शनिवार, मई 7

ऐ ज़िन्दगी


कुछ ग़लतियां मेरी
कुछ नादानियां मेरी
कुछ बदमाशियां मेरी
कुछ ख़ामोशियां मेरी

कुछ मजबूरियां मेरी
कुछ सच्चाईयां मेरी
कुछ उलझने मेरी
कुछ अनकही बातें
कुछ उल्फ़तें मेरी

मैं हूं इन सब की अपराधी
मुझको याद है सारी
कसम से ग़फ़लतें मेरी
जो काग़ज़ पर लिखा होता
तो सब कुछ  मिट गया होता
पर किस्मत में जो लिखा है
भला मैं कैसे झुठला दूं।।



 मगर ग़ौर से सुन ऐ ज़िन्दगी
ख़ता का लेखा-जोखा है
तू तो सज़ा गिनाती जा।।
जो भी है तेरे स्टॉक में
सारी इसी जनम में मुझे सुना।।


गुरुवार, मई 5

ये मेरी बेवफ़ाई!!









आज चलो एक गीत सुनाऊ
ख़ुद भी रोऊ... तुम्हें रूलाऊ
कुछ खट्टी कुछ मीठी यादें
चलो मिलकर मैं उन्हें बताऊ।।

खोला मैंने जब पिछला पन्ना
मिला मुझे कुछ औना-पौना
झांका मैंने दिल का कोना
जाना मैंने कुछ अनहोना।।

शिकायत थी अगर मुझसे
तो मुझको बोल देते तुम
छुपकर बहाया अश्क
वो राज़...खोल देते तुम
मिलकर बांट लेते ग़म
कभी तो...बयां होता
ज़माने को सुनाया जो
कभी मुझसे कहा होता।।

काश तजुर्बे ग़लत न होते
मैं भी ग़लती ना करती
कोई मुझसे बेझिझक कह पाता
मेरी ग़लती से पहले
नासमझी थी मेरी माना
एक बार तो रोक लिया होता।।

लेकिन दोनों ने ख़ुद को टोका
कुछ तेरी ख़ता कुछ मेरी ख़ता
कुछ उलझन थी तेरे मन में
कुछ उलझन थी मेरे मन में
इस उलझन ने दोनों को देखो
एक दूजे का होने न दिया।।


तुम भी रोए मैं भी नम थी
न तुम्हें पता न मुझे पता
तुमने सोचा मैं थी बेवफ़ा
मैंने सोचा तुम थे ख़फा
चाहत थी शायद जुदा जुदा।

जब तक मैंने सच को जाना
देर हुई है.. ये भी माना
लौटा नहीं सकती मैं सब कुछ
जिसपर हक़ था सिर्फ तुम्हारा
पर यकी करो अनजाने में हुई ये ख़ता
जान बूझ कर नहीं दी
जिन्दगी भर की ऐसी सज़ा।।

सज़ा तो मैंने पाई है
अब भी दिल में मेरे
एक अजीब सी तन्हाई है।।


"न तुमने साज़ छेड़ा वो
न मैं सुन सकी वो तन्हाई।
मगर मोहब्बत में मेरे मौला
मैं फिर भी बेवफ़ा कहलाई।।"






बुधवार, मई 4

पतझड़ का राग



यू कहने को तो
चहुँ ओर हरियाली है
पर फिर भी जाने क्यों
दिल का एक कोना
अब भी खाली-खाली है

झूठी है मुस्कान यहां
ख़ुद को मैंने उल्झा ली है
चहुँ ओर तो है शीतल बयार
पर दिल में तूफान छुपा ली है


बाहर धूप खिली है
लेकिन मन उल्झा है अंधेरों में
कहने को है हरियाली
लेकिन दिल का कोना अब भी खाली है


सुना है ...
पतझड़ का सूना राग कभी
कैसे उसने पल-पल गुजारी है।
अब नई कोपलें आई हैं
रंग उमंग नया वो लाई हैं
पर बिछड़न का दंश...
हाय...भला
वही जाने जो इसमें रीता है
गम के आंसू जो पीता
मौन खड़ा वह जीता है
लेकिन उन सूखे पत्तों का क्या
जिसने मिलन की आस न सही
बिछड़कर अस्तित्व मिटा ली है।।





सोमवार, अप्रैल 11

डे लाइट सेविंग


डे लाइट सेविंग (DST):- दुनिया में कई देश ऐसे भी हैं जहां सर्दियों में सूरज की किरणें 6 महीने  पहुंचती ही नहीं और गर्मियों में ६ महीने सूरज डूबता ही हीं, जी हां आपने सही सुना उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव पर ऐसा ही होता है़। उत्तरी ध्रुव को गर्मियों में अर्ध रात्री का सूर्य (मिडनाइट सन) और ध्रुविय रात(पोलर नाइट) भी कहा जाता है। कोई भी व्यक्ति दिन के किसी भी समय खड़े होकर सूरज को क्षितिज पर घड़ी की उल्टी दिशा में अपने चारो ओर घूमते देख सकता है। जो लोग देश दुनिया की सैर करते हैं उन्हें तो इसकी जानकारी है लेकिन आज भी एक बड़ा वर्ग इस जानकारी से अछूता है।


                 डे लाइट सेविंग की अप्रेल २०१६ में १००वीं वर्षगांठ है .. जर्मनी को पहला देश माना जाता है जिसने ३०अप्रैल 1916 इसे पूर्ण रूप से लागू किया था...लेकिन अमेरिका के बेंजामिन फ्रेंकलिन ने   1784 में इस कॉन्सेप्ट को प्रपोज किया था। वहीं 1895 में न्यूजीलैंड के जॉर्ज हडसन ने इसका प्रस्ताव रखा था। उसके बाद केनेडा में भी 1908 में इसे लागू किया गया था।                        किताबों में तो हम सब ने ऐसा ही पढ़ा है लेकिन जब आप हकीकत में इसे महसूस करते हैं तो ये काफी रोचक लगता है। समय का ये जंप  गर्मियों में मार्च से अप्रैल के बीच होता है़ और सर्दियों में सितंबर से नवंबर के बीच होता है  यानी अलग- अलग देश इसे अलग-अलग समय पर लागू करते हैं। जैसे ब्रिटेन में ब्रिटिश समर टाइम  (BST) घड़ी एक घंटा आगे मार्च के अखरी रविवार को होता है और वापस एक घंटा पीछे अक्टूबर के आखरी रविवार को किया जाता है। गर्मियों में  जून के वक्त यहां कम से कम १६ घंटे ५० मिनट तक सूर्य की रौशनी मिलती है जबकि दिसंबर में सिर्फ ७ घंटे ४०मिनट का दिन होता है। मतलब गर्मियों में दिन लंबे, रातें छोटी जबकि सर्दियों में रातें लंबी और दिन छोटे होते हैं।
            आज के युग में तो सब कुछ इलेक्टोनिक हो गया है इसलिये हमें घड़ी को आगे या पीछे नहीं करनी पड़ती। हालांकि कुछ दीवार घड़ियों को बदलनी पड़ती है लेकिन अंदाजा लगाइये जब सभी घड़ियां चाबियों वाली हुआ करती होंगी तब इन्हें बदलना कितना मुश्किल होता होगा। ब्रिटेन में आज भी बड़ी बड़ी दीवार घड़ियों का चलन है और उनका समय भी हाथ से बदला जाता है। बकिंघम पैलेस में ३०० से भी ज्यादा ऐंटीक घड़ियों का कलेक्शन है जिसे हमेशा मेन्टेन रखा जाता है।

              जब मैं पहली बार यूरोप आई तो मैंने देखा रात के १० बजे तक सू्रज चमक रहा था  देख कर बड़ा आश्चर्य हुआ।  हालांकि लोग सड़कों पर कम ही दिख रहे थे। वहां के मूल निवासी समय पर उठते और समय पर सो भी जाते हैं उनकी दिनचर्या में सूरज की रौशनी उन्हें प्रभावित नहीं करती। जबकि हमारे लिये ये नया अनुभव था।
      उसके बाद मैं ब्रिटेन शिफ्ट हुई ...अक्टूबर में दीवार घड़ी खरीद कर लाई कुछ दिनों तक तो सही चली घड़ी लेकिन अक्टूबर के आखरी सप्ताह मेरी घड़ी एक घंटा आगे चलने लगी.. फोन की घड़ी तो सही थी ...मैंने सोचा शायद बैट्री ख़राब हो गई है..... मैं घड़ी को वापस सॉप में ले जाकर दिखाने की सोच रही थी ..फिर याद आया ...ओह नहीं घड़ी ख़राब नहीं हुई यहां तो समय बदल गया है। 



      जिन देशों में डे लाइट इफैक्ट होता है वहां काम के घंटे भी निर्घारित होते हैं। ऐसे देशों में सुबह के ८ बजे दुकानें खुलतीं हैं और शाम के ६ बजते ही बंद कर दी जाती हैं चाहे वो दोपहर क्यों न प्रतीत हो रहा हो। शुरू शुरू में आदत थी.. भारत में हम शाम के समय शॉपिंग के लिए निकलते थे पर जब ब्रिटेन आई तो यहां शाम के समय या तो दुकाने बंद मिलती थीं या बंद होने वाली होती थीं।  कुछ रेस्टोरेंट और फूड़ शॉप को ही लेट नाइट  ओपनिंग  की  अनुमति मिलती है।
पुराने जमाने में डे लाइट के फायदे और नुक्सान दोनों थे।  DST लागू करने का उद्देश्य काम के घंटे के बाद सूर्य के प्रकाश का फायदा उठाना था  और ऊर्जा को संरक्षित करना था लेकिन इसके साथ ही बाहर काम करने वालों के लिए दिन लंबा होना मतलब काम के घंटे का बढ़ जाना भी था। लंबा दिन होने से काम के घंटे में इजाफ़ा हो जाता था जबकि शरीर थक कर चूर हो चुका होता था। इसलिये ये कॉन्सेप्ट लोगों के हित के लिये लागू किया गया।
              इसका ज्यादा असर ध्रुव के आस पास के देशों में देखने को मिलता है।  यूरोपिय देशों में DST को ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, इटली,बुलगारिया, नॉर्वे, स्विटजरलैंड आदि देश लागू करते हैं जबकि रूस, आइसलैंड, जॉर्जिया,अर्मेनिया और बेलारूस इसे नहीं अपनाते ... वहीं अमेरिका में अलग-अलग Time zone में अलग अलग दिन इसे अपनाया जाता है।   नॉर्थ अमेरिका के कई देश,  साउथ अमेरिका के कुछ देश, यूरोप के कई देश, मिडिल इस्ट के कुछ देश, न्यूजीलैंड और साउथ इस्ट ऑस्ट्रेलिया के कुछ देश इसे अपनाते हैं जबकि ज्यादातर एशियाई और अफ्रीकी देशों में डे लाइट का ज्यादा असर देखने को नहीं मिलता।

शनिवार, मई 9

हम सब के पास है दो-दो माँ


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किस्मत हम सब की अच्छी है… हम सब के पास है दो-दो माँ
कहते हैं भगवान से बढ़कर दुनिया में होती है माँ
एक माँ ने हमको जन्म दिया, पाल-पोस कर बड़ा किया 
खून से जिसने सींचा हमको… वह है अपनी प्यारी माँ
और दूसरी वो है जिसको रिश्तों ने है जोड़ दिया
थोड़ी सख्त पर दिल की मोम बेचारी, कहलाती है सासु माँ
अपनी पूंजी सौंपी  हमको… क्यों न कहलाए वो भी हमारी माँ


सास-बहू का रिश्ता  कैसा… या दुनिया का दस्तूर है ऐसा
 सास बहू की करे बुराई… या बहू हुई सास पर भारी
घर-घर की है यही कहानी, रोज सुनाए नाना-नानी
लेकिन इस दूरी को पाट  कर…मुझको भी अपना लो माँ
मैं जब भी दूं माँ को आवाज… आप ही पहले आओ  माँ
बेटी की हिचकी भी भांप ले जैसे , मेरी  पीड़ा समझ जाओ  माँ
सभी रिवाज़ बेटी के क्यों… कुछ अच्छे हमारे लिए बनाओ माँ


तकलीफ में जब भी होती हूं… जुबां माँ ही तो दोहराता है
पर जानें कैसा तार जुड़ा है… पिता पहले समझ पाता है
डोली जब निकली थी मेरी पहली बार वो रोया था
मुझे लगा था ऐसा जैसे कलेजे को खुद से जुदा किया

उस बगिया की फूल थी मैं…जिसको अब तुम्हें सौंप दिया
विदा हुई तो कहा था मैंने…अब मिलेगी मुझे एक दुलारी माँ
उस दिन माँ को लगा था… मैंने दो हिस्सों में बांट दिया....
फफक-फफक कर रोई उस दिन मेरी राजदुलारी माँ

उन रिश्तों को छोड़ा जिस दिन सोचो मैंने क्या खोया
उस दिन तो मेरी दुनिया ही बदल गई थी माँ
ऐसे में मेरा हाथ थाम एक माँ ने ही तो अपने पास बुलाया था
घर में मुझको प्रवेश करा कर सारा फर्ज निभाया था
मैंने भी नया रिश्ता जोड़… माँ ही तुम्हें पुकारा था


अपनी जान के लिए हजारों में आपने ही तो मुझे चुना था
बेटा आपका है आपका रहेगा... मेरे पास आप ही की अमानत है... माँ
क्योंकि उसका पहला और आख़री प्यार भी आप ही हैं ओ प्यारी  माँ
आपका बेटा अब बेटा ही नहीं, पति का भी फर्ज निभाएगा
मैं आपका ख़ून न सही पर मैंने आप ही के खून को जन्म दिया
आप ही हैं हम सब की जड़ें अपना तना बना लो माँ
बहुत अकेली हूँ मैं जग में अब तो गले लगा लो माँ


माँ के आंचल में संसार छुपा है, खुद में मुझे समा लो माँ
माना मुझको कुछ नहीं आता, बस प्यार से ये समझाओ माँ
ये फासले सिर्फ पीढ़ी के हैं...दोष न तेरा है न मेरा माँ
जिस दिन हम दोनों समझ गए यह रिश्ता दूर तलक तब जाएगा
मिलकर अगर हम साथ चलें तो हर गम हमसे घबराएगा


प्रकृति बदल रही है करवट.... देखें क्या रंग दिखाती है
आज आप एक सास हैं और एक बेटी की माँ भी....
बेटी और बहू में जो फर्क चला आ रहा है
क्या कल मैं भी उसमें ढल जाऊंगी ?
बेटी के ही सब नखरे क्यों… बहू के भी कुछ उठाऊंगी!
बनने दूंगी ससुराल में बेटी मैं बहू की सगी माँ कहलाऊंगी!
बेटी का मोह त्याग कर क्या बहू को मैं भी अपनाऊंगी!


अब एक अर्ज़ है पति से भी ....
मैंने अपनाया इन सब को
अब चलो तुम्हारी बारी है…
अगर चाहिए दो-दो माँ
बेटे का फर्ज़ निभाना होगा
प्यार चाहिए अगर दोनों का…
प्यार से ही अपनाना होगा
देखो जन्नत है यह धरती
सबको यही बताना होगा
दो-दो माँ का प्यार चाहिए
तो दोनों को गले लगाना होगा
 माँ में बसती जान हमारी
 दुनिया को यही बताना होगा

                            -    मधु चौरसि

HAPPY MOTHER'S DAY
मेरी  प्यारी दोनों माँ
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शनिवार, अगस्त 13

हाईटेक रक्षाबंधन

देश में जब भी कोई त्यौहार आता है...लोगों में उसके  प्रति भरपूर उत्साह देखने को मिलता है.....समय के साथ इन त्यौहारों ने अपने अंदर और भी गाढ़े रंग समेट लिए हैं......लोग पूरी परंपरा और निष्ठा से इसे मनाते हैं.....जिसमें जितनी क्षमता होती है वो उस तरीके से इसे मनाने के लिए स्वतंत्र है......लेकिन ये जरूरी नहीं कि इस उत्साह में परिवार के सभी सदस्य एक साथ हों....ग्लोबलाइजेशन के इस युग में परिवार बिखर सा गया है.....काम-काजा या पढ़ाई के लिए लोग संयुक्त परिवार में चाह कर भी नहीं रह पाते.....ऐसे में त्यौहार के वक्त अपनों की कमी खलती है....

और देखिए ना ये कैसी विडंबना है कि...पिछले करीब 10 साल से मैं अपने भाई की कलाई पर राखी नहीं बांध पाई हूं....कारण है....दूरी....

दरअसल भाई पहले अपनी पढ़ाई के सिलसिले में देश से बाहर था और अब काम के सिलसिले में....लेकिन इस साल वो रक्षाबंधन के शुभ अवसर पर माता-पिता के पास घर पर ही था....परन्तु... कैसा संयोग है....इस बार मैं अपने देश से दूर हूं.....मैं जहां हूं वहां लोगों को राखी का मतलब भी नहीं पता.....ऐसे में यहां राखी मिलना तो संभव नहीं था... इसलिए घर पर ही मैंने रेशम के धागे से राखी बनाई....और जलेबी भी बनाने की कोशिश की थी... जो सफल भी रही....इस बार मैंने राखी थोड़े अनोखे तरीके से मनाई....

दरअसल इन्टरनेट ऐसा जरिया है जिसने मुझे अपनों से हमेशा जोड़े रखा है.....जब भी अपनों की याद आती है इन्टरनेट से ही फोन घुमा लेती हूं.... इस साल मैं रक्षाबंधन भी नेट महाराज की बदौलत ही मना पाई....SKYPE पर मैंने VIDEO कॉल किया और भाई को राखी दिखाई....इस अनोखे तरीके ने मुझे पूरी तरह से संतुष्ट तो नहीं किया लेकिन मन में थोड़ी तसल्ली जरूर हुई.....पहले तो मैं अपने मुहबोले भाईयों को राखी बांध  दिया करती थी... लेकिन इस साल देश से दूर रहने के कारण इन्टरनेट से राखी भेज कर ही मैंने काम चला लिया.....और पति देव से भी नेट के जरिए ही राखी का त्यौहार मनाने की सलाह दी....उन्होंने भी अपनी बहनों से बात कर राखी का त्यौहार मनाया......

और अब जब देश स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारी में है....मैं पहली बार दिल्ली को बहुत मिस कर रही हूं....क्योंकि दिल्ली में मनाए जानेवाले इस राष्ट्रीय पर्व को देखने का मौका मुझे अब तक नहीं मिल पाया है.....

वहीं इस महीने तीज का त्यौहार भी मैं शायद नहीं मना पाऊं....शादी के बाद पहली बार तीज पड़ रहा है और मुझे इसके विधि-विधान के बारे में कुछ भी नहीं पता....ऐसे में मैं नहीं चाहती कि मुझसे किसी भी प्रकार की त्रुटि हो....लेकिन मैं खुश हूं क्योंकि जल्द ही अपने देश वापसी की तैयारी में हूं....



बुधवार, जुलाई 13

दहशतगर्दों का फन लहराया

इन दिनों देश से बाहर हूं...लेकिन मुंबई धमाकों ने देश से बाहर भी लोगों का दिल दहला दिया है....दरअसल जिस वक्त मुंबई में धमाका हुआ... उस वक्त मेरे पति-देव मुंबई में किसी से इन्टरनेट से बातें कर रहे थे...मैं उस वक्त सो रही थी... क्योंकि मैक्सिको में उस वक्त सुबह का समय था....पति ने मुझे जगाया और धमाकों की जानकारी दी....मैं ह़डबड़ा कर उठी....और ऐसा लगा जैसे हम धमाकों
की गूंज LIVE सुन रहे हैं....इन पंक्तियों के रूप में....अनायास ही कुछ शब्द निकल पड़े....







दहशतगर्दों ने फिर फन लहराया
देश की जनता को एक बार फिर दहलाया....


खून की होली खेलना इन्हें हमेशा रास आया
मासूमों का खून पी-कर  क्या सममुच तुम्हें मजा आया?



ऐ...दहशतगर्दों...
मासूमों की जिंदगी लेने के लिए
क्या तुम्हें यमराज ने अपना दूत  है बनाया?


इस खून खराबे में ....
तुम किससे बदला लेना चाहते हो.... ?
क्योंकि जिन नेताओं ने इस चिंगारी को हवा दी
वो तो अपने आसियाने में हैं बिल्कुल सुरक्षित
और बहता है तो बेकसूरों का खून सारा.....


अब तो अपने घर रहने में भी लगता है...डर
क्योंकि जब देश ही सुरक्षित नहीं
तो कितना सुरक्षित है...हमारा घर?


कब तक पूरे होंगे इनके नापाक इरादे?
कब बदलेगा ये मंजर सारा?
दहशतगर्दों का फन क्यों नहीं समय पर
कुचला  है जाता?