गुरुवार, अप्रैल 8

आखिर कब तक...?



दंतेवाड़ा जिले के ताड़मेटला में हुए देश के सबसे बड़े नक्सली हमले ने प्रदेश को ही नहीं देश को भी हिला कर रख दिया....हमले की गूंज राजधानी दिल्ली तक सुनाई दी....कोलकाता में गृहमंत्री पी चिदंबरम के नक्सली समस्या पर दिए बयान के चंद घंटों बाद ही नक्सलियों ने इतनी बड़ी वारदात को अंजाम दिया... इस हमले में हजारों की तादात में नक्सलियों ने 76 जवानों को मौत के घाट उतार दिया...
बंदूक की नोक पर या बारूद के ढेर में नक्सलियों की समस्याओं का समाधान कभी भी संभव नहीं है...इसके लिए नक्सलियों और सरकार को आमने-सामने तो आना ही होगा...साल 1967 से नक्सली आंदोलन शुरू हुआ जिसका गढ़ है पश्चिम बंगाल, बिहार झरखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ औऱ आंध्रप्रदेश... इन राज्यों के लोग आज भी नक्सली समस्या से जूझने को मजबूर है ...सरकार नक्सली समस्या से निपटने के लाख दावे करे...लेकिन आज भी देश के समक्ष ये समस्या मुंह बाए खड़ी है....आए दिन नक्सली कहीं न कहीं ऐसी वारदातों को अंजाम देते हैं जिसमें मासूमों को अपनी जान गवांनी पड़ती है...
इस समस्या का कोई ठोस समाधान नहीं निकाल तो क्या ये मुद्दा यूं ही खिंचता चला जाएगा और यूं ही हमेशा मासूम अपनी जान गवांते रहेंगे....सरकार का ग्रीन हंट ऑपरेशन क्या इस समस्या का समाधान निकाल पाएगा....ये एक गंभीर सवाल है....अक्सर नक्सल प्रभावित राज्य नक्ललियों की वारदात का और नक्सलियों के बंद का अंजाम भुगतते हैं...नक्सली बंद का देश पर कितना असर पड़ता है इसका जरा भी अंदाजा है उन्हें...रेल बंद, यातायात बंद, कारोबार बंद, शहर बंद....कभी सोचा है इससे लोगों को कितनी परेशानियां होती हैं...

एक दिन के प्रदेश बंद से करोड़ों का नुकसान होता है....ये केवल सरकार का नुकसान नहीं...कारोबारियों का भी नुकसान है....इसके लिए जिम्मेदार कौन है....क्या इस नुकसान से उन्हें कोई फायदा मिलता है...कदापि नहीं....तो फिर बंद का सबसे ज्यादा असर झेलने को कोई मजबूर है तो वो है आम जनता....जिसका नक्सलियों से कोई सरोकार नहीं है....और सरकार को इस बंद से कोई असर नहीं पड़ता....एक दिन अगर यातायात बंद हो तो यात्रियों को कितनी परेशानी होती है इसका अंदाजा वही लगा सकता है जो कभी बेमतलब बंद में फंसा हो...
एक बार मैं अपने घर जा रही थी...रायपुर से बिहार के लिए झारखंड उड़ीसा और पश्चिम बंगाल होते हुए ट्रेन रूट है...उस दिन मैं नाइट शिफ्ट में थी और सुबह साढ़े 8 बजे मेरी ट्रेन थी...रात साढ़े बारह बजे खबर आई की गया के पास नक्सलियों ने रेल पटरी उड़ा दी है...जिससे राजधानी की कुछ बागी पलट गई...मैं सोच में पड़ गई...कहीं इस रूट की ट्रेने भी बाधिन ना हो....जिस रूट पर पटरी उड़ाई गई थी वो था मुगलसराय रूट...मैंने सोचा इस रूट की ट्रेनें तो समय पर होनी चाहिए...रातभर सारे चैनल ने इस खबर को दिखाया सुबह भी ये खबर खिंचती रही...मैंने अपने डेस्क पर पूछा भी की यहां रूट तो प्रभावित नहीं हुआ हैं मुझे ऑफिस वालों ने बताया कि सारी ट्रेने समय पर हैं...मैं 7 बजे स्टेशन के लिए निकली...स्टेशन पहुंची...पूछताछ केन्द्र जाकर पता किया तो पता चला की मेरी ट्रेन भी अपने निर्धारित समय पर ही है...मेरी जान में जान आई....ट्रेन आई ...समय पर खुली भी लेकिन दोपहर 2 बजे जमशेदपुर स्टेशन के पास रुक गई और पता चला आगे नहीं जाएगी यहीं से फिर रायपुर के लिए वापस होगी....बड़ी अजीब लगा....रेलवे की कितनी बड़ी चूक थी...रात साढ़े से 12 ट्रेन रूट पर असर पड़ा और उन्हें दोपहर 2 बजे पता चला....मुझे रेलवे विभाग पर गुस्सा भी आया और खीझ भी....मन मसोज कर आगे का रास्ता सोचने लगी...पता चला ये ट्रेन यहां से वापस होगी लेकिन टाटा में दूसरी ट्रेन रूकी है जो पटना तक जाएगी....अब जमशेदपुर से टाटा तक का सफर किसी तरह तय करना था....बाकी लोग भी दूसरी ट्रेन से टाटा जाने का उपाय सोचने लगे...एनाउंस हुआ की टाटा के लिए एक ट्रेन आ रही है....तपती गर्मी में काफी देर इंतजार करना पड़ा...ट्रेन आई...हम टाटा ले लिए रवाना हुए....टाटा पहुंचे तो ट्रेन खड़ी थी....एक चीज अच्छी थी कि जिसमें पहली ट्रेन में हमारा रिजर्वेशन था उसी सीट पर हम यहां वापसी कर सकते थे...मेरी जान में जान आई क्योंकि टाटा से पटना का सफार काफी लंबा था और भीड़ काफी ज्यादा...खैंर मेरी सीट मुझे वापस मिल गई औऱ मैं आराम से बैठ गई...निर्धारित समय से काफी लेट थी ट्रेन घर वाले परेशान हो रहे थे...हालांकि मैंने घटना की जानकारी उन्हें दे दी थी....लेकिन समय समय पर वो जानना चाहते थे कि मैं कहां तक पहुंची हूं....कड़ी मशक्कत के बाद मैं घर पहुंची...लेकिन शरीर थककर चूर हो चुका था और मैं इतनी भागदौड़ में बीमार पड़ गई और मेरी छुट्टियां पूरी इसी में निकल गई...मुझे नक्सलियों पर गुस्सा आया...उन्हें किसी को इस कदर परेशान करने का कोई हक नहीं....


हालांकि सरकार चाहती है कि नक्सली एक मंच पर आएं औऱ अपनी मांगे सरकार के समक्ष रखें... लेकिन नक्सली इस पहल पर सामने आने को तैयार नहीं...आज कई नक्सली संगठन वैधानिक रूप से स्वीकृत राजनीतिक पार्टी बन गयी हैं और संसदीय चुनावों में भाग भी लेती है। लेकिन बहुत से संगठन अब भी छद्म लड़ाई में लगे हुए हैं। नक्सलवाद की सबसे बड़ी मार आँध्र प्रदेश, छत्तीसगढ, उड़ीसा, झारखंड, और बिहार को झेलनी पड़ रही है।

1 टिप्पणी:

  1. अब यह आतंकवादियों की श्रेणी में आ खड़े हुए हैं.इनसे कोई साहनुभूति नहीं है.

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