शुक्रवार, अप्रैल 9

दिनभर की BP




BP का मतलब वैसे तो ब्लड प्रेशर होता है….लेकिन मैं ब्लड प्रेशर की बात नहीं कर रही...दरअसल मैं मीडिया सेक्टर के BP की बात कर रही हूं....यहां BP का मतलब होता है बुलेटिन प्रोड्यूसर....ये शब्द किसी एक इंसान के लिए प्रयोग नहीं किया जाता...दरअसल शिफ्ट के अनुसार BP बदलते हैं...MORNING में अलग BP होता है EVENING में अलग और NIGHT के लिए अलग..वैसे तो एक शिफ्ट में दो से तीन BP भी हो सकते हैं...लेकिन EVENING शिफ्ट में ज्यादा BP होते हैं....सबका काम बंटा होता है...सबके जिम्मे अलग-अलग बुलेटिन होता है...और उसे कम से कम आधे घंटे का गैप मिलता है अपना बुलेटिन तैयार करने के लिए....लेकिन कई बार ऐसा होता है कि बेचारा BP अपनी शिफ्ट में अकेला पड़ जाता है...पहले तो मैं ये बता दूं कि मीडिया में बुलेटिन प्रोड्यूसर की सबसे अहम भूमिका होती है....उसके मत्थे खबरों को चलाने की पूरी जिम्मेदारी होती है....एंकर को क्या पढ़ाना है, किस सिक्वेंस में पढ़ाना है, किस खबर को क्या ट्रिटमेंट देना है...कहने का मतलब किसी मीडिया हाउस के लिए BP की भूमिका बेहद खास है....एक छोटी सी गलती हुई की सारी जिम्मेदारी BP के सिर मढ़ दी जाती है....न्यूज रूम में किसी की आवाज सबसे ज्यादा गूंजती है तो वो है BP. ये एक ऐसा प्राणी है जिसे ना चाहते हुए भी दिनभर चिल्लाना ही पड़ता है...मेरे कहने का गलत अर्थ ना लगाए....मेरे कहने का मतलब है उसे सबको कमांड देना उसकी जिम्मेदारी है...एंकर, PCR, न्यूजरूम, ऑउटपुट डेस्क, इनपुट डेस्क सब को एक साथ उसे मैनेज कर चलना पड़ता है...ऐसे में आप अंदाजा लगा सकते हैं कि उसकी भूमिका कितनी अहमियत रखती है...बॉस को भी बुलेटिन में कुछ नया बदलाव करना है या कुछ नया ऑन एयर करवाना है तो उसे BP के माध्यम से ही कहना पड़ता है...मतलब आप घर पर बैठकर जो कुछ भी देख रहे होते हैं...उसे एक BP के दिमाग की उपज कहा जा सकता है...एंकर तो बस उसके कमांड को फॉलो करता है...

चलिए अब मुद्दे की बात की जाए...एक दिन मैं सुबह जब ऑफिस आई तो पता चला दो BP ने छुट्टी ले रखी है...और दिनभर मुझे सारे बुलेटिन संभालने है...हालांकि मैंने कई बार बुलेटिन निकाले हैं...लेकिन दिनभर...वो भी अकेले मेरे लिए काफी मुश्किलों भरा काम था...मैं थोड़ी देर सोच में पड़ गई...क्योंकि पहली बार मैं दिनभर अकेली फंस गई थी....खैर मैंने हिम्मत की.... सुबह 10 बजे से शाम के 4:30 बजे तक के सारे सेगमेंट मुझे संभालने थे औऱ इस बीच कोई ब्रेक नहीं....सच बताऊ तो हिलने की फुरसत नहीं थी...अब जब आफत सामने आ ही गई है तो मैं भी पीछे हटने वाली कहां थी....मैंने भी अपना काम शुरू कर दिया....एक बुलेटिन खत्म नहीं हुआ की दूसरे बुलेटिन में लगना पड़ रहा था...ब्रेकिंग खबरें भी लगातार आ रही थी...सबको एक साथ हैंडिल करना था ऊपर से बॉस का फोन आ जाए...कि इस खबर पर स्टिंग बनवाना है..इस खबर पर फोनो प्लेट बनवाना है..इस खबर पर फोनो लेना है...इस खबर को दर्शकों के फोन कॉल के लिए खोलना है...इसी बीच गृहमंत्री ने इस्तीफे की पेशकश की...नक्सली मुद्दे पर....इस खबर को खींचना था.....सानिया के निकाह की खबरें आ रही थी....उसपर स्टिंग के साथ 10 मिनट खींचना है....ऐसा लग रहा था जैसे दिमाग की दही बन गई हो...काम करने वाला कोई नहीं और सारी जिम्मेदारी मेरे मत्थे...
बुलेटिन प्रोड्यूसर को सबसे पहले ये देखना पड़ता है किस खबर पर दिनभर खेला जा सकता है...मेरा मतलब है किस खबर को दिनभर खींचा जा सकता है...एक मासूम लड़की की खबर आई थी जिसके पेट में लकड़ी का बड़ा सा हिस्सा घुस गया था....इस खबर पर दिनभर खेला जा सकता था...रायपुर के हॉस्पीटल में उसका इलाज लच रहा था...हम दिनभर इसी खबर को तानते रहे....हर बुलेटिन में पहला सेगमेंट इसी पर टिका रहा....दर्शकों के भी खूब फोन आए मैसेज आए...आखिरकार लड़की का ऑपरेशन सफल रहा...हालांकि एक BP जो नाइट शिफ्ट में थे कुछ देर रुक गए मेरी मदद के लिए...

किसी तरह शाम 4 बजे...मैं भगवान से मना रही थी हे भगवान ये लास्ट बुलेटिन बस सही सलामत निपट जाए...और भगवान का लाख-लाख शुक्रिया कि मेरे सारे सेगमेंट सही से RUN हुए...मैंने राहत की सांस ली...दिनभर चिल्ला चिल्ला कर मेरा गला सूख गया था....जिन लोगों ने मेरी आवाज ठीक से नहीं सी थी...उन्होंने आज मुझे चिल्लाते सुना....मतलब मैं अपने पावर का सही इस्तेमाल कर रही थी....एक बुलेटिन के दौरान हुआ यूं की मैंने तो बुलेटिन के सेगमेंट में कमिंग अप लगा रखा था...टेली प्रोंपटर(TP) पर एंकर के लिए लिख भी रखा था....पीसीआर से पैनल प्रोड्यूसर ने उसे प्ले कर दिया और एंकर... लिंक पढ़ना भूल गया....अब आउटपुट इंचार्ज ने मुझे फोन लगाया और पूछने लगे कि ब्रेक से पहले कमिंग अप में क्या दिक्कत आई...मैंने तो अपना काम परफेक्ट किया था मुझे समझ नहीं आया...मैंने पीसीआर फोन लगाया और पैनल प्रोड्यूसर से पूछा भई क्या माजरा है...उन्होंने बताया कि एंकर लिंक पढ़ना भूल गया....जब बुलेटिन खत्म हुआ एंकर ऊपर आए...तो मैंने पूछा आपने एंकर लिंक क्यों नहीं पढ़ा...उन्होंने उस वक्त तो अपनी गलती स्वीकार कर ली...लेकिन बाद में कहने लगे मैडम ने आज मुझे डांट लगाई है....ओह लगा सचमुच आज मैं हॉट सीट पर बैठ गई हूं...

दिनभर काम तो परफेक्ट रहा....लेकिन इस पूरे प्रक्रण में मैं खाना भी नहीं खा पाई...दिनभर भूखी प्यासी बस काम में लगी रही...इस बीच फोन पर कितने ही मैसेज आए...फोन आया...मैं किसी को रिस्पॉंस नहीं दे पाई....शाम को घर पहुंची...ऐसा लगा जैसे मजदूरी कर लौटी हूं...(दिमाग की मजदूरी) आधे घंटे तो आंखें बंद कर बिस्तर पर बे-सुध लेटी रही...उठने की हिम्मत नहीं हो रही थी...खैर मैं उठी...शाम 7 बजे...खाना बनाया...लेकिन खाने की हिम्मत नहीं थी...बिना खाना खाए ही बस सोने की इच्छा हो रही थी....थकान के मारे खाना खाने का मन ही नहीं हुआ...आखिरकार मैंने बिना खाए-पिए सोना ही उचित समझा...सच कहूं...इस वक्त मम्मी की याद आ गई..लगा काश इस वक्त मां मेरे पास होतीं...मुझे बिना खाए तो वो सोने न देती....

कभी-कभी सोचती हूं कैसी जिन्दगी हो गई है हमारी....अपने लिए भी सोचना का वक्त न रहा...खैर ये जिन्दगी भी मुझे पसंद है...क्योंकि कम से कम खुद को व्यस्त तो रख पाती हूं...और काम खत्म होने के बाद जब घर लौटती हूं तो कितना सुकून मिलता है इसका अंदाजा आप स्वयं लगा सकते हैं

2 टिप्‍पणियां:

  1. बस, सुकून मिले अपने काम से..यही तो चाहिये. अच्छा लगा पढ़कर.

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  2. पढ़कर भी सुकून मिला. न्यूज़ रूम से रूबरू कराने के लिए आभार.

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