बुधवार, मई 19

LIFE IN A METRO




दिलवालों की....दिल्ली



भागती दौड़ती....दिल्ली


हम सब की प्यारी...दिल्ली


यहां जिंदगी चलती-फिरती नहीं....रेंगती सी नजर आती है....

 
 
 
मुझे कुछ दिनों पहले दिल्ली जाना पड़ा... हालांकि इससे पहले मैं साल 2004-05 में दिल्ली गई थी...तब मैं ग्रेजुएशन में थी औऱ IIMC में दाखिले की कोशिश कर रही थी...उस समय मेरे पिताजी मेरे साथ थे...और उन दिनों मेरे देखने का नजरिया थोड़ा अलग था....मैं उन जगहों को बड़े गौर से देखती थी जिन्हें मैंने किताबों में पढ़ा हो....हालांकि नजरिया अब भी ज्यादा नहीं बदला है....मैं ऐतिहासिक जगहों को बड़े गौर से देखती हूं....दिल्ली की ये मेरी दूसरी यात्रा थी... इस बार मैं अकेली दिल्ली के लिए रवाना हुई थी...और मैंने दिल्ली में काफी बदलाव देखा...मुझे यहां का मेट्रो कल्चर बड़ा अच्छा लगा....


इतने कम समय में दिल्ली काफी बदली सी नजर आई...यहां मेट्रो ने दूरियां जैसे कम कर दी हों....ऐसा लगा जैसे लोगों की लाइफ में मेट्रो की अहमियत काफी बढ़ गई है...हालांकि उस वक्त भी मैंने शौकिया तौर पर मेट्रो से सफर किया था... लेकिन तब कुछ ही हिस्सों तक मेट्रो जाती थी....



दिल्ली में मेट्रो का जाल सा बिछ गया है...जिधर देखो उधर मेट्रो की लाइने बिछाई जा रही हैं....न केवल आसमान की ऊचाइयों को छूने की कोशिश...बल्की धरती की गहराई में भी मेट्रो ने अपनी पैठ बना ली है...धरती की सतह पर जहां हम रह रहे हैं... उसके नीचे भी चलती फिरती एक खूबसूरत दुनिया बनती जा रही है....ऐसा लगता है जैसे आने वाले समय में दिल्ली के कोने-कोने में मेट्रो ही मेट्रो नजर आएगी....वाकई इसने दिल्ली में ट्रैफिक की समस्या को कम करने में मददगार भूमिका निभाई है....



एक दिन मैं यूं ही अपने कुछ पुराने मित्रों से मिलने  निकली...मैं ऑटो लेकर दिल्ली यूनिवर्सिटी पहुंची....वहां से  मैंने यूनिवर्सिटी से नोएडा सेक्टर 18  के लिए टिकट खरीदा...जब मैं स्टेशन के
अंदर घुसी तो ऐसा लगा...मैं एयरपोर्ट के अंदर जा रही हूं..सुरक्षा व्यवस्था काफी चाक चौबंद...ऐसा भला हमारे रेलवे स्टेशन पर कहां ? कुछ पल का इंतजार और लो आ गई हमारी गाड़ी...मैं अंदर दाखिल हुई...बाहर इतनी तेज धूप औऱ मेट्रो के आंदर दाखिल होते ही गर्मी काफूर हो गई.... ऐसा लग रहा था....जैसे 5-5 मिनट के अंतराल में स्टेशन आ रहा हो...2 घंटे का सफर कैसे कट गया पता ही नहीं चला.... सच में मजा आ गया....

कुछ दिनों पहले मैं अपने एक रिश्तेदार की कार से दिल्ली के कुछ हिस्सों में गई हालांकि मैं शाम करीब 5 बजे निकली लेकिन कार के अंदर भी ऐसा लगा जैसे तपिश से चेहरा जल जाएगा...एसी ने तो जैसे काम करना बंद कर दिया हो....मैंने उस दिन को याद किया...सच कहूं अपनी गाड़ी से बेहर सफर मुझे मेट्रो का लगा...

3 टिप्‍पणियां:

  1. मधु जी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि मेट्रो ने दिल्ली के यातायात को बहुत सुगम और आरामदेह बना दिया है.. पर जाने क्यों मुझे लगता है कि कहीं दिल्ली खोखली तो नहीं होती जा रही. ये मेट्रो की खुदाई इसे अन्दर ही अन्दर से इतना कमज़ोर ना कर दे कि एक भूकंप का झटका दिल्ली को बर्बाद कर के रख दे..

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  2. मेरी भी पहली मेट्रो यात्रा इसी तरह की थी :)

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  3. Delhi ki shaan to wakai hai METRO. yah bhi aapne thik hi kaha ki safar ka samay bus ke tulna mein kafi kam ho gya prayek 2 minute par stopage hai. Logo ko rahat se bhari pari hai METRO.
    Sabse gaur karane wali baat yah hai ki is METRO mein ek-se-ek dehati safar karate hai par bilkul anushasan mein jahan-tanha log thukate nahi , jaise taise log baithate nahi. log bina tiket chalate nahi. Yah durlabh baaten mujhe METRO ke andar mili. yahi log railway ke train bhi safar karate par wanha kyon nahi apni chaal-dhaal ko sudharate? yah sodh ka vishay hai?????????????????????

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