भी जानते थे...माता-पिता ने अपनी बेटी के लिए कितने सपने संजोए होंगे... इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने देश के सबसे बड़े मीडिया संस्थान {IIMC} भारतीय जनसंचार संस्थान में बेटी का दाखिला कराया...जिसमें दाखिला के लिए पत्रकारिता के छात्र तरसते हैं...उसके पिता बैंक के अधिकारी हैं....फिर क्यों कर दी गई पत्रकार निरूपमा की हत्या?

माता पिता ने अपनी बेटी की शिक्षा में कोई कमी नहीं रखी...वो बेटी को हर वो मुकाम दिलाना चाहते थे जो एक लड़की का ख्वाब हो...तभी तो दिल्ली जैसे शहर में उसे अकेले रहने की इजाजत दी गई....झारखंड के कोडरमा की रहनेवाली निरूपमा के माता-पिता संकुचित मानसिकता के नहीं हो सकते क्योंकि उन्होंने अपनी बेटी को हर वो छूट दी जो एक बेटे की दी जाती है...लेकिन शादी ब्याह के मामले में हमारा समाज आज भी अपनी सीमाओं में बंधा है....उन्हें अपने समाज, अपनी जाति का मोह आज भी घेरे हुए है...तभी तो निरूपमा के माता-पिता नहीं चाहते थे कि उनकी बेटी दूसरी जाति के लड़के से विवाह रचाए...निरूपमा को झांसा देकर घर बुलाया गया....कहा गया कि उसकी मां बीमार है..निरूपमा आनन-फानन में घर पहुंची...उसने अपने दोस्त प्रियभांशु को मैसेज किया कि वो ऐसा वैसा कोई कदम न उठाए जिससे उसे कोई परेशानी हो... वह 19 अप्रैल को कोडरमा आई थी और उसे 28 अप्रैल को दिल्ली लौटना था। लेकिन 29 अप्रैल को उसके ही घर से बरामद हुई उसकी लाश


निरुपमा के प्रेम संबंध से उसके अभिभावक नाराज थे। निरूपमा की मौत सुबह हुई और शाम को पुलिस को सूचना दी गई...कि करंट लगने से उसकी मौत हो गई...उसके बाद उसकी मां ने बहुत तेजी से अपने बयान बदले। पहले उन्होंने कहा कि निरुपमा की मौत बिजली लगने से हुई है। बाद में उनके परिवारवाले एक स्युसाइड नोट लेकर सामने आए और कहा कि उसने छत के पंखे से लटककर जान दे दी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार निरुपमा की हत्या दम घुटने से हुई थी, जो कि तकीए से की गई है। साथ ही वह 10-12 हफ्ते की गर्भवती भी थी।"

मामला यहां जाकर खटकता है...क्योंकि निरूपमा के माता-पिता उसके प्रेम संबंधों को तो पचा सकते थे लेकिन इस दाग को कैसे पचाते....इसलिए निरूपमा को कर दिया गया मौत के हवाले....जो माता-पिता अपनी बच्ची को बुलंदियों पर देखना चाहते थे उन्होंने अपने ही हाथ खून से रंग लिए....
हालांकि उन्होंने समाज में अपनी प्रतिष्ठा बचाने की खातिर ये कदम उठाया लेकिन उनका ये फैसला दुनिया के सामने हो गया जग-जाहिर औऱ वो पहुंच गए सलाखों के पीछे....

दरअसल ये मामला प्रेम का नहीं बल्कि समाज में अपनी इज्जत का है....इज्जत के नाम पर निरुपमा की हत्या कर दी गई....निरुपमा पत्रकार थी इसलिए उनके मित्रों ने मामले को ख़त्म नहीं होने दिया....वरना न जाने हर दिन बिहार, बंगाल, झारखंड, राजस्थान और पूरे देश में कितनी निरुपमाओं को जाति-बिरादरी के नाम पर बलि चढा दी जाती है. हां ये ज़रुर है कि इसकी जानकारी कम मिल पाती है क्योंकि तथाकथित सभ्य समाज इस पर पर्दा डाल देता है..लेकिन निरूपमा ने किया था एक अपराध जिसे समाज कभी नहीं पचा सकता....
आज निरुपमा की मां अपनी बेटी की हत्या के सिलसिले में गिरफ़्तार है..... पोस्टमार्टम रिपोर्ट साफ़ कहती है निरुपमा का गला घोंटा गया है. कहीं न कहीं कोई अपना ही ज़िम्मेदार है लेकिन लगता नहीं कि उन्हें इसका ज़रा भी अफ़सोस हैं क्योंकि उनके चेहरों पर जाति का दंभ साफ़ दिखता है.....अपनी प्रतिष्ठा की खातिर अपनी बेटी को हमेशा खत्म करना उन्होंने बेहतर समझा...
निरुपमा ने और उसके अजन्मे बच्चे ने विजातीय प्रेम की बड़ी क़ीमत चुकाई है.... निरुपमा ने तो जीवन के 23 साल ही देखे....प्रेम भी किया लेकिन उस बच्चे का क्या कसूर था जो उसके गर्भ में था.... अगर निरुपमा के गर्भ में बेटी थी तो अच्छा हुआ वो दुनिया में आने से पहले ही चली गई क्योंकि ऐसे समाज में लड़की होकर पैदा होना ही शायद सबसे बड़ा गुनाह है. ....
मेरी संवेदना निरूपमा के माता पिता के साथ कतई नहीं....और मेरी संवेदना निरूपमा के साथ भी नहीं... कि उसने उच्च संस्थान से शिक्षा पाई थी.... मेरी संवेदना इसलिए भी नहीं कि वो एक पत्रकार थी....मेरी संवेदना निरूपमा के साथ इसलिए है क्योंकि उसे सुधरने का एक मौका दिया जा सकता था....क्योंकि किसी से प्यार करना गलत नहीं....हां ये जरूर गलत है कि उसने शारिरिक संबंध बनाए...लेकिन निरुपमा की हत्या हुई है तो उसके हत्यारों को सज़ा मिलनी ही चाहिए चाहे ये हत्यारे उसके अपने ही क्यों न हों.....