सोमवार, मई 16

मिट्टी की महक


जैसे जैसे हम अपने वतन की मिट्टी से दूर जाते हैं.....उसके प्रति लगाव उतना ही गहरा होता जाता है....औऱ अपने क्षेत्र की यादें हमारे जेहन को टटोलती हैं.....हम भले ही अपने इलाके में अपने लोगों से ज्यादा मतलब न रखते हों लेकिन जैसे जैसे हम अपने क्षेत्र से दूर जाते हैं...और उस इलाके का कोई मिलता है तो लगता है जैसे ये हमारा अपना सगा हो....मैंने ये कई दफ़े महसूस किया है....जैसे हम अपने गांव से दूसरे गांव कुछ वक्त के लिए रहने जाते हैं....तो गांव की सोधीं मिट्टी की खुशबू हमें अपने इलाके की मिट्टी की याद दिलाती है.....वहां बिताए हुए पल हमें अपनी जड़ों से जोड़ते हैं...वैसे  ही जब हम अपने शहर या राज्य से दूसरे शहर या राज्य की ओर पलायन करते हैं तो भी अमूमन ऐसे ही हालात होते हैं....

और जब हम अपना देश....अपना वतन छोड़ कर दूसरे वतन जाते हैं तो ये लगाव थोड़ा और गहरा होता जाता है...और वहां जब कोई अपने देश का मिलता है तो लगता है जैसे उससे कोई गहरा नाता जुड़ गया हो.....
 
खैर लोगों का ये भी कहना है कि जो दूसरे देशों में ज्यादा वक्त बिताते हैं उन्हें अपने देश में कमियां नजर आने लगती हैं....हालांकि इसमें सच्चाई भी है....क्योंकि हम अपने देश की उस देश की उन्नती से तुलना करने लगते हैं....और अक्सर हम अपने देश में छोटी-छोटी चीजों में कमियां पाते हैं...इसमें सच्चाई भी है....और हमें इसे स्वीकार भी करना चाहिए....मेरा उद्देश्य  यहां अपने देश की खामियां गिनाना नहीं है.....दरअसल मैं खुद इन दिनों करीब एक महीने से अपने वतन की मिट्टी से काफी दूर मैक्सिको में हूं...और मैं अपने देश को काफी MISS कर रही हूं...वैसे भारतीय यहां काफी कम दिखते हैं....लेकिन काफी लोग यहां भारत से मिलते जुलते नजर आते हैं.....
जिन देशों के सांस्कृतिक मेले लगे हैं, उनके नाम और जहां लगे हैं वो स्थान
 


मैक्सिको शहर के बीचोबीच लादियाना, रिफॉर्मा में अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक मेला लगा है....जो 14 मई से 29 मई के दौरान आयोजित किया गया है....हालांकि ये मेला जिस जगह लगा है वो स्थान मेरे निवास के बिल्कुल करीब है....और कमरे की खिड़की से मैं पूरा आयोजन आराम से बैठे-बैठे देख सकती हूं....इस मेले में हर देश ने अपनी संस्कृति से जुड़ी चिजों की प्रदर्शनी लगाई है....जिससे एक ही जगह आप देश दुनियां की संस्कृति से अवगत हो सकते हैं.....जिस दिन इस मेले का उद्घाटन हुआ..मैं और मेरे पतिदेव भी इसका लुत्फ उठाने पहुंचे....हालांकि यहां सभी स्टॉल के लिए जगह सुनिश्चित है....लेकिन मेरी नजर अपने देश के स्टॉल की तलाश में छटपटाने लगी....ढूंढ़ते ढूंढ़ते हम INDIA के स्टॉल के पास पहुंचे....हालांकि कुछ स्टॉल में खान-पीने की चिजें भी रखी थीं...इसलिए हमने सोचा INDIAN स्टॉल में भी खुछ खाने को मिल जाएगा....और मेरा मन गुपचुप खाने को बेताब हुआ जा रहा था.....मैंने सोचा INDIA वाले स्टॉल में मुझे गुपचुप तो जरूर मिल सकता है...लेकिन हाय-रे-मेरी किस्मत....स्टॉल में खानेपीने की चीजें नदारद थी..... मैंने सोचा स्टॉल में गुपचुप मिल जाता...तो मैं तो हर-रोज यहां खाने चली आती...INDIAN स्टॉल में ज्यादातर कपड़े,Artificial गहने...कुछ देवी देवताओं की मूर्तियां....और सजावट के सामान रखे गए हैं....


खैर स्टॉल देख कर मेरा मन थोड़ा खट्टा हो गया....क्योंकि मैक्सिको में मैं किसी चीज को सबसे ज्यादा मिस कर रही हूं....तो वो है अपने देश का खाना....यहां अपने देश जैसा खाना नहीं मिलता...इक्के दुक्के मिलते भी है तो अपने देश जैसा स्वाद इनमें कहां...वैसे खाना तो मैं यहां खुद ही बनाती हूं लेकिन वो स्वाद नहीं मिलता.....और अपने देश में गुपचुप की तो बात ही निराली है...

हां स्टॉल में भारतीय संगीत की धुन सुनकर मन को थोड़ी शांति मिली....हमने स्टॉल का मुआयना किया....दूर देश में अपने देश की महक ने हमे खूब लुभाया....हालांकि indian स्टॉल में खचाखच भीड़ लगी थी....और लोग जमकर खरीदारी कर रहे थे....वैसे भी हमारे देश की संस्कृति दूसरे देशों को काफी लुभाती है....यहां भी कुछ मैक्सिकन लोगों को स्टॉल पर रखा गया था ताकि लोगों को भाषा की वजह से परेशानी न हो....हालांकि स्टॉल प्रमुख की नजर हमारी ओर आकर टिक गई...ऐसा लगा जैसे अपनों ने अपने को पहचान लिया हो और परिचय का सिलसिला शुरू हुआ....बातों बातों में महाशय ने बताया की पास ही में उनकी एक दुकान भी है...और उन्होंने आने का निमंत्रण भी दे डाला....मैंने उनके स्टॉल से कुछ चीजें खरीदीं जिसपर उन्होंने काफी डिस्कॉऊंट भी किया....


हालांकि जैसी हालत मेरी यहां विदेश में आकर है वैसी ही हालत मैंने दूसरे देशों से आकर यहां रह रहे लोगों में भी देखी...जिस देश का स्टाल था वहां उस देश के लोग खिंचे चले आते नजर आए....मुझे एहसास हुआ की हर नागरिक जो जिस देश का है वो अपने देश की संस्कृति से उतना ही लगाव रखता है जितना की हमे अपने देश की संस्कृति पर गर्व है...

शुक्रवार, अक्टूबर 29

ऐ सूरज
तू इतना बेरहम क्यों हो गया है
अब कहीं ज्यादा
तो कहीं कम चमकने लगा है?(ध्रुव)

क्या तूने अमीरों-गरीबों में
भेद करना सीख लिया है?

अमीर तो फिर भी
अपनी हिफाजत कर लेते हैं
लेकिन हर रोज
पिसते बेचारे गरीब हैं

अमीर AC/ कूलर में रहकर
चुराते हैं तुझसे नजर

 
बेचारे गरीब नहीं जानते
तेरे जला देने वाले आक्रामक तेज को


दो जून की रोटी की खातिर
करते हैं तुझसे सामना
और बहाते हैं हर रोज
तेरे आगे खून पसीना


अब तू ही बता क्या मिलता है
तुझे उनकी मेहन की फसलों को जलाकर
क्या इससे होती है तेरी ज्वाला शांत
औऱ मिल जाता है तुझे सुकून


इससे भी तेरा मन नहीं भरता तो
तू भेज देता है अपनी सौतन को
जो अपने साथ बहा ले जाती हैं
किसानों की साल भर की मेहनत


चल...तू ही बता कितने अमीरों के घर
जलती है तेरे नाम की ज्योत?

कितने अमीर देख पाते हैं
तेरी पहली औऱ आखरी किरण के मिलन को?

क्यों करता है तू अपनों के साथ अन्याय
क्यों लेता है तू हर बार अपनों की ही अग्निपरीक्षा?

गुरुवार, अक्टूबर 28

जीत होगी जरूर

हार...अंतिम पड़ाव नहीं
जीत का है वो पहला रास्ता


       जीत... होगी एक दिन जरूर
       क्योंकि है हमें पूरा हौसला

हार-जीत का खेल तो लगा रहेगा
जीतेगा वही...जो निरंतर चलता रहेगा...

       बाधाएं आएंगी पग-पग पर अनेक
       डटकर करना है उसका सामना

थक जाओ अगर...
तो कुछ पल के लिए ठहरना

     जिगर को मजबूती से थामना और
     हिम्मत से करना मुश्किलों का सामना

खुल जाएंगे खुद-ब-खुद सारे द्वार
और हो जाएंगे हम भवसागर के पार

शुक्रवार, अक्टूबर 15

याद तुम्हारी आती है

अपनों से दूर जब भी मैं जाती हूं
याद तुम्हारी आती है...
जब कहीं बजते हैं ढोल नगाड़े
याद तुम्हारी आती है...


याद आती है बचपन की वो गलियां...
याद आती है वहां की सोंधी मिट्टी की खुशबू
जहां खेला करते थे हम नंगे पांव
याद आती है मां की वो प्यार भरी फटकार
जिसे सुनने के लिए अब कान तरसते हैं


खासकर जब आता है कोई त्योहार
याद तुम्हारी आती है....
याद आता है वो लम्हा
जब मां लेती थीं दशहरा के पहले दिन
हमारी बलइयां...
झाड़-फूंक कर न जाने क्या पहनाती थी गले में
मां से दूर अब कौन ले ऐसी बलइयां


याद आता है
सबके साथ मौज-मस्ती का वो बीता पल
पर अब वक्त कितना बदल गया है
अपने भी हैं कितने दूर-दूर


कभी-कभी जी करता है
उड़कर चली जाऊं
अपनों के पास
इस इंतजार में जीता है मन
कि आएगा एक दिन वो...खास


त्योहार आता है और
अपनी दस्तक देकर जाने कब चला जाता है
मन मचलता है अपनों से मिलने को
लेकिन ये कैसी मजबूरी है
बैठी हूं अपनों से इतनी दूर
जाने किस आस में!

काश कभी आएगा वो दिन खाश 
जब अपने भी होंगे आस पास।

बुधवार, अक्टूबर 6

मां के नौ रूप

नवरात्र वो पर्व है, जिसमें देवी अपनी शक्ति का संचार अपने भक्तों में करती हैं। ये पर्व प्रकृति में स्थित शक्ति को समझने और उसकी आराधना का है। प्रकृति में विभिन्न रूपों में मां शक्ति स्थित है। उसी की आराधना हम नवरात्र में करते हैं-

नौ दिनों तक चलने वाले नवरात्र में मां पार्वती, मां लक्ष्मी और मां सरस्वती के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है...पहले तीन दिन पार्वती के स्वरूप, फिर तीन दिन मां लक्ष्मी के स्वरूप और अंतिम तीन दिनों में मां सरस्वती के स्वरूप की पूजा की जाती है....

आदिशक्ति मां दुर्गा का पहला स्वरूप है शैलपुत्री-
पर्वतराज हिमालय के यहां जन्म होने से इन्हें शैलपुत्री कहा जाता है...नवरात्रि की पहली तिथि को शैलपुत्री की पूजा की जाती है...माना जाता है कि इनके पूजन से भक्त को जीवनभर किसी चीज की कमी नहीं रहती....



भक्तों और साधकों को अनंत कोटि फल प्रदान करनेवाली मां का दूसरा रूप है ब्रह्मचारिणी जिसकी उपासना करने से तप,त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम की भावना जागृत होती है...


मां का तीसरा स्वरूप चंद्रघंटा है...इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है...इसी कारण उन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है...इनकी पूजा अर्चना करने से सिद्धियां प्राप्त होती हैं...और सांसारिक कष्टों से मुक्ति मिलती है....


नवरात्रि का चौथा दिन मां कुष्मुंडा का होता है...माना जाता है कि उनके उदर से ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई है..इसलिए इन्हें कुष्मुंडा कहा जाता है...इनकी भक्ति से आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है...


पांचवां दिन स्कंदमाता की उपासना का होता है कुमार कार्तिकेय की माता होने के कारण इन्हें स्कंदमाता कहा जाता है...जिनके आशीर्वाद से मोक्ष का रास्ता सुलभ हो जाता है...


महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न आदिशक्ति ने उनके यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया और इस लिए छठवें दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है...जो हमें रोग, शोक संताप, भय से मुक्ति दिलाती हैं...





सातवां दिन होता है मां कालरात्री का जो काल का नाश करती है..इनकी पूजा अर्चना करने से सिद्धियों की प्राप्ति होती है...



मां का आठवां रूप है महागौरी का इनका वर्ण गौर होने से ये महागौरी कहलाती हैं जिनकी साधना असंभव कार्य को भी संभव बना देती है...


मां का नौवां रूप है मां सिद्धिदात्री..सभी सिद्धियों की दाता होने से मां सिद्धिदात्री कहलाती हैं..और नवरात्री के अंतिम दिन मां के इसी रूप की पूजा होती है...


ये है मां के नौ रूप...जिनकी उपासना से शक्ति और समृद्धि मिलती है...और मां की शरण में आनेवाला भक्त कभी खाली हाथ नहीं लौटता....

शुक्रवार, सितंबर 24

बदलना सीख लिया है...

बे-रंग नहीं ये ज़िंदगी...
मैंने रंग बदलना सीख लिया है

कंटीले रास्तों पर चलते-चलते
गिरकर संभलना सीख लिया है

ज़ख़्म नासूर न बन जाए हमेशा के लिए
तभी तो मरहम को मलना सीख लिया है

ग़म से भरी हैं पलकें तो क्या
नमी ने पिघलना सीख लिया है

तुम मुझे ठुकराओ इससे पहले
मैंने नीयत को पढ़ना सीख लिया है

टूटती नहीं अब कांच के टुकड़ों की तरह
क्योंकि मैंने हिम्मत कर...चलना सीख लिया है

देख ली है मैंने भी दुनिया बहुत
अब इंसान परखना सीख लिया है

शुक्रवार, सितंबर 10

मीडिया है कमाल

मीडिया...यारों चीज बड़ी है ‘कमाल’
यहां बिछा है हर तरफ ...
खबरों का ही ‘मायाजाल’...।।

इसके दर पे…
संपादक रहते हैं हमेशा ‘बेहाल’
उन्हें रहता है अक्सर खबरों का ही ‘मलाल’
सुबह-शाम, उठते-बैठते हर वक्त
उन्हें आते हैं खबरों के सपने।।

जितनी भी खबरें दो उनके आगे ‘परस’
एक बार में जाते हैं वो ‘गटक’
थोड़ी देर में खबरें हो जाती है...’हजम ‘
और फिर करते हैं...खबरों का ‘महाजाप’।।

इनपुट डेस्क है ‘खबरों का सूत्रधार’
पत्रकार करते हैं ‘खबरों की पड़ताल’
ऑउटपुट डेस्क करते हैं ‘खबरों का पोस्टमार्टम’
ऐंकर को रहता है पोस्टमर्टम ‘रिपोर्ट का इंतजार’।।

पीसीआर में लगती है ‘रिपोर्ट पर मुहर’
और खबरें हो जाती है कुछ पल में ‘ऑन एयर’
हफ्ते भर में आ जाती है ‘टीआरपी रिपोर्ट’
जिसके बाद...एक बार फिर लगती है
पूरी टीम की अच्छी-भली ‘क्लास’।।

पर दोस्तों...
हर मीडिया हाउस की है ऐसी ही सरकार।।

नोट: इस कविता के सभी पात्र काल्पनिक हैं...इसका किसी व्यक्ति विशेष से कोई सरोकार नहीं...ये मात्र भावों की अभिव्यक्ति है..अतः इसका गलत अर्थ न लगाए(एक व्यंग)