शुक्रवार, अक्तूबर 15

याद तुम्हारी आती है

अपनों से दूर जब भी मैं जाती हूं
याद तुम्हारी आती है...
जब कहीं बजते हैं ढोल नगाड़े
याद तुम्हारी आती है...


याद आती है बचपन की वो गलियां...
याद आती है वहां की सोंधी मिट्टी की खुशबू
जहां खेला करते थे हम नंगे पांव
याद आती है मां की वो प्यार भरी फटकार
जिसे सुनने के लिए अब कान तरसते हैं


खासकर जब आता है कोई त्योहार
याद तुम्हारी आती है....
याद आता है वो लम्हा
जब मां लेती थीं दशहरा के पहले दिन
हमारी बलइयां...
झाड़-फूंक कर न जाने क्या पहनाती थी गले में
मां से दूर अब कौन ले ऐसी बलइयां


याद आता है
सबके साथ मौज-मस्ती का वो बीता पल
पर अब वक्त कितना बदल गया है
अपने भी हैं कितने दूर-दूर


कभी-कभी जी करता है
उड़कर चली जाऊं
अपनों के पास
इस इंतजार में जीता है मन
कि आएगा एक दिन वो...खास


त्योहार आता है और
अपनी दस्तक देकर जाने कब चला जाता है
मन मचलता है अपनों से मिलने को
लेकिन ये कैसी मजबूरी है
बैठी हूं अपनों से इतनी दूर
जाने किस आस में!


त्योहारों में अपनों के संग जीने की  कीमत
क्या मैं अब अपनी नौकरी के चंद पैसों में तलाश रही हूं?

4 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन.आभार !
    महाष्टमी की बधाई .

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  2. यही सब बातें तो परेसान करती हैं मधु जी...क्या कहूँ, त्यौहार में घर पे नहीं रहना कितना कष्ट देता है :(
    रह रह के बचपन के दिन याद आते हैं.....
    मैं तो कल शाम से ही उदास हूँ, सोचता हूँ की घर पे रहता तो परिवार के साथ क्या आनंद आता त्यौहार का....
    लगता है एक पल सब छोड़ के वापस लौट जाऊं...

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  3. is me kahe gye ek-ek word dil ko chhoote hain. bahut sahi hai door rahne par ghar ko bhut miss karti hun.

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  4. कुछ पाने के लिए कुछ तो खोना पड़ता ही है ....
    हमें ऐसे ही आगे बढ़ना है .....

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