सोमवार, जुलाई 20

जब तुम थे...


जब तुम थे...मेरी ज़िन्दगी में शामिल
मुझे लगता था, मेरे जीवन का है कुछ आस्तित्व
जब तुम थे...
मैं हंसती, खिलखिलाती, मुस्कुराती थी
मैं इठलाती, इतराती, गुनगुनाती थी
मैं लहलहाती, चहचहाती, शर्माती थी
मैं सबकी ख़ुशियों में शामिल नज़र आती थी
मैं सबको सुकून बांटती थी
मैं ग़म का हल भी चुटकियों में निकाल लेती थी
मैं दुनिया से लड़ने का माद्दा रखती थी
मैं कल्पनालोक में विचरण करती थी
इंद्रधनुष के सात रंग मेरे जीवन को रंगीन बनाते थे
जब तुम थे...
मेरी दुआओं में तुम ही तुम नज़र आते थे
मेरी ज़िन्दगी में आई थी बहार
मेरी आकांक्षा उमड़ती, घुमड़ती, सरसती थी
मेरी सांसें अवाध्य गति से दौड़ती थीं
मेरी बातों में जादू टपकता था
मेरी दुनिया सात रंगों से सजी थीं
मेरे सपने सजते, संवरते, सुलझते थे
मेरे जीवन में उत्साह, उमंग, उन्माद था
मेरे जीने का भी मक्सद हुआ करता था
मेरे कई शौक...कुलांचे भरते थे
हर काम में मेरी उपस्थिति झलकती थी...

देखो न....पहले मैं क्या थी...
और आज मैं क्या हूं...
आज जब तुम मेरी ज़िन्दगी में नहीं....
आज इन सबके अर्थ बदल गए हैं...
मैं अकेली, असहाय, अनाथ हो गई हूं...
सूखे पेड़ की डाली के टूटे पत्तों की तरह बेजान, नर्जीव, सूनी
तुम्हारी उन यादों ने मुझे एक पल भी तन्हा न छोड़ा
मेरी तन्हाई मुझे घून की तरह अंदर ही अंदर खाने लगी है
घर का एक शांत कोना मुझे बांहे पसारे जाने क्यों बुलाता है
सैडसॉन्ग मेरी तन्हाई मिटाने के लिए भी काफ़ी नहीं...
फिर मेरी आंखें बिना रुके झरझराती हैं...
मेरे जीवन में कोई उमंग कोई उत्साह नहीं
मेरा फ़ोन...पहले कभी मुझसे ख़ाली व़क्त की मिन्नत करता था
जो आज चुपचाप मुझसे किनारा किए बैठा है...

जब मैं चित्र बनाने बैठती हूं और तूलिका से उनमें
रंग भरने का प्रयास करती हूं...
वे चित्र भी अपने फीकेपन का एहसास करा जाते हैं...
जो पहले कभी अपने अंदर सभी गाढ़े रंग समेट लेते थे
आज रंगहीन बनकर इठलाते हैं...

वो लड़ना...वो झगड़ना...
अब आंसूओं की धार बनकर बह जाना चाहता है...
तुम्हारी यादें उनमें धुंधली होने का प्रयास करती हैं
हवा के वे शीतल झोंके...जो पहले मुझे गुदगुदाते थे...
आज थपेड़े बनकर मुझे डराते हैं...
त्योहार आता है...और बिना कोई एहसास कराए निकल जाता है...
मेरा मन कहीं स्थिरता नहीं पाता
कोई मेरे हृदय के एक कोने में जगह न मांग बैठे
मैंने उसका भी उपाय कर लिया है
मन को एक ताले में बंद कर...चाभी न जाने कहां गुमा दी है...
कोई मुझे अपने आकर्षण में बांध भी तो नहीं पाता
न जाने मैं उसमें भी वही उम्मीद लगा बैठती हूं...
कि दिल एक पल में टूट जाता है...
कोई मेरी आवाज़ में वो मिठास भी तो नहीं पाता
मेरा मन बेबस, असहाय, लाचार है..
मेरा दिल ज़ख़्मी, मजबूर है...
मेरी हंसी में भी उदासी अपनी झलक दिखा जाती है...
क्या मेरे जीवन में कभी बहार नहीं आएगी...
क्या मैं इतना सा ही वक्त लेकर इस दुनिया में आई थी...
अगले जनम में मिलने की आस लेकर..
क्या में यूं ही दफ़न हो जाऊं...
और तब...

क्या ये एक कहानी बनकर...
बिना किसी को सुनाए...शून्य में मिल जाएगा...
और क्या अगले जनम में भी मेरा प्यार
मुझे वापस मिल पाएगा ?

10 टिप्‍पणियां:

  1. aapki is kavita ko padh ke mujhe Dushyant Kumar ka kikha kuch yad aata hai :

    Jo bhi diya, anashwar hi diya mujhe,
    Upar se niche tak bhar diya mujhe,
    Ye swar sakuchate hain par,
    Tumne apne tak hi simit kar diya mujhe.

    Madhuji, kya apne 'Tum Yad Aye' ke songs sune hain? Ye kafi purana album hai, par ummeed karta hun, apko pasand ayega.

    With best wishes,
    Abhishek Kr
    Hyderabad : abhi_op@indiatimes.com

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  2. jeevan fir v chalta jata hai tamam ulatbansiyon k sath.....jb tk zinda rahna hai jeeta hi jata hai...aur uske baad....hamesha k liye kho ya so jata hai....

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  3. jab tk jeevan hai uska hr meetha khatta aur krwa ahsaas hai...uske bad....to kuchh v nhi...

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  4. बेनामीजुलाई 14, 2012

    pta nahi, agla janm kisne dekha hai,..kya hota hai us janm me, kya milta hai,...fir uske baad bhi kya agla janm hota hai!...koi saaf-saaf nhi janta,...han ye jo jeevan hai ise 1 din khatm zaroor ho jana hai,...yani jaisa bhi ehsaas mila, wohi is jeevan ka hai,(smritiyon ka ya vartamaan ka,baqi aage kisne dekha hai)...ek tarah se kahen to wohi "jeevan" hai,..wohi "jeena" hai...
    ....PANSY

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    1. बेनामीमार्च 25, 2013

      baat agle janm ki nahi, isi jeevan ki hai jisme wo meetha ehsaas paida hua, un palon me jeevan paya lga puri jannat pa li,...wo murjha gya to kya hua,uska murjhana bhi to us ehsas ki maut ki tarah hi hai...aapne pansy+tripti ke bhawon ko lagta hai samjha aur aage badhaya hai...use samagrata aur gahrai di hai...pr ise vishuddh materialistic dhang se lene wale kabhi us marm ko nhi samajh sakte fir us pr tippani to door hai...wo milne aur chhutne ke guna-bhag me hi rah jate hain...

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    1. बेनामीमार्च 28, 2013

      रचनाकार की खुद ऐसी टिप्पणी...उसकी रचना को सतही बनाता है...

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  6. बेनामीमार्च 27, 2013

    इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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